क्या वर्णवाद सोसिओपैथ्स की संरक्षण करता है?

सोसिओपैथ शब्द के वारे में बहुत कम लोग जानते होंगे लेकिन आप की जिंदगी में और आपके आसपास वह हमेशा होते हैं । ऐसे भी होसकता आपके फैमिली मेंबर भी में कोई सोसिओपैथ हो । आपने बहुत सारे चैनल में हिट सीरियल देखी होंगी जैसे “सास भी कभी बहु थी” इत्यादि सोप इसीलिए हिट हो जाते हैं क्यों के मुख्य कलाकार या चरित्र घर में या सगी संबद्ध, दोस्त, या समाज के सोसिओपैथ्स यानी दुष्ट चरित्रोंसे फाइट करके स्थितिओं को ठीक करने की कोशिश करता है । उसमें छल, कपट, चतुराई, शातिरपन, ईर्ष्या, गुस्सा, बेवफ़ाई इत्यादि जैसे इमोशन्स (emotions)  को आकर्षक चरित्रोंसे प्रेजेंट किया जाता है जिससे मुख्य कलाकार अपने विवेकी गुणों के द्वारा स्थतिओं को नर्मालाइज़ या समाधान करने को कोशिश करता है । दरअसल हमारे पूर्वज भी पुराणोंसे, ग्रंथों, महाकाव्यों इत्यादियों से वही चीज या मनोरंजन पाया करते थे जिसमें नैतिक सिक्ष्याकी एक बड़ा पार्ट होता था । रियल टाइम में भी आप कोई भी न्यूज चैनल खोल दो उस में तो सोसिओपैथों का लाइव सीरियल चलता रहता ही है जैसे कोई पोलिटिकल पार्टी का लीडर ही ले लो या बेईमान बिजनेसमैन जो देश का पैसा ले के भाग गया है या देश की पैसा लूट करके सीनाजोरी दिखारहा है इत्यादि इत्यादि ।  आप को सोसिओपैथ्स हर जगह और हर प्रोफेसन्स में मिलजाएँगे । साधुसंत से लेकर, गरीब और धनी कोई ऐसे वर्ग नहीं जहाँ सोसिओपैथ आपको नहीं मिलेंगे । तो दोस्तों चलिए जानते हैं सोसिओपैथ है क्या?

सोसिओपैथ या विवेकबिकृत लोग हमेशा अविवेकी वाले लोग होते हैं । उनकी लंबे समय की अनजान प्रवृत्तियां, जो की बाद में उनकी विकृत विशेषताओं को परिभाषित के तौर विकसित होती है, जब तक कि एक कठोर एपिसोड(घटना) नहीं होता है तब तक पता नहीं चलता ।

अमेरिकन साइकोट्रिक एसोसिएशन के डायग्नोस्टिक एंड स्टैटिस्टिकल मैनुअल के मुताबिक, एक सोसिओपैथ को “बचपन या प्रारंभिक किशोरावस्था में शुरू होने वाले अन्य लोगों के अधिकारों के उल्लंघन, और उल्लंघन के व्यापक पैटर्न” के साथ एक व्यक्ति के रूप में परिभाषित किया जाता है और जो वयस्कता में भी जारी रहता है।

सोसिओपैथिक प्रवृत्तियों में स्वार्थीता, सतही आकर्षण और स्वयं में अत्यधिक गर्व की भावना जैसे कुछ महत्वपूर्ण लक्षण शामिल हैं । हालांकि, इन प्रवृत्तियों के साथ सोसिओपैथ पैदा नहीं होते हैं, वे इन लक्षण को बचपनों से विकसित करते हैं क्योंकि वे अपने बचपन या प्रारंभिक किशोरावस्था में कई पर्यावरणीय कारकों का सामना करते हैं। यद्यपि सोसिओपैथ लक्षणों  की शुरुआत शुरुआती उम्र में होती है, लेकिन ये लंबे समय तक ध्यान नहीं दिया जाता की बच्चा बड़ा हो जाएगा और खुद ही सीखेंगे । कभी-कभी, सोसिओपैथ को साइकोपैथ के रूप में जाना जाता है क्योंकि दोनों मामलों में कम या ज्यादा एक ही तरह की लक्षण या व्यवहार  देखने को मिलते हैं । लेकिन सोसिओपैथ साइकोपैथ नहीं  है । जबकि सोसिओपैथ पर्यावरणीय कारकों के परिणामस्वरूप विकृत लक्षण को पैदा करता है, जब की साइकोपैथ अन्तर्जात विकृतियां से संबधित है ।

बातें सावधानी का

आप इन सोसिओपैथ लक्षणों को अपने अनुचित मित्रों, परिवार और अन्य परिचितों से जोड़ने के लिए प्रेरित हो सकते हैं; हालांकि, केवल एक विशेषज्ञ ही सोसिओपैथ को ठीकसे पहचान और उसकी निदान कर सकता है । इसलिए, किसी भी विशेषज्ञ राय के बिना किसी भी व्यक्ति को सोसिओपैथ के रूप में टैग करना नहीं चाहिए।

एक सोसिओपैथ की लक्षण

सोसिओपैथ का मानना है कि दूसरोंकी जिंदगी को छल, चतुराई या ठगी से छेड़ छाड़ करके बहुत कुछ हासिल किया जा सकता है । उस दिशा में, वे अपने दुर्भावनापूर्ण विचारों को कामियाब करवाने केलिए दूसरों को विश्वास दिलाने में कोई समय बर्बाद नहीं करते हैं । वे अपने आकर्षक चतुर वर्डप्ले (चालाकी मीठी बातों का जादू) का उपयोग करके ऐसा करते हैं । वे दूसरे व्यक्ति को ऐसे पीड़ित करते हैं जैसे कि वे अपनी योजनाओं का बस एक वस्तु है ।

सोसिओपैथ में सच्ची सामान्य बोध या भावनाएं नहीं होती हैं । वे केवल अपनी भावनाओं का छल या छद्म प्रदर्शन करते हैं । भले ही वे हंसते हैं, रोते हैं, क्रोधित हो जाते हैं और क्षणिक रूप से उदास हो जाते हो; वजह उनके अंतर्निहित कारण है जिस अपनी दुनिया में वह रहते हैं और अपने स्वयं के बनाया सेट ऑफ़ नैतिकता पर चलते हैं । वे अक्सर इस धारणा से अनुसाशित होते हैं कि उनके कार्यों का कोई गलत परिणाम नहीं होता है, और वे किसी के लिए उत्तरदायी नहीं हैं । सच्ची भाव और बोध के अक्षमता के कारण सोसिओपैथ अपने जिम्मेदारीयों की नाकामियावी केलिए दूसरों को आरोपी ठहराते हैं ।

सोसिओपैथयों के पास झूठ बोलने की असीम क्षमता है । यह सब तब शुरू होता है जब वे कुछ छिपाने के लिए झूठ बोलते हैं और फिर झूठ के अपने वेब (जाल) को कवर करने के लिए झूठ बोलते रहते हैं । चूंकि वे सच्ची भाव और बोध से वंचित हैं, इसलिए वे अनिवार्य झूठ के प्रभाव को नहीं समझते हैं । यदि वे झूठ बोलते हुए पकडे जाते हैं, तो सोसिओपैथ विषय बदलने में माहिर होते हैं; वे किसी और को दोष देकर स्थिति से बचाओ करने के विषय में चतुर हैं । वास्तव में, अधिकांश सोसिओपैथ झूठ बोलने में इतने चतुर हैं कि वे झूठ डिटेक्टर परीक्षण भी पास करलेते हैं । यही कारण है कि, अपराधियों जो सोसिओपैथ हैं शायद ही कभी कानून के द्वारा जेलों तक पहुँच पाते हैं ।

एक सोसिओपैथ में ऊपरी उथली भावनाएं होती हैं । ऊपरी भावनाओं (shallow emotions) का अर्थ है दूसरों के प्रति झूठी गर्मजोशी, खुशी, प्रशंसा और प्रेरणा को किसी का गुप्त या परोक्ष उद्देश्यों को पूरा करने के लिए होता है । हालांकि इन लक्षणों से वे भावनात्मक रूप से मजबूत लगते है, लेकिन वे उत्तेजनाहीन (cold) रहते हैं और सामान्य व्यक्ति की तरह भावनाओं को प्रदर्शित नहीं करते हैं । वे दूसरों को अपना काम पूरा करने की वादे करने के लिए जाने जाते हैं । हालांकि, एक बार उनकी काम पूरी होने के बाद, वे लगभग किए गए वादों को पूरा नहीं करते हैं ।

कुछ सोसिओपैथ, कुछ करने या कहने से पहले दो बार सोचने का तर्क उनके दिमाग में गायब होता है । वे एक निश्चित विचार से इतने अभिभूत हो जाते हैं कि वे इसके लिए आवेगपूर्ण प्रतिक्रिया देते हैं । ये क्रियाएं हमेशा धोखाधड़ी, चोरी और झूठ बोलने जैसे एक कुटिल कौशल से प्रेरित होती हैं । वास्तव में, इस क्रियाएं को पूरा करने का उत्साह उन में इतना गहरा होता है कि वे कभी भी परिणामों के बारे में नहीं सोचते हैं कि क्या यह क्रियाएं सही है या गलत है।

एक सोसिओपैथ की किए गए सभी कार्यों में बेहद स्पष्ट प्रकृति उनके परजीवी प्रकृति है । वे लीच की तरह कार्य करते हैं जो दूसरों से अपने फायदे के लिए चिपकते रहते हैं । वे उन लोगों का आपने शिकार करते हैं जो उनके सबसे नज़दीक हैं या जो उन्हें पूरा विश्वास करते हैं । एक बार उनकी योजना सफलतापूर्वक हो जाने के बाद, अगर पकड़ा जाएं वे आसानी से अपनी साजिश से बाहर निकल के दूसरे पर दोष डालते हैं ।

सोसिओपैथ्स में एक बेहद आकर्षक व्यक्तित्व होता है और वे जानते हैं कि अपने सभी कुशल तरीके से कवर करने के लिए इसे पूरी तरह से कैसे उपयोग किया जाए। वे बहुत मनोरंजक, लापरवाह, निस्संदेह और जीवंत हो सकते हैं जब वे बनना चाहते हैं, और यह उन लक्षणों से है जो लोगों को आकर्षित करते हैं । एक बार जब लोग उनसे आकर्षित हो जाते हैं उसके बाद वे उन्हें आसानीसे प्रभावित करते हैं, वे विभिन्न कार्यों के लिए इन ‘दोस्तों’ का उपयोग करते हैं।

सोसिओपैथ्स खुद के बारे में डींग मारने में व्यस्त होते हैं जैसे कल नहीं है । वे दृढ़ता से मानते हैं कि वे जो कर रहे हैं वह बिल्कुल सही है और उनका की गयी  कोई भी काम गलत नहीं हो सकता है । वे अत्यधिक आत्मविश्वास वाले होते हैं और इससे उन्हें जीवन, विवाह, पैसे कमाने और सामान्य जीवन के बारे में बेहद निराशाजनक और अवास्तविक योजनाएं मिलती हैं । सोसिओपैथ्स को यह समझने में कठिनाइ होता है कि उनके आसपास के लोग उनके खिलाफ क्यों हैं।

चाहे वह एक हत्या, लूट, झूठ, या कोई अन्य आपराधिक कृत्य है, सोसिओपैथ्स को ये सब अपराध नहीं लगता है । वे अपने आप की एक अनौपचारिक दुनिया में रहते हैं जहां वे कभी दूसरों के साथ सहानुभूति नहीं दे सकते हैं और न ही वे दूसरों को दोष देने के लिए अपराध महसूस करते हैं । वे बुनियादी झूठे होने के लिए जाने जाते हैं और वे उस  हद तक झूठ बोलते हैं जहां अपराध को छुपाने केलिए वे स्व-निर्मित वास्तविकता बना डालते है । वे अक्सर ये मानते हैं कि दूसरे व्यक्ति को दिए गए दर्द उनके पाने का लायक है । कई आपराधिक सोसिओपैथ्स को अक्सर उनके अपराध पकड़े जाने पे इस तरह के स्पष्टीकरण देने को देखा जाता है।

अन्य सामान्य लक्षण

1 । प्रारंभिक व्यवहार की समस्याएं जिन्हें किशोर अपराध के रूप में जाना जाता है।

2 । निंदा, बदनामी, अपवाद, अपमानवचन, अफवाह के अपराध में शामिल होना।

3 । विचित्र व्यवहार और बेवफाई का प्रदर्शन, अक्सर प्यार के अक्षम होने के रूप में टैग किया जाता है।

4 । एक उद्यमी आपराधिक मानसिकता होने का सोच ।

5 । सत्तावादी, प्रभुत्ववादी और गुप्त होना ।

6 । तुच्छ लक्ष्य-निर्धारण प्रवृत्तियों को दिखाना – जैसे पीड़ितों को दास बनाना ।

एक सोसिओपैथ्स से निपटना कई स्तरों पर बहुत मुश्किल हो सकता है । सबसे पहले, किसी व्यक्ति में सोसिओपैथिक प्रवृत्तियों को पहचानने में काफी समय लगता है, जिसकेलिए  विक्टिम को उसकी पहचान से पहले ही पीड़ा के विभिन्न स्तरों से गुजरना पड़ता है । दूसरा, इस विकार के लिए उपचार लगभग असंभव है क्योंकि एक सोसिओपैथ विश्वास नहीं करता कि उसे कोई समस्या है । क्योंकि उनके पास कोई विवेक नहीं होता इसलिए वह सही और गलत के बीच का अंतर नहीं समझता है और न ही वह अपने कार्यों के परिणामों की परवाह करता है । क्यों के वे पैथोलोजिकल झूठे होते  है; उनके उपचार सत्रों के दौरान वह झूठ बोल के ठीक होने का छल कर सकते हैं और ये अहसास दिला सकते हैं की वह ठीक हो गये हैं इसलिए उनकी उपचार काफी हद तक व्यर्थ और कठिनाई प्रदान करता है इसलिए उनके सुधार की उपेक्ष्या की गणना कभी भी नहीं की जा सकती है । इसलिए इस बात पर सहमति हुई है कि सोसिओपैथ्स से निपटने का सबसे प्रभावी तरीका उनसे दूर रहना है या उनको अपने से दूर करदेना है जो किसी भी तरह से संभव है।

अस्वीकरण (Disclaimer)

यह मनोविज्ञान लेख केवल जानकारीपूर्ण उद्देश्यों के लिए है और एक विशेषज्ञ द्वारा प्रदान किए गए उपचार के निदान को प्रतिस्थापित करने का इरादा नहीं रखता है।

कृपया ध्यान दें:

हमारे विशाल भूखंड की ही कुछ स्वार्थीवादी असामाजिक संकीर्ण सोच के शातिर बुद्धिजीवियों ने इस भूखंड को  सोसिओपैथ वर्ग(ruling caste/upper caste/sabarn/dwija) और पीड़ित वर्ग (slaves/shudra/working class/labor class/ekaja/asabarn) में तोड़ा जिसके वजह से इस भूखंड का हर भाषीय सभ्यता ये दो वर्ग में बंट गए। ये वर्ग रिग वेद की पुरुष सूक्त १०.९० है जिसको वर्ण व्यवस्था कहते हैं।  इस वर्ण व्यवस्था के कारण सोसिओपैथको उच्च वर्ण या उच्च वर्ग के रूप में अप लिफ्ट किया गया और पीड़ितों को गुलाम यानी शूद्र वर्ग में हमेशा सोसिओपैथ के द्वार उत्पीड़ित कियागया । हालाँकि ये सोच इंडिया को छोड़ के आप को कहीं और नहीं मिलेगा । यहाँ की लोग सदियों इतनी तर्क अंध से ग्रसित रहे की कभी वर्ण व्यवस्था क्या है? कौन पैदा किया? क्यों पैदा किया, किसने इम्प्लीमेंट किया, कैसे इम्प्लीमेंट किया और क्यों इम्प्लीमेंट किया कभी जानने की कोशिश नहीं की । वर्ण व्यवस्था कैसे पैदा हुआ अगर आप जान लें अगर आपकी दिमाग सही काम करता हो तो उसी समय ही इस व्यवस्था के ऊपर थूकेंगे । और ताज्जुब की बात ये है की कोई भी जिम्मेदार व्यक्ति आज तक इसकी खोज और इसकी सामाजिक हानि और अनुगामियों की मानसिक स्वास्थ्य का ख्याल क्यों नहीं किया? आपको जानकर बहुत ही दुख होगा आपकी वर्ण व्यवस्था एक सामाजिक बुराई के साथ साथ एक अंधविश्वास और मानसिक विकृति है । आप को ये पता होना जरूरी है की वर्ण व्यवस्था पीढ़ी-गत सोसिओपैथ (soft, moderate and orthodox) पैदा करता है और इस सोच के साथ ही मानसिक विकृतियां एक पिढीसे दूसरे पीढी तक सोच के माध्यमसे हस्तांतरण (transfer) होता है। बस कोई सामाजिक पहचान की प्रमाणपत्र दिया और बिना सोच समझ के उस प्रमाण पत्र को बिना जाँच किये अपना ली; ये मूर्खता और अज्ञानता नहीं है तो क्या है? आप को जानके ये दुःख जरूर होगा की ये सोच इस भूखंड के ज्यादातर मूलनिवासियों के ऊपर जबरदस्ती थोपा गया है ना कि लोग इस सोच को अपने मर्जी से अपनाया है । बिना मर्जी का कोई भी सोच दूसरों के ऊपर थोपना एक अपराध है ना कि धर्म । अगर हम हमारा देश को समृद्ध देखना चाहते हैं तो पहले जो सामाजिक और मानसिक विकृतियां या गंदगी है उसकी सफाई पहले करनी होगी । हमारे विशाल भूखंड की ही कुछ स्वार्थीवादी असामाजिक संकीर्ण सोच के शातिर बुद्धिजीवियों ने खुद की सामूहिक और संगठित वर्ग की लाभ की लोभ से भूखंड के आज की मुलमिवासियों के पूर्वजों को जो की अब १०० करोड़ से भी ज्यादा वैदिक अनुगामियों (हिन्दू) के जिंदगी और मन के साथ खेला और उनके अनुगामियों और उनके नस्लों को मानसिक विकृत्तिया धर्म के नाम पे दी और अपने ही लोगों को अपने स्वार्थ के ख़ातिर बाँट डाला । अगर आप वर्ण कैसे पैदा हुए नहीं जानते तो ये आज जान लें और अपनी तार्किक सोच को खोले । अगर आप सही माने में इंसान होंगे तो आपको हिन्दू होने में गर्व नहीं शर्म महसूस होगी क्योंकि पुरुष सूक्त ज्ञान की नहीं मूर्खता और अज्ञानता की परिभाषा है ।  इस वर्ण व्यवस्था को धर्म और ज्ञान के नाम से फैलाने वाले हर व्यक्ति असामाजिक और अपराधी है । पुरुष शुक्त ना केवल अंधविश्वास है बल्कि हर मानवीय अधिकार की उल्लंघन भी करता है ।

जातिवाद यानी वर्ण व्यवस्था संस्कृत भाषी रचनाओं में मिलता है इसका मतलब ये हुआ जो गैर संस्कृत बोली वाले है उनके ऊपर ये सोच यानी वर्ण व्यवस्था थोपी गयी है ।  रिग वेद की पुरुष शुक्त १०.९० जो वर्ण व्यवस्था का डेफिनेशन है उस को कैसे आज की नस्ल विश्वास करते हैं ये तर्क से बहार हैं? शायद आज की पीढ़ी भी मॉडर्न अंधविश्वासी हैं । पुरुष सूक्त बोलता है: एक प्राचीन विशाल व्यक्ति था जो पुरुष ही था ना की नारी और जिसका एक हजार सिर और एक हजार पैर था, जिसे देवताओं (पुरूषमेध यानी पुरुष की बलि) के द्वारा बलिदान किया गया और वली के बाद उसकी बॉडी पार्ट्स से ही  विश्व और वर्ण (जाति) का निर्माण हुआ है और जिससे दुनिया बन गई । पुरूष के वली से, वैदिक मंत्र निकले । घोड़ों और गायों का जन्म हुआ, ब्राह्मण पुरूष के मुंह से पैदा हुए, क्षत्रियों उसकी बाहों से, वैश्य उसकी जांघों से, और शूद्र उसकी पैरों से पैदा हुए । चंद्रमा उसकी आत्मा से पैदा हुआ था, उसकी आँखों से सूर्य, उसकी खोपड़ी से आकाश ।  इंद्र और अग्नि उसके मुंह से उभरे । ये उपद्रवी वैदिक प्रचारकों को क्या इतना साधारण ज्ञान नहीं है की कोई भी मनुष्य श्रेणी पुरुष की मुख, भुजाओं, जांघ और पैर से उत्पन्न नहीं हो सकती? क्या कोई कभी बिना जैविक पद्धति से पैदा हुआ है? मुख से क्या इंसान पैदा हो सकते है? ये कैसा मूर्खता है और इस मूर्खता को ज्ञान की चोला क्यों सदियों धर्म के नाम पर पहनाया गया और फैलाया गया? ये क्या मूर्ख सोच का गुंडा गर्दी नहीं है?

इंसानों का इंसान होना क्या काफी नहीं है जो उनको किसी दूसरे की सोच का सर्टिफिकेट चाहिए? इंसानों की अशांत मन और अज्ञानता केलिए अंधविश्वास की सहारे की क्या जरूरत? हम विज्ञान, तर्क और सत्य का सहारा भी तो ले सकते हैं? नैतिकता के लिए हम को अंधविश्वास धर्म की छतरी के नीचे बैठनेकी क्या जरूरत? हम तार्किक या वैज्ञानिक नैतिकता सत्य, तर्क और विज्ञान से भी तो पा सकते हैं।  किसी संकीर्ण सोचवालों इंसानों का बनाया सामाजिक और धार्मिक पहचान सर्टिफिकेट की क्या जरूरत? जो मानवता को अपने झुण्ड यानी अपने ही बनाया हुआ भीड़ तक सीमित रखना चाहते हैं और उस भीड़ को धर्म कहते हैं; हर किसी को उस भीड़ में शामिल होने का जरूरत ही क्या है? जो जिस भीड़ में पैदा हुआ उस इंसान की नाम करण उसकी भीड़ के नाम से हो गया । एक इंसान को किसी दूसरे की सोच की पहचान जैसे ईसाई इंसान, इसलामी इंसान और हिन्दू इंसान की ब्रांड की जरूरत ही क्या है? क्या इंसानों को किसी भगवान की सोच के ऊपर आधारित सामाजिक पहचान की ब्रांड की जरूरत है? क्या ये एक तरह की मानसिक विचलन नहीं है? इन बुराई सोचों को दूर करना क्या हम सबकी जिम्मेदारी नहीं? अगर देश की सोच साफ़ और सुस्त होगी तब तो देश समृद्ध और विकासशील होगा ।

धर्म का अर्थ सत कर्म है; अच्छा सोचो, सत्कर्म करो उसकेलिये किसी धर्म की छतरी के नीचे बैठनेकी जरूरत क्या है? धर्म पुराने ज़माने में एक पोलिटिकल पार्टी का जैसे काम करता था जिससे एक कम्यून को अपना राइट्स और जस्टिस के साथ साथ जीने का का कला मिलता था । अब तो फ्रीडम ऑफ़ लाइफ है आप आजाद से अपनी हिसाब से जी सकते हो क्योंकि अब हमारा देश डैमोक्रेटिक है न इस्लामिक स्टेट है न हिन्दू स्टेट और यहाँ पोलिटिकल पार्टियाँ ही देश को मैनेज करते हैं ना कोई धर्म फैलाने वाला राजा; तो धर्म की लड़ाई क्यों? अगर रूढ़िवादी पोलटिकल पार्टियाँ पसंद नहीं तो हम सत्ता बदल सकते है । एक नई पोलिटिकल पार्टी बना के उससे अपना देश को समृद्ध कर सकते हैं उसकेलिये नई सोच की आवश्यकता है न की पुराने यूग के रूढ़िवादी संकीर्ण सोच की । वैसे तो देश में २००० से ज्यादा रजिस्टर्ड पोलिटिकल पार्टियां है; बात पोलटिकल पार्टियों से से ज्यादा पोलटिकल पार्टियों के सोच की और उनके पॉलिटीशन्स की नियत की है । हमरादेश में ज्यादा पोलिटिकल पार्टियां बनने से अच्छा पोलिटिकल रेफोर्मेसन (Reformation) की ज्यादा ज़रुरत है ।  उनके नीति से ज्यादा उनके नियत साफ़ होना ज्यादा जरूरी है । ऐसे लगता है आज की प्रमुख पोलिटिकल पार्टियां सोसिओपैथ्स की झुण्ड है जो अपनी संगठित लाभ केलिए काम करते हैं; जो देश केलिए कम अपने केलिए ज्यादा सोचते हैं । ऐसा नहीं की हर पोलरिटीशन बेईमान और सोसिओपैथ है जबकि ज्यादातर प्रमुख पोलिटिकल पार्टियां  प्रमुख सोसिओपैथ्स से ही संचालित होता है और अच्छे पोलरिटीशन उनके गुलाम यानी दास होते हैं जहाँ कुछ अच्छे करने का आजादी की दम घूंट दिया जाता है और अपने पार्टी के स्वार्थ को ज्यादा इम्पोर्टेंस दियाजाता है । रूढ़िवादी या सांप्रदायिक या अतिवादी  पोलिटिकल पार्टियां  अपने सोच भी बदल सकते है लेकिन जो ज्यादातर होता नहीं है । हर पोल्टीसिअन हमारे देश का मानव संसाधन होते हैं कोई एक पोलिटिकल पार्टी का दास नहीं जो उनकी कुत्ते के जैसे नमक हलाली करें । अगर ऐसे पोलटिकल पार्टियां है जिनको बस अपनी पोलिटिकल पार्टी का ज्यादा फ़िक्र है देश की नहीं वह कुत्ता पाललें पोल्टीसिअन्स नहीं ।  अगर पोलटिकल पार्टियों का प्रोटोकॉल और मोटिव गलत हो या वह उसमें सहज या गड़बड़ी महसूस करें व उससे छोड़ जो अच्छी पार्टी है उसमें जा सकते हैं या सब अच्छे पॉलिटिसिअन्स मिल के एक नइ सोच की पोलिटिकल पार्टी भी बनासकते हैं जो देश का सोचता हो अपने संगठित स्वार्थ की नहीं; ये जरूरी नहीं अगर कोई कल देश चलाता था वही सही है और उसकी हाथ में ही देश की डोर रहेगी । पार्टियों का सोच टाइम के साथ बदलना या गलत पार्टियों के विरुद्ध यानी उनके विरोध में अच्छी पार्टियां बनना एक अच्छे गणतंत्र की निशानी है । अक्सर हमको बुरा या ज्यादा बुरा और कम बुरा से एक को अपना देश की मुखिया चुनना पड़ता है; जिसको हमको बदलना होगा । देश की पोलटिक्स को उस लेवल तक लेना होगा जहाँ पर विकल्प (choice) अच्छा और उससे ज्यादा अच्छा से हम को अपना देश की मैनेजर चुनना पड़े । गणतंत्र ही हमारा बल है उसे हमें हर हाल में बचाया रखने की जरूरत है । अगर उसको बचानेकेलिए हमें हिंसा की सहारा लेने पड़े उससे पीछे हटना गलत ही होगा । क्यों की जैसे अपने जीवन का रक्षा करना एक प्राकृतिक अधिकार है वैसे ही गणतंत्र की रक्षा करना हमारा सामूहिक सामाजिक अधिकार है क्यों की गणतंत्र ही हमारा देश की जीवन है ।

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अगर बुद्ध विष्णु का अवतार हैं कभी ब्राह्मणों को बुद्ध की पूजा करते देखा है?

इंडिया का बुद्ध सभ्यता

हमारा देश का नाम ना भारत था, ना हिन्दुस्तान था, ना इंडिया; ये विशाल भूखंड सदियों छोटे बड़े राज्यों का मिश्रित समूह रहा, ये भूखंड समय के साथ राजाओं के राज से जाना जाता था । ये भूखंड अनेक भाषीय सभ्यता का भूखंड है । आज भी यहाँ १२२ प्रमुख भाषा और १५९९ अन्य भाषाएं देखने मिलते हैं । जितने तरह की प्रमुख भाषाएं है उतने ही भाषीय सभ्यता इस भूखंड पैदा किया । क्यों की वर्ण व्यवस्था संस्कृत भाषा में ही कंपोज़ किया गया है और दूसरे भाषाओं को ट्रांसलेट कियागया है इसका मतलब ये है गैर संस्कृत भाषीय सभ्यताओं के ऊपर वर्ण व्यवस्था को इम्प्लीमेंट कियागया है । पुराने युग में कोई वर्ण व्यवस्था नहीं थी । संस्कृत बोलनेवाले या इस भाषा को अपना पहचान मानने वाले धूर्त्तों ने वर्ण व्यवस्था पैदा किया जो की रिग वेद परुष सूक्त १०.९० में लिखित है । पुरुष सूक्त यानी वर्ण व्यवस्था सम्पूर्ण रूप से बुनियादी मानवाधिकारों का उल्लंघन करता है और आज तक इस व्यवस्था को इस भूखंड में क्यों संरक्षण दी जा रही है वह एक बड़ा प्रश्न है । संस्कृत भाषा इस भूखंड का कभी भी लोकप्रिय भाषा नहीं रहा; संस्कृत भाषा को  किसने और कब अपभ्रंश या ध्वंस किया कभी आपने सुना है? संस्कृत भाषा को आजाद इंडिया में संरक्षण यानी ऐकाडेमिकस में बाध्यता विषय बनाने का बावजूद ये आज तक कभी इस भूखंड का लोकप्रिय दूसरी या तीसरी लैंग्वेज भी बन नहीं पाया । संस्कृत सब भाषा की जननी है ये बात धूर्त्तो ने फैलाई और मूर्खोंने आपने अज्ञानता के वजह से इसका ऊपर अंधविश्वास किया । अगर ये इतनी पुरानी और लोकप्रिय होता इसका आज के बोलने वाले कभी १५ हजार से भी कम नहीं होते । इन धूर्त्तों ने गैर संस्कृत बोलनेवाले सभ्यता को अगड़ी और पिछड़ी में बांटा और ऐसे साजिश की पिछड़ा कभी अगड़ी ना बन पाए । इसलिये ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य की पहचान बनाई जो की वैदिक समाज में पुरुष सूक्त के अनुसार समाज की प्रमुख पेशा (professions) थी, इस प्रमुख वृत्तियां को उनलोगोंने आपने और अपना पीढ़ियों के लिए आरक्षित (reserve) कर दिया और उसकेलिये सरनेम का इस्तेमाल किया; इसलिये पुजारी वर्ग ज्ञान को रिज़र्व कर दिया ताकि उनके ज्ञान से दूसरे चलें; जब की क्षत्रीय को क्षेत्र; यानी पीढ़ीगत राज और प्रसिद्धि के साथ साथ यश का रिजर्वेशन मिला । जो ब्योपारी  वैदिक बनिया का पहचान अपनाया वह खुद को वैश्य कहने लगे, और इस वृत्ति को अपने पीढ़ियों के लिए रिज़र्व कर दिया यानी सब अच्छी पेसाओं (professions) को वह खुद और उनके बच्चों के लिए आरक्षित (reserve) कर दिया और ये तीन प्रमुख बृत्तियों को अपनानेवाले गोष्ठी/class फ्रीडम ऑफ़ प्रोफेशन को बंद यानी जड़ (freeze) कर दिया और समाज के रूलिंग क्लास बन गए; इन तीन प्रमुख बृत्तियों को छोड़ के जितने भी बृत्तियाँ थे उनको शूद्र यानी उनके गुलाम बताया गया । यानी ज्यादातर श्रम श्रेणी (labor class) ही शूद्र बने, जिन को वैदिक वर्ण व्यवस्था लागू करके रूलिंग क्लास यानी शासक वर्ग बनने से रोका गया । अगर इस धर्म का कोई स्वतंत्रता होता क्या कोई अपनी मर्जी से शूद्र बनना पसन्द करता? इसलिये जो शूद्र हैं उनको जबरन शूद्र बनाया गया है यानी ये पहचान उन पर जबरन थोपा गया है और उनको सदियों फ्रीडम ऑफ़ प्रोैफैशन अपनाने से रोका गया है ।  शूद्रों को ज्ञान प्राप्ति की इसलिए प्रतिबन्ध लगा दी गयी क्यों की ज्ञान प्राप्ति से वह शासक वर्ग न बन जाये और गुलामों की कमियां न हो जाये; इसीलिए न केवल ज्ञान; समानता, सम्मान, स्वस्थ जीवन के अधिकार, संपत्ति का अधिकार, समान अवसर और उचित न्याय से उनको सदियों वंचित किया गया बल्कि उनको सदियों प्रताड़ित भी कियागया । वर्ण व्यवस्था को अपनाना या जोर जबरदस्ती किसी राज की ऊपर थोपने के पीछे ये मनसा थी की तब का शासक वर्ग हमेशा शासक वर्ग बने रहे और श्रम श्रेणी हमेशा श्रम वर्ग । ये गोष्ठियां/professional classes कोई एक मूल से नहीं हैं क्यों के स्थानीय भूखंड के बदलते ही इनके सरनेम और उनकी मातृभाषा अलग अलग हो जाते हैं, जिसका मतलब ये है की ये कोई एक मूल स्रोत से पैदा श्रेणी नहीं है, अगर होते उनके सरनेम और उनकी मातृभाषा एक होता अनेक नहीं; बल्कि ये एक सोच की श्रेणी है जो की प्रोफेशन से बंटी हुई हैं जैसे आज देश तरह तरह की पोलिटिकल पार्टियों के सोच से बंटी हुई है । वह ब्राह्मण हो या क्षत्रिय, वैश्य हो या शूद्र यह एक एक वृत्तीय श्रेणी है जिनको वैदिक परुष सूक्त के अनुसार विभाजन किया गया है । इसलिए हर भाषीय सभ्यता जिन्होंने ये वर्ण व्यवस्था आपनाई या उन पर थोपा गया उनके भाषा और सरनेम बदलते रहते है लेकिन वह सब उनके बृत्तियोंसे वर्गीकृत हुए हैं । आंध्र का महार या ब्राह्मण के साथ गुजराती ब्राह्मण या महार की साथ कोई रिश्ता नहीं सिवाय  एक वृत्तीय वर्ग की, शूद्र वृत्तीय वर्ग को अनपर थोपा गया क्यों की वैदिक सामाजिक वर्ण व्यवस्था फ्रीडम ऑफ़ प्रोफेशन यानी  पेशे की स्वतंत्रता को पूरी तरह से प्रतिबंध लगा दिया था । यदि आप वर्ण व्यवस्था की मनोवैज्ञानिक विश्लेषण करेंगे ये आप को साफ़ साफ़ दिख जायेगा जिन राजाओं या सामाजिक सभ्यता वर्ण व्यवस्था को अपनाया उसी भाषीय सभ्यता की ही लोग चार वृत्तीय वर्ग में बंट गए; ज्यादातर उनके ही लोग जो धूर्त, बाहुवली या दबंग और बेईमान या सयाना ब्योपारी थे वह शासक बर्ग रूप में ऊंची जात यानी सबर्ण यानी अगड़ी बन गए और जो पिछड़ी उनसे थोड़ा कमजोर थे उनको  शूद्र यानी गुलाम बनाया गया । अगर आप मनोवैज्ञानिक विश्लेषण करें ब्राह्मण ही उनके अनुगामिओयों से ज्यादा अंधविश्वासी और तर्क अंध बने, जब की ज्यादातर उनके अनुगामी अज्ञानता, अंधविश्वास और तर्क अंधापन की सीकार के साथ साथ उनके उत्पीड़न के वजह से उनसे ज्यादा सहिष्णु, विनयशील, अनुशासित वर्ग बन गए । खुद की धूर्तता, चतुराई और शातिराना दिमाग इस्तेमाल करके दूसरों को बेवकूफ बना के बैठ बैठ के परजीवी की जैसे जीना और लोगों की जिंदगी और दिमागों को नियंत्रण करने के चक्कर में खुद की नस्लों को ही मानसिक विकृत बना डाला । आज तक निर्जीव मूर्तियों को ब्राह्मण घंटी बजा के उठाता है, फूल, चन्दन और बस्त्र से श्रृंगार करवाता है, सूंघ ने को अगरवती जलाता है, अंधेरे दूर करने को दीप जलाता है ताकि भगवान देख सके जब की खुद की दिमाग की अँधेरा दूर करने की जरूरत है; उनको संस्कृत की मंत्र यानी गाना सुनाता है, खाने को भोग देता है, और उन निर्जीव मूर्त्तियों के सामने जीवित जीवों की वली भी देता है; ये मानसिक विकृति नहीं तो क्या है? अगर आप आपकी मरे हुए कोई पालतू पशु की मूर्ति बना के वह सब करे जब वह जीवित था तो क्या आप इसको स्वस्थ दिमाग की हालत बोलेंगे या मानसिक विकृति? अगर वैसे ही आचरण आप अपने निर्जीव भगवान की मूर्त्तियों के सामने करते हो ये कैसा स्वस्थ दिमाग कहा जा सकता है? क्या इन निर्जीव मूर्तियओं के पास इंद्रियाँ है जो ये सबकी अनुभव करते हैं? जब एक सेर की मूर्ति आप को खा नहीं सकता, एक इंसान की मूर्ति आप को मदद नहीं कर सकता तो एक भगवान की मूर्ति आप को कैसे मदद कर सकता है? कभी आपने मूर्त्तियों के ऊपर चिड़िया को बैठते देखा है? अगर नहीं देखा तो देख ना, वह साधारण चिड़िया ये जानता है मूर्तियों से उस को खतरा नहीं क्यों की वह जड़ है; तो मूर्त्तिवादियों की क्या उस चिडियोंसे भी कम अकल है? या भगवान भ्रम उनको तर्क अंध बना देता है? आप इसको स्वस्थ दिमाग की निशानी कैसे मान सकते हैं? कोई भी चित्र, मूर्ति या चल चित्र केवल संज्ञान पैदा कर सकते हैं वह कोई प्रत्यक्ष क्रिया पैदा नहीं कर सकते । क्या कोई सेर की मूर्ति को आपने शिकार करते हुए देखा है? या गाय की मूर्ति दूध देते हुए? तो एक मूर्ति को जो आप भगवान के रूपमें पूजते हो न आप के पूर्वज उनको जीवित देखे थे ना आप की बाप दादा; उन मुर्तियों को श्रृंगार करने से, खाना खिलाने से (भोग) या उनके आगे जीवित जीवों की वली देने से या गाना (मंत्र या भक्ति गीत) सुनाने से क्या वह निर्जीव मूर्त्तियां आप को हैल्प कर देंगे? अगर आप को इतनी भगवान की लत है और आप का तर्क ये है भगवान दूसरों की रूप में मदद करता है तो मदद करनेवाला को ही भगवान मान लो! हैल्प करे कोई और नाम ले एक काल्पनिक या मरा हुआ एंटिटी की निर्जीव प्रतिमा? जिसकी दुकान खोल के ब्राह्मण बैठा है! क्या आप की दी गयी भेंट मूर्ति लेता है या ब्राह्मण ही चट कर जाता है? एक भक्त का पास कौनसा ऐसे यन्त्र है जो हैल्पिंग हैंड है उसकी भगवान की भेजा हुआ बंदा है वह जान लेता है? तो ये क्यों नहीं मानते जो हो रहा है सही है और हर वह चीज जो आप की जिंदगी में हो रहा है सब भगवान दूसरों की मदद से कर रहा है? यानी एक्सीडेंट, रोग, चोरी, रेप, हत्या, जितने भी बदतर चीजें हो रही हैं सब भगवान दूसरों की सहारे कर रहा क्यों की वह उसकी हिसाब से सही है? तो ना दुखी होने का ज़रुरत ना भगवान की पास जाने की जरूरत । अगर आप भक्ति नहीं भी करोगे आपकी भगवान जो चाहेगा वही होगा और जो अभी आप हो वह भगवान की मर्जी से हो । कोई काल्पनिक एंटिटी के आड़ में अपने आप को सही या गलत ठहराना, और अपने विचार और कर्मों की वजह से वह हुआ है उस को नकारना, क्या स्वस्थ दिमाग की निशानी हो सकता है? हैल्प करनेवाल एक गैर धर्मी या भगवान को ना मानने वाला भी तो होसकता है? जो केवल इनसानियत के नाते हैल्प करता हो? खुद की विकृत मन को समझाने के लिए प्रतीकात्मक का इस्तेमाल क्या अज्ञानता, मूर्खता और विकृति नहीं? अगर हेल्प की दुनिया केवल अपने भगवान की नाम से हो ये सियासी, चमचागिरी, पक्षपात और साम्प्रदायिकता नहीं है तो क्या है? वैसे हम ज्यादातर मरे हुए लोगों को याद करने के लिए उनकी मूर्ति का प्रतीकात्मक इस्तेमाल करते हैं, ना की उनसे रोबोट जैसे काम लेने के लिए । अगर मूर्ति या फोटो वाली भगवान को बात करने से या उनको चढ़ावा यानी भोग देने से भगवान की तुष्टीकरण यानी संतुष्टि हो जाता है और प्रसन्न होकर मनोकामना पूरी हो जाता है तो ये चीज हम अपनी जिंदगी में भी इस्तेमाल करना चाहिए । घर में आपने स्कूल जानेवाले बच्चों की फोटो के सामने खाना रखदो स्कूल में उनकी पेट भर जायेगा; और तो और कुछ लोगों को ड्यूटी में टिफिन लेने की जरूरत ही नहीं, पत्नी आपने घर में ही पति के फोटो के सामने खाना रखदे तो ऑफ़िस में खुद व खुद पतिका पेट भर जायेगा । अगर ऐसे नहीं होता तो आप इस सोच को क्या स्वस्थ सोच कहना पसंद करोगे? क्या आपको ये अहसास नहीं भगवान भ्रम पैदा करके कोई आपकी दिमाग को नियंत्रण कर रहा है? खुद ब्राह्मण अपनी मल द्वार मरते दम तक साफ़ करता है लेकिन वह हाथ जिससे वह अपना मल साफ़ करता है वह अछूत और मेहतर नहीं बनता, लेकिन जो उसकी मल को पर्यावरण को साफ़ रखने के लिए विस्थापित करता है उस को अछूत बोलता है; ये कौनसी ज्ञान की परिभाषा है? पुराने ज़माने में दबंग जैसे डाकू, चोर और लुटेरा क्या राजा नहीं बने? आप को ये सबूत भी मिलजाएँगे गाय चराने वाला भी राजा बना; क्या राजाओं की कोई पूर्वज हमेशा राजा होना जरूरी है या था? राजाओं के बच्चे कैसे अनुवंशीय राजा बने इसलिए कई राजाओंने इस वर्ण व्यवस्था को क्षत्रिय पहचान की रूप में अपनाया जब की ना अपनाते तो भी राजाओं के बच्चे कई सामाजिक व्यवस्था में राजा ही होते थे और अयोग्य होने पर कोई और हो जाता था । हर राजा को वैदिक सर्टिफिकेट क्षत्रिय की क्या जरूरत? क्या हम राजा सिकन्दर (Alexander the Great) और मुसलमान राजाओं को क्षत्रिय बोलते हैं? पुरुष सूक्त के अनुसार केवल राजा ही क्षत्रिय है ना की उनकी जमीन को रखवाली करनेवाले जमींदार (जैसे चौकीदार घर का पहरा देता है और उस को चौकीदार कहा जाता है; वैसे जमींदार राजाओं की जमीन की रखवाली करता था, जिस वृत्ति का पुरुष सूक्त १०.९० में कोई जिक्र ही नहीं है इसलिए उस को क्षत्रिय माना नहीं जा सकता) या जंग लड़ने वाला सिपाही या इन जैसे बृत्तियों के लोग । असली में क्यों के राजा की संख्या और उनकी वंशज कम थे उनकी संख्या यानी वैदिक पहचान अपनाने वाले राजाओं की संख्या यानी क्षत्रिय की संख्या कम ही होगी; यानी ये अब एक करोड़ से भी कम होंगे । अब जो खुद को क्षत्रिय की सर्टिफिकेट देते हैं वह दरअसल उपलिफ्टेड यानी अगड़ी शूद्र है जो आपने आप को शूद्र कहलवाना पसंद नहीं करते हैं और उनको इस बात का शर्म आता है, और खुद को ऊँची जात कहलवाने में सान महसूस करते हैं यानी खुद को वेद की गुलाम कहने में सान महसूस करते हैं; इसीलिए आप को कई ऐसे लोग मिलजाएँगे आज तक खुद की वर्ग को क्षत्रिय बनाने के चक्कर में आज भी लगे हुए हैं; अगर वह क्षत्रिय होते आज उनको क्षत्रिय होने की संघर्ष करने की क्या जरूरत है? क्या जो गैर वर्ण वाले समाज में लोग हैं वह इंसान नहीं? वह क्या आपने आप को वर्ण से बाँटते हैं? इंडिया को छोड़ के आपने कहीं वर्ण व्यवस्था देखा है? क्या उनका राजा राजा नहीं? उनका पुजारी पुजारी नहीं? या उनके व्यापारी व्यापारी नहीं? कभी आपने इंडिया की वैदिक अनुगामियों को छोड़ के पुजारी के लिए ब्राह्मण पहचान, राजा के लिए क्षत्रिय पहचान या व्यापारी के लिए वैश्य की पहचान इस्तेमाल करते देखा है? हमारे लोगों को वैदिक वर्ण का सर्टिफिकेट का क्या जरूरत? क्या वैदिक वर्ण व्यवस्था की सर्टिफिकेट की भूख यानी झूठी सान की ऊँची वर्ग का नशा क्या दिमागी पागलपन नहीं है? पूर्वजों की बृत्तियों के वैदिक सर्टिफाइड सरनेम वर्तमान की पीढ़ियों को क्या जरूरत? अब तो मेहतर, महार यानी वैदिक सर्टिफाइड अति शूद्र यानी दलितों की बच्चे भी डक्टर, इंजीनियर वकील बनते हैं, उनको अपने पूर्वजों की काम से सामाजिक पहचान देने के पीछे क्या लॉजिक है? क्या आप को नहीं लगता कुछ रूढ़िवादी लोग वर्ण व्यवस्था जैसे अंधविश्वास को  कायम रखने के कोशिश में है? यानी अपने ही लोगों को बांटना और उनके जिंदगी और उनके दिमाग को आपने स्वार्थ या संगठित स्वार्थ के लिए नियंत्रण करना उनके मक़सद है? यही सोच हमारे अखंड भूखंड को सदियों बाँटता आ रहा है और हर सम्पदा से भरपूर रहने के बावजूद देश हमेशा दूसरों देशों से हमेशा पिछड़ा रहा है क्यों की यहां के गंदी पॉलिटिसियानस इस वर्ण व्यवस्था और धर्म को मोहरा बना के आपने राजनीति की दुकान कायम रखना चाहते है और हमारी दी गयी टैक्स को चोरी करके सदियों देश को लूटने की चक्कर में रहते हैं । एक नेशन एक हि तरह की सिटीज़न बनने नहीं दे रहे हैं अगर एक जुट हो जायें तो उनकी दुकान कैसे चलेगी? इसलिये लोगों को वर्ण और धर्म से तोड़ा जा रहा है और तोड़ने वाले कोई नहीं वही स्वार्थी मतलबी संगठित सोसिओपैथस हैं । क्या आप जानते है देश स्वाधीन होने के वाद हमारे देश के ही लुटेरों ने  यानी सफ़ेदपोस अपराधी (वाइट हॉटेड/कलर क्रिमिनल्स) १०० ट्रिलियन डॉलर्स से भी ज्यादा धन काले धन के रूप में बहार रखे हुए हैं? वर्ण व्यवस्था क्यों की ब्राह्मणों का नियंत्रित सामाजिक व्यवस्था था  इसलिए अवसरवादिता उनके हात में ही था । इसलिए जब विदेशी ज्ञान जैसे इंजीनियरिंग या एलोपैथिक चिकित्सा का ज्ञान इत्यादि इत्यादि देश में फैला उनके अगड़ी यानी सवर्ण वर्ग ही ज्यादातर स्किल्ड होने का अवसर ले ली इसलिए आप को अब ज्यादा स्किल्ड प्रोफेशनलस उनके वर्ग के ही मिलजाएँगे; लेकिन दुःख की बात ये है ज्यादातर ये आप को विदेशी मुल्क में भी मिलेंगे क्यों के ये मौका परस्त भी हैं । ये इस भूखंड की मिट्टी, हवा और लोगों से पले बड़े लेकिन जब इस भूखंड को सेवा देना का समय आया तो गुलामी करने अमेरिका, कनाडा जैसे देश को भाग गए ।  ज्यादातर वाइट हॉटेड संगठित सोसिओपैथस वैदिक सर्टिफाइड सबर्ण ही हैं । इसका मतलब ये नहीं के वैदिक सर्टिफाइड शूद्र पुरे पाक साफ़ है । अपराधी जात और धर्म नहीं देखते हैं क्यों की उनके डिजायर उनके कंट्रोल में ही नहीं रहता इसलिए अपने डिजायर को फुलफिल करने के लिए वे किसी भी तरह की अपराध करने से नहीं चुभते । वैदिक वर्ण व्यवस्था  ज्यादातर वाइट हॉटेड क्रिमिनल्स को ही सदियों सवर्ण सर्टिफिकेट देकर अपलिफ्ट किया है और उनको सदियों वाइट हॉटेड क्रिमिनाल बनाता आ रहा है जब की उनके हर पीढी के हर संतान वाइट हॉटेड क्रिमिनल था या है कहना पूरी तरह से गलत होगा ।

सदियों इस भूखंड का नाम उनके राजाओं के राज से पहचाना जाता था ।  इस भूखंड का सबसे बड़ा राज्य मौर्य साम्राज्य बना जो की एक बौद्ध सम्राज्य था । यानी हमारे ज्यादातर पूर्वज बौद्ध धर्मी थे; क्यों के बुद्धिज़्म 263BC के बाद विश्व का सबसे बड़ा प्रमुख धर्म यानी मेजर रिलिजियन था; जब की वैदिक धर्म 185BC के बाद ही केवल इस भूखंड का प्रमुख होने की कोशिश की, ईसाई धर्म 33AD के बाद बना और इस्लाम 610AD के बाद ही दुनिया में आया, जब इस्लाम राजाओंने इस भूखंड में राज किये यानी 700AD के बाद ही हिन्दू धर्म का उत्पत्ति हुई । बौद्ध धर्म तार्किक धर्म था जो की ईस्वर, मूर्ति पूजन, बहु देवबाद, अंधविश्वास, असामंज्यता,  ऊंच नीच,  छोटे बड़े,  छुआ छूत, वर्ण व्यवस्था, हिंसा इत्यादि असामाजिक चीजों का घोर विरोध करता था । बौद्ध धर्म मानव समाज को एक ही परिवार मानता था । जबकि वैदिक धर्म अपने अनुगामियों को ही जात पात, बड़ा वर्ण छोटा वर्ण से अलग करते हैं, जिनसे एक परिवार का सोच भी मूर्खता होगी; जो की असलियत में वंशावली मालिक और गुलाम की व्यवस्था है । क्यों की वर्ण व्यवस्था इसी भूखंड का धूर्त्तों की बनायीं गयी संकीर्ण सोच थी इस भूखंड से बाहार जा नहीं पाया; जब की बौद्ध धर्म उसकी व्यापकता ज्ञान के वजह बिना हिंसा, बिना छल और बल, और बिना धूर्तता के बहुत सारे जगह फैल गया । बौद्ध धर्म को हिंसा के सहारे या अपभ्रंस करके ख़तम किया गया । 263BC से 185BC तक ये भूखंड बौद्ध साम्राज्य के नाम से जाना जाता था । बौद्ध धर्म से पहले इस भूखंड का कोई प्रमुख धर्म(major religion) नहीं था । 185BC में वैदिक ब्राह्मण सेनापति पुष्यामित्र शुंग ने राष्ट्रद्रोह करके धोखे से last Mauryan Empire की राजा बृहद्रथ का हत्या की और मौर्य साम्राज्य को हथिया लिया । ये सेनापति कोई युद्ध करके नहीं बल्कि अपने मालिक को धोखा देकर बेईमानी से हथिया लिया था । समय के साथ वैदिक प्रचारकों ने बौद्ध धर्म और इस भूखंड में जितने भी तार्किक धर्म थे उनको न केवल प्रदूषित किया उनको नष्ट भी किया और कुछ को अपने धर्म की छत्रछाया में ले आए । बौद्ध धर्म को समूल खत्म करने की कोशिश हुई । पुष्यमित्र शुंग ने बौद्ध सन्याशियोंका सामूहिक नर संहार किया । आतंक, दहशत, छल और बल, साम, दाम, दंड, भेद से मनुस्मृति को लागू करके वैदिक वर्ण व्यवस्था को जबरन हर गैर संस्कृत भाषी सभ्यता के ऊपर लागू किया गया । हर भाषीय सभ्यता के धूर्त, दबंग और बईमानों को अगड़ी यानी सबर्ण बनाया गया और पिछड़ों को उनके गुलाम यानी शूद्र । इस तरह अशोका की बुद्धिस्ट किंगडम अगड़ी और पिछड़ी दो समुदाय में बंट गया और समय के साथ ऐसे ही वैदिक धर्म फैलता चलागया । संगठित पुजारीवाद जो अपने आप को ब्राह्मणवाद का पहचान दी असलियत में हर भाषीय सभ्यता की धूर्त, शातिर और चालाक मूल निवासी थे, लेकिन ये जरूरी नहीं है की उनकी हर पीढी के हर संतान उनके ही जैसे सम्पूर्ण धूर्त, शातिर और चालाक हैं; जिन्होंने ब्राह्मणवाद को भक्तिवाद से जोड़ा और भगवान की नाम पे एक पोलिटिकल मूवमैंट चलाई जिससे हर गैरवैदिक धर्म यहाँ विलुप्त हो गया । इनलोगोंने झूठ, अंधबिस्वाश, अज्ञानता, मूर्त्तिवाद, छुआ छूत, ऊंच नीच इत्यादि सामाजिक बुराईयां धर्म के नामपे फैलाई और यहाँ की हर पीढी उनके फैलाई हुई झूठ को ही अपना पहचान की उत्पत्ति मान ली । इनलोगोंने अपनी मन गढन कहानियों को इतिहास बताया और हर पीढ़ी को भ्रम में डाला । इसीलिए ब्रम्हा, विष्णु, महेश जिनका कोई जैविक उत्पत्ति नहीं फिर भी इंसान की जैसे दीखते हैं और ये हर स्क्रिप्चर में स्पष्ट से  लिखा है  की वह सब मन से पैदा हुए हैं यानी काल्पनिक है फिर भी इनलोगोंने उनके अनुगामियों को ये अहसास दिलादिया के वह सब सत्य है । इस भूखंड का ज्यादातर मूल निवासी उनके झांसा में आ गये और वैदिक धर्म 185BC के वाद इस भूखंड का सबसे बड़ा धर्म बन गया । वर्ण व्यवस्था के वजह से इस भूखंड का सबसे बड़ा श्रेणी गुलाम यानी शूद्र बन गया । क्यों के ज्यादातर अनुगामी बुद्धिस्ट थे उनको जान सुनकर उत्पीड़ित किया गया और सदियों हर चीजों से बंचित किया गया । जब 700AD के बाद बाद मुसलमान आक्रमणकारियों इस भूखंड में आये तो सिंध भाषीय सभ्यता नाम से प्रेरित उनके राज(kingdom) के नाम रखे जैसे अल-हिन्द, इंदोस्तान, हिन्दुस्तान इत्यादि । अल-हिन्द, इंदोस्तान, हिन्दुस्तान इत्यादि शब्द का इस्तेमाल हमारे भूखंड में पैदा कोई भी स्क्रिप्चर में नहीं मिलेंगे; यहाँ तक की हिन्दू शब्द भी नहीं मिलेगा ना वैदिक धर्म माने वालों का भगवान हिन्दू थे ना उनके अनुगामियों के नाम हिन्दू । हिन्दू पहचान इस्लामी राज में ही दियागया पहचान है । मुसलमान आक्रमण कारियोंने यहाँ की कुछ मूल निवासियों के ऊपर अपनी धर्म को जबरन इम्प्लीमेंट किया; लेकिन ज्यादातर शूद्र और अतिशूद्र यानी Out Caste यानी वर्ण व्यवस्था से बाहर, जो की सदियों वैदिक सबर्णों से उत्पीड़ित रहे वह ज्यादातर इस्लाम धर्म क़बूल ली ।  जो मुसलमान अब जिस भाषीय सभ्यता के मिट्टी से जुड़ा है उनके पूर्वज भी उसी मिट्टी से जुड़े थे अगर कोई स्थानान्तरण का मसला ना हो तो वह उसी ही भाषीय सभ्यता की ही मूल निवासी है और समय के साथ इस्लाम क़बूली है । इसका मतलब ये है गुजरात में दिखने वाले मुस्लिम, गुजराती मूलनिवासी से ही मुसलमान बने हैं, आंध्र का मुसलमान आंध्र की तेलुगु भाषीय मूलनिवासी हैं, मराठा में दिखने वाले मुस्लिम मराठी भाषीय मुलनिवाशियोंसे ही इस्लाम क़बूली है इत्यादि इत्यादि । यहां को इस्लाम लाने वाले विदेशी इस बहु भाषीय सभ्यता में विलीन हो गये हैं जिनका कोई अनुवंशीय सत्ता और नहीं है । यहाँ दिखने वाले मुस्लिम 97% से ज्यादा यहाँ के मूलनिवासी है और 3% से भी कम विलीन विदेशी मुल्क की वंशज । नगरी (नगर की भाषा जिसका परिवर्तित नाम हिंदी है) भाषा में कुछ पार्सी और आरबीक शब्द मिला के उर्दू भाषा को 1600AD के वाद मुसलमान राजाओं की राज में यहाँ की मुसलमानों की मातृभाषा बना दी गयी है जब की उनकी मिट्टी से जुड़ी उनके सेकेण्ड लैंग्वेज ही उनकी पूर्वजों की मातृभाषा थी । क्यों के इस्लाम की राज में मुसलमानों को गैर मुसलमानों से अलग करना था तो इस्लाम शासकों ने गैर मुसलामानोंको हिन्दू पहचान दे दी; जो की तब का ज़्यदातर बुद्धिजीम से कनवर्टेड वैदिक अनुगामियों का पहचान बन गया । असलियत में देखो तो हिन्दू का मतलब इस्लाम राजाओं का गुलाम ही होगा ।  हिन्दू पहचान जो की शिन्दु नदी और शिंद प्रोविंस यानी शिन्दु सिविलाइज़ेशन से आया है; ३००० साल पहले तब शिन्दु पहचान था की नहीं कौन जानता है? कोई क्या अपने आप को मुसलमानों की गुलाम कहलवाना पसंद करेगा? ये दरअसल अज्ञानता की सबूत है की वैदिक धर्म फैलाने वाले अपने धर्म को फैलाने के लिए हिन्दू पहचान का चोला पहना हुआ है । वैदिक धर्म दरअसल शैवजिम, वैस्नबजिम, सक्तिजिम, मूर्त्तिवाद की बहुदेववाद की अगुवाई करता है और ये समूह विश्वास यानी आस्था को हिन्दुइजम कहाजाता है । शिन्दु भाषीय सभ्यता से गैर सिंद्धु सभ्यता जैसे पंजाबी, पाली/ओड़िआ, खरीबोलि/नगरी/नागरी/हिंदी, तेलुगु, तामील इत्यादि इत्यादि भाषीय सभ्यता से क्या सम्बद्ध? अब partition के बाद सिंध भूखंड शिंद प्रोविंस के नाम से पाकिस्तान का हिस्सा है और शिन्दु नदी भी पाकिस्तान में बहता है । शिंद प्रोविंस का ज्यादातर मुलनिवाशी अब मुसलमान हैं जब की उनके नाम से एक बड़ा वर्ग जबरन हिन्दू के नाम से जाना जाता है जो की मुर्खोंकी फैलाई गयी पहचान है । इस भूखंड का सबसे बड़ा अखंड राज्य मौर्य साम्राज्य था ।  इस्लाम आया तो उनके राज में इस भूखंड का पॉपुलर पहचान हिन्दुस्तान बना । अंग्रेज 1600AD के बाद आये और इसका सेक्युलर पहचान इंडिया रख दिया ।  क्यों की ये भूखंड और हमारे पूर्वज ज्यादातर बुद्धिस्ट अनुगामी थे, बुद्ध के वारे में जानना हर किसी का कर्त्यब्य है; वह हिन्दू हो या मुस्लिम, सिख हो या ईसाई, हर प्रमुख धर्म से बुद्धिजीम पुराना है । हिन्दू धर्म पुराना नहीं लेकिन वैदिक धर्म जरूर हिन्दू धर्म से पुराना है ।  प्रमुख धर्म के हिसाब से बुद्धिजीम वैदिक धर्म से भी पुरानी है । असोका की राज में यानी 263BC से 185BC तक बुद्धिजीम प्रमुख धर्म था यानी सबसे ज्यादा माना जानेवाल धर्म(Major faith) । 185BC से पहले वैदिक धर्म उत्तर इंडिया में कुछ ही जगह में शायद फैला हुआ था । जब पुष्यमित्र शुंग इंडिया की सबसे बड़ा बुद्धिस्ट अखंड राज्य को धोखे से हथिया लिया वहीं से ही बुद्धिजीम का पतन सरु हुआ और वैदिक सभ्यता की उत्थान हुआ । यानी सत्य और तार्किक सभ्यता (बौद्धिक) की विलुप्ति हुई और झूठ, अंधविश्वास, छुआ छूत, में बड़ा तू छोटा, और तर्कहीन (irrational) सभ्यता (वेदांत) की शुरुआत हुई । हिन्दू धर्म इसलामीक आक्रमण के वाद यानी 700AD के वाद इस भूखंडमें ही पैदा हुए सब धर्म का एक समूह नाम है जब की वेदांत ने हर किसी का ख़ात्मा करके आज अपने आप को सबसे बड़ा धर्म का दावा करता है; जबकि इस भूखंड में वैदिक धर्म का ही अनेक विरोधी थे ।

समय के साथ मौत के भय के कारण और बौद्ध सन्यासिनियों को उत्पीड़न के वजह से ऐसे भी हुआ होगा कुछ बौद्ध सन्यासी अपने आप को वैदिक कनवर्टेड ब्राह्मण का चोला पहने को मजबूर हुए होंगे, क्यों की ना उनका पास क्षत्रिय होने का बाहुबल या संपत्ति हुई होगी; ना व्यापारी होने का धन ना उनको शूद्र कहलवाना पसंद हुआ होगा । बरना जो वैदिक प्रथा हिंसा और वली की प्रथा को जोर देता हो, वह अहिंसा और शाकाहारी की अनुगामी कैसे हो सकते हैं? क्यों की वैदिक मान्यता के अनुसार “पुरुष” की वली से ही वर्ण पैदा हुआ है; यानी हिंसा वैदिक धर्म की उत्पत्ति से ही निहित है । कुछ भी चीज अग्नि को समर्पित करना (हवन या यज्ञ) यानी ध्वंस करना हिंसा नहीं तो क्या है?  वैदिक धर्म फ़ैलनेके वाद क्यों के ब्राह्मणों को मनुस्मृति में ज्यादा प्रध्यान और सुविधायें दी गयी थी; तो इस बात का फ़ायदा अनेक धूर्त मूल निवासियां भी  उठाया होगा और दूसरों की अनजाने में अपने आप को ब्राह्मण बना के वर्ग का फ़ायदा ली होगी । तब क्या कोई आइडैंटिटी कार्ड हुआ करता था जिससे लोगों की पहचान की डायरी मेन्टेन हुआ होगा? क्यों की राजा अशोक ने अपने राज्य में किसी भी तरह की पशु वली की रोक लगाई  थी और ये अवमानना के लिए कठोर दंड का प्रणयन किया था; जो भी वैदिक ब्राह्मण वली देकर उनका गुजारा चलाते हुए होंगे अपना जीविका हराया होगा और उस अवधि में शाकाहारी होने को मजबूर हो गए होंगे; क्यों के पुरषमेध यानी पुरुष की वली, अश्वमेध यानी घोड़े का वली, गोमेध यानी गाय की वली  यज्ञ में इस्तेमाल होना केवल वैदिक धर्म और उनकी शास्त्र में मिलते हैं किसी दूसरे शास्त्रों में नहीं; शाकाहारी होना बाद में ये उनके वर्ग के लिए शायद एक सुधार हुआ होगा । संगठित पुजारीवाद जो वैदिक धर्म को फैलाया वह ही वर्ण व्यवस्था आज तक समाज में संरक्षित करते आ रहे हैं । जैसे कोई गैर अंग्रेज मूल निवासी खराटे अंग्रेजी बोलने से अंग्रेज मूल निवासी नहीं हो जाता वैसे ही कोई दो चार संस्कृत मंत्र बोलने से या उनके नाम के पीछे ब्राह्मण की पहचान वाली सरनेम लगाने से वैदिक वंशज नहीं बन जाता अगर ये एक वंश से होते या एक रेस से होते इनकी मातृभाषा एक होती और उनके सरनेम भी एक होता ना की आज का केवल करीब ६ करोड़ ब्राह्मणोंका ५०० से भी ज्यादा सरनेम होते ना भूखंड बदलते ही उनकी मातृभाषा बदल जाती । अगर संस्कृत मातृभाषि वैदिक नस्ल नहीं हैं, तो वर्णवाद इस भूखंड में पैदा एक सबसे घटिया संकीर्ण सोच और अंधविश्वास है जिसको चतुर और धूर्तोंने (sociopaths) बनाया और चतुराई से लोगों के ऊपर लागू किया और झूठी भगवान की दुनिया बना के उनके अनुगामियों की जिंदगी और दिमाग को भगवान के नाम पर नियंत्रण करते आ रहे हैं । ये साफ़ साफ़ संगठित पुजारीवाद है जिन्होंने वैदिक पुजारी यानी ब्राह्मणवाद को अपनाया और वर्ण व्यवस्था को फैलाया जैसे आज की समय में कोई पोलटिकल पार्टी देश की किसी कोने में बनती हैं और उसकी प्रसार देश की दूसरे प्रान्त तक हो जाती हैं । पोलटिकल पार्टी के प्रोटोकॉल से पार्टी चलता है, देश की हर कोने में उनके पार्टी के पॉलिटिशियन, लीडर, मैंबर और वोटर बन जाते हैं । इसलिए अब जो ब्राह्मण वर्ग दीखते हैं उसमें कितनी असली वैदिक वंशज हैं, कितने परिवर्तित और छद्म ब्राह्मण हैं कहना मुश्किल है । लेकिन उनके सरनेम  से कुछ कुछ अर्थ निकाला जा सकता है; और किस नाम के पीछे क्या अर्थ है वह करीब करीब अंदाजा लगाया जा सकता है । जैसे चतुर्वेदी, त्रिवेदी, द्विवेदी यानी चार, तीन, और दो वेद पढ़नेवाले वर्ग इसका मतलब ये साफ़ है ये मूल वंशज नहीं है ये परिवर्तित हैं क्यों की उनको कुछ वेदों को पढ़ने का ही अनुमति थी या उनका कोई पूर्वज उतना ही वेद पढ़ा था या ज्ञान की अधिकारी थे; अगर वैदिक वंशज होते तो उनके नाम करण पढाइके हिसाब से नहीं होता । आप को त्रिपाठी सरनेम भी मिल जायेंगे जिसका मतलब है तीन (त्रि) पाठ की पढाई जो की वेद से सम्पर्कित नहीं है इसका मतलब ये सरनेम बुद्धिस्ट ओरिजिन से हो सकता है, जो बुद्धिस्ट सन्यासी बौद्ध ज्ञानसम्पदा “त्रिपिटक” की ज्ञानी थे उनके छाप इस नाम में छुपाये होंगे । वैसे आप अगर सरनेम को डिकोड करो आपको इसमें छुपा क्लू भी मिलजाएँगे । आज के करीब ६ करोड़ ब्राह्मणों में केवल १५ हजार से भी कम पूरी तरह से संस्कृत बोलने का दावा करते है, तो बाकी ब्राह्मणों को अगर अपनी मातृभाषा बोलना ही नहीं आता तो ये कैसे मानाजाये वह वैदिक वंशज से संबंधित हैं? जैसे यहाँ के इस्लाम को परिवर्तित मुसलमान आरबीक क़ुरान पढ़ के आरबी नहीं बन जाएंगे वैसे ही जो पुजारी वैदिक ब्राह्मण पहचान अपनाया, दो चार संस्कृत मंत्र बोल कर क्या वैदिक वंशज बन जाएंगे? अगर अपना मातृभाषा संस्कृत ही नहीं है तो हर भगवान संस्कृत मंत्र ही क्यों समझता है? केवल संस्कृत भाषा में भगवान को संवाद करने के पीछे क्या राज है? ये संस्कृत की दलाली या गुलामी क्यों?

इस भूखंड में दो तरह की दर्शन और उससे बनी धर्म बने; एक तर्कसंगत(Rational) और दूसरा तर्कहीन(Irrational); आजीवक, चारुवाक/लोकायत, योग, बौद्ध, जैन और आलेख इत्यादि इत्यादि बिना भगवान और बिना मूर्ति पूजा की तर्कयुक्त धर्म और दूसरा बहुदेबबाद, मूर्ति पूजन, अंधविश्वास, तर्कविहीन, हिंसा, छल कपट और भेदभाव फैलाने वाला वैदिक जैसे धर्म । अब वैदिक धर्म को सनातन और हिन्दू धर्म भी कहा जाता है, जो वैदिक वर्ण व्यवस्था के ऊपर आधारित है । राजा अशोक ने इसीलिए बौद्ध धर्म अपनाया था, क्यों के उन्हों ने पाया बौद्ध धर्म ही उनकी राज्य और प्रजा के लिए  सही दर्शन और धर्म है । उनहोंने पाया बुद्ध(563/480BCE–483/400BCE) ना खुद को भगवान माना ना कोई भगवान की प्रचार और प्रसार की । उनकी दर्शन प्रेम, करुणा, सेवा, अहिंसा, सत्य और तर्क की दर्शन पर आधारित थी ।  बुद्ध ने बहुदेबबाद और मूर्ति पूजन को नाकारा लेकिन आस्था उनकी सत्य और तर्क के ऊपर ही था । सिद्धार्था गौतम ने अपने आप को कभी भगवान की दर्जा नहीं दी ना कभी भगवान की आस्था को माना । ना वह खुद को भगवान की दूत बोला ना उनकी संतान; अगर वह भगवान की आस्था को मानते तो भगवान की वारे में उनकी विचारों में छाप होता । ना उनकी दिखाई गयी मार्ग में भगवान की जिक्र है ना उनकी कोई दर्शन में । इसलिए सिद्धार्था गौतम आज के वैज्ञानिक सोच वाले इंसान थे जिनका सोच ये था तार्किक बनो, सत्य की खोज करो, उसकी निरीक्षण और विश्लेषण करो उसके बाद अपनी तार्किक आधार पर सत्य की पुष्टि करो । आंख बंद करके अपने पूर्वज की पीढ़ी दर पीढ़ी अपनाया गया अंध विश्वास की चपेट मत फंसो; ना अंध विश्वास को यूँही स्वीकार कर लो क्यों की आपसे बड़े, गुरु और बुजुर्ग इसको मानते हैं; अपने खुद की दिमाग की विकास करो और बुद्धि की हक़दार बनो जिसके आधार पर आप उनकी अंध विश्वास को दूर कर सको । उनकी आस्था सत्य और तर्कसंगतता के ऊपर थी, उनकी आस्था मानवता, करुणा, प्रेम, अहिंसा और सेवा के ऊपर थी । आपने  “बुद्धं शरणं गच्छामि, धर्मं शरणं गच्छामि, संघं शरणं गच्छामि” के वारे में जानते होंगे जिसका सही अर्थ है “में बुद्धि यानी ज्ञान के सरण में जा रहा हूँ, में सत् कर्मों की सरण में जा रहा हूँ, में बुद्धिजीवियों के सरण में जा रहा हूँ ” यहाँ पर बुद्ध का मतलब “सिद्धार्थ गौतम” नहीं “बुद्धि यानी ज्ञान” ही है । सिद्धार्थ गौतम क्यों की सत्य, तर्क, मानवता, अहिंसा, सेवा, प्रेम और करुणा का प्रेरणा है उनकी मूर्ति को बस प्रेरणा का प्रतीक माना जाता था ना भगवान की जैसे हम आपने बाप दादाओं की तस्वीर उनके याद में लगते है ठीक वैसे ही । सिद्धार्थ गौतम ने ना कभी वेद को स्वीकार किया ना उन में लिखी हुई बातें और उनकी भगवान को स्वीकार किया अगर ऐसे होता तो उनके शिक्षा में उसका छाप जरूर होता । जबकि वैदिक धूर्त्तों ने उनके समालोचक सिद्धार्थ गौतम को ही विष्णु की अवतार बता कर उनको अपनी धर्म की छतरी के नीचे लाकर उनको भगवान बना के बहुदेववाद की मूर्त्तिवाद के श्रेणी में लाया और उनकी व्यापारी करण भी कर डाला । सिद्धार्था गौतम की मृत्यु के बाद उनके दर्शन से छेड़ छाड़ किया गया; क्योंकि सिद्धार्था गौतम बहुदेब बाद और मूर्ति पूजा की विरोधी थे ये संगठित पुजारीबाद का पेट में लात मारता था । इसलिये सिद्धार्था गौतम की मृत्यु की बाद उनकी सिद्धान्तों की अनुगामी पुजारीबाद की षडयंत्र की शिकार बना और बुद्धिजीम “हिन जन” यानी “नीच लोग” / “नीच बुद्धि” और “महा जन” यानी “ऊँचे लोग” / “उच्च बुद्धि” में तोड़ा गया; हाला की बाद में इसको अलंकृत भाषा में हीनयान और महायान शब्द का इस्तेमाल किया गया । सिद्धार्था गौतम जी के निर्वाण के मात्र 100 वर्ष बाद ही बौद्धों में मतभेद उभरकर सामने आने लगे थे । वैशाली में सम्पन्न द्वितीय बौद्ध संगीति में थेर भिक्षुओं ने मतभेद रखने वाले भिक्षुओं को संघ से बाहर निकाल दिया । अलग हुए इन भिक्षुओं ने उसी समय अपना अलग संघ बनाकर स्वयं को ‘महासांघिक’ और जिन्होंने निकाला था उन्हें ‘हीनसांघिक’ नाम दिया जिसने समय के साथ  में महायान और हीनयान का रूप धारण कर लीया । इस तरह  बौद्ध धर्म की दो शाखाएं बनगए, हीनयान निम्न वर्ग(गरीबी) और महायान उच्च वर्ग (अमीरी), हीनयान एक व्यक्त वादी धर्म था इसका शाब्दिक अर्थ है निम्न मार्ग । हीनयान संप्रदाय के लोग परिवर्तन अथवा सुधार के विरोधी थे । यह बौद्ध धर्म के प्राचीन आदर्शों का ज्यों त्यों बनाए रखना चाहते थे । हीनयान संप्रदाय के सभी ग्रंथ पाली भाषा मे लिखे गए हैं । हीनयान बुद्ध जी की पूजा भगवान के रूप मे न करके बुद्ध जी को केवल बुद्धिजीवी, महापुरुष मानते थे । हीनयान ही सिद्धार्था गौतम जी की असली शिक्षा थी । राजा अशोक ने हीनयान ही अपने राज्य में फैलाया था । मौर्य साम्राज्य बुद्धिजीम को ना केवल आपने राज्य में सिमित रखा उस को पडोसी राज्य में भी फैलाया । जहाँ जहाँ तब का समय में बौद्ध धर्म फैला, बुद्ध की प्रतिमा को बस आदर्श और प्रेरणा माना गया ना कि भगवान की मूर्ति  इसलिये आपको आज भी पहाडों में खोदित बड़े बड़े बुद्ध की मूर्त्तियां देश, बिदेस में मिलजाएँगे । ये मूर्त्तियां प्रेरणा के उत्स थे ना कि भगवान की पहचान । वैदिक वाले  उनको विष्णु का अवतार बना के अपने मुर्तिबाद के छतरी के नीचे लाया और उनको भगवान बना के उनकी ब्योपारीकरण भी कर दिया । बुद्धिजीम असलियत में संगठित पुजारीवाद यानी ब्राह्मणवाद के शिकार होकर अपभ्रंश होता चला गया । हीनयान वाले मुर्तिको “बुद्धि” यानी “तर्क संगत सत्य ज्ञान” की प्रेरणा मानते हुए मुर्ति के सामने मेडिटेसन यानी चित्त को स्थिर करने का अभ्यास करते हैं जब की ज्यादातर महायान वाले उनकी मूर्ति को भगवान मान के वैदिकों के जैसा पूजा करते हैं । महायान की ज्यादातर स्क्रिप्ट संस्कृत में लिखागया है यानी ये इस बात का सबूत है बुद्धिजीम की वैदिक करण की कोशिश की गयी । उसमे पुनः जन्म, अवतार जैसे कांसेप्ट मिलाये गए और असली बुद्धिजीम को अपभ्रंस किया गया । जो भगवान को ही नहीं मानता वह अवतार को क्यों मानेगा? अगर अवतार में विश्वास नहीं तो वह क्यों पुनर्जन्म में विश्वास करेगा? महायान सिद्धार्था गौतम जी की यानी बुद्ध की विचार विरोधी आस्था है जिसको अपभ्रंश किया गया; बाद में ये दो सखाओंसे अनेक बुद्धिजीम की साखायें बन गए और अब तरह तरह की बुद्धिजीम देखने को मिलते हैं जिसमें तंत्रयान एक है । तंत्रयान बाद में वज्रयान और सहजयान में विभाजित हुआ । जहां जहां बुद्धिजीम फैला था समय के साथ तरह तरह की सेक्ट बने जैसे तिबततियन बुद्धिजीम, जेन बुद्धिजीम इत्यादि इत्यादि । हीनयान संप्रदाय श्रीलंका, बर्मा, जावा आदि देशों मे फैला हुआ है । बाद में यह संप्रदाय दो भागों मे विभाजित हो गया- वैभाष्क एवं सौत्रान्तिक । बुद्ध ने अपने ज्ञान दिया था ना कि उनकी ज्ञान की बाजार । अगर आपको उनकी दर्शन अच्छे लगें आप उनकी सिद्धान्तों का अनुगामी बने ना की उनके नाम पे बना संगठित पहचान की और उनके उपासना पद्धत्तियोंकी । वैदिक वाले बुद्ध जन्म भूमि की भी जालसाज़ी की, क्योंकि आज तक ब्राह्मणवादी ताकतों ने देश की सत्ता संभाली और बुद्ध की जन्म भूमि की जालसाज़ी में वह कभी प्रतिरोध नहीं किया ना उसकी संशोधन; बुद्ध इंडिया के रहने वाले थे लेकिन एक जालसाज़ जर्मनी आर्किओलॉजिस्ट अलोइस आनटन फुहरेर बुद्ध की जन्म भूमि नेपाल में है बोल के झूठी प्रमाण देकर इसको आज तक सच के नाम-से फैला दिया ।  खुद आर्किओलॉजिस्ट अलोइस आनटन फुहरेर माना वह झूठा थे फिर भी आज तक बुद्ध की जन्म भूमि नेपाल ही बना रहा । बुद्ध ने अपनी ज्ञान पाली भाषा में दिया । पाली भाषा का सभ्यता कौन सा है उस को भी अपभ्रंश किया गया । अगर नेपाल में कोई पाली भाषा नहीं बोलता तो सिद्धार्था गौतम कैसे नेपाल में पैदा हो गये? नेपाल में ज्यादातर खासकुरा/गोर्खाली भाषा की सभ्यता रही तो पाली सभ्यता की सोच पूरा बेमानी है, और ये बात प्रत्यक्ष इसको झूठ साबित करता है । राजा अशोक ने कलिंग युद्ध के बाद ही बौद्ध धर्म अपनाया ये इस बात का सूचक है जरूर उस समय राजा अशोक ने उड़ीसा की बौद्ध धर्म से प्रभावित रहे होंगे । उड़ीसा जिसको तब के समय में ओड्र, कलिंग, उक्कल, उत्कल इत्यादि भूखंड के नाम से जाना जाता था उनके बोलने वाले पूर्वज ही पाली बोलने वाली सभ्यता थी । अब अगर आप ओड़िआ भाषा की पालि के साथ मैच करोगे ५०% भी ज्यादा शब्द बिना अपभ्रंश के सही अर्थ के साथ मिल जायेंगे । उड़ीसा का कपिलेश्वर ही कपिलवस्तु है जो की अपभ्रंश होकर कपिलेश्वर हो गया है जब की नेपाल में कपिलवस्तु नाम का कोई स्थान ही नहीं था । जिस को आर्किओलॉजिस्ट अलोइस आनटन फुहरेर ने लुम्बिनी का नाम  दिया, असल में उसका नाम कभी लुम्बिनी ही नहीं था उसका नाम रुम्मिनदेई(Rummindei) था जिसे जबरदस्ती आर्किओलॉजिस्ट अलोइस आनटन फुहरेर अपना खोज को सही प्रमाण करने के लिए उस जगह की नाम भी बदल डाला और झूठी असोका पिलर और प्लेट वाली साजिश की । ये सब साजिश के पीछे कौन होगा आप खुद ही समझ लो । राजा अशोक ने बौद्ध धर्म सोच समझ कर ही अपना विशाल भूखंड में फैलाया था; नहीं तो वह वैदिक धर्म का प्रचार और प्रसार किया होता; इसलिए उनके राज में आप को कोई भी उनके द्वारा बनाये गए वैदिक भगवान की  मंदिर नहीं मिलेंगे जबकि ब्राह्मणो के द्वारा बौद्ध धर्म की विनाश के वाद बौद्ध मंदिरों को सब वैदक मंदिर में कनवर्ट किया गया है । वैदिक वाले बोलते हैं मुसलमान राजाओंने बौद्ध सम्पदा को नस्ट किया; तो, पूरी, तिरुपति, कोणार्क, लिंगराज इत्यादि इत्यादि मंदिरों को क्या मुसलमान राजाओंने बौद्ध मंदिर से वैदकी बनाया? इंडियन भूखंड में मुसलमान राजाओंने जितना बौद्ध सम्पदा को नस्ट नहीं की उससे ज्यादा संगठित पुजारीवाद बनाम ब्राह्मणवाद ने किया ।

इंडिया की हर व्यक्ति बुद्ध को धर्म या भगवान से नहीं जोड़ के बस इस भूखंड का विद्वान के रूप में स्वीकार करना चाहिए । क्यों के बुद्ध इस भूखंड का ही मूल निवासी थे जो जापान, साऊथ कोरिया, नॉर्थ कोरिया, चीन जैसे विकासशील  देश उनको भगवान की मर्यादा देते है । हम अगर न्यूटन, आइंस्टाइन जैसे ब्यक्तित्त्वों को ज्ञानी की मर्यादा दे सकते है तो बुद्ध को उस श्रेणी में स्वीकार क्यों नहीं करना चाहिए? वह बुद्ध जो बिना भगवान की स्वस्थ जीने का कला मानव समाज को सिखाया । उनकी आस्था सत्य और तर्क की ऊपर थी इसीलिए वह भी आस्तिक थे । वह वो आस्तिक नहीं थे जिसकी परिभाषा वैदिक वाले फैलाया था यानी जो भगवान के ऊपर आस्था/विश्वास रखे वह आस्तिक और जो नहीं वह नास्तिक । आस्तिक का मतलब किसी भी सोच के ऊपर विश्वास या आस्था रखना है और नास्तिक का मतलब कोई भी सोच के ऊपर विश्वास पर आस्था नहीं रखना; इसलिए जो सत्य, तर्कवाद और विज्ञान पर आस्था नहीं रखते वह भी इन विषयों का नास्तिक हैं । बुद्ध स्वस्तिक थे यानी “स्व” मतलब आपने यानी खुद के ऊपर और आस्तिक का मतलब आस्था यानी विश्वास करना यानी “स्वस्तिक->स्व+आस्तिक” का मतलब खुद पर ज्यादा विश्वास करो जिसका प्रतीक  卐 , 卍 है और वैदिकवाले इसका दुरुपयोग, इसके अपभ्रंश करके शुभ लाभ में करते हैं । ॐ भी बौद्ध धर्म मानने वाले पाली भाषी (ओड़िआ) लिपि से आया है जो की बुद्ध सन्यासियां आपने मेडिटेसन के समय चित्त एकाग्र के लिए इस ध्वनि को निकालते थे; जो अब वैदिक वाले पूजा पाठ के लिए इस्तेमाल करते हैं । बुद्ध ने स्वस्थ जिनका पद्धति को आपने शिक्षा में ज्यादा जोर दिया ताकि मानवता का रक्षा हो और एक दूसरे से भाई चारा बढ़े । उनकी शिक्षा  बहुत ही सरल और ज्ञान वर्धक है ।

चार सत्य – (तत्त्व ज्ञान)

    (1) दुःख : संसार मैं दुःख है, (Life is full of Sufferings; birth, sickness, old age, accidents, death etc.)

    (2) समुदय : दुःख के कारण हैं, (Major cause of sufferings are ignorance and greedful desires)

    (3) निरोध : दुःख के निवारण हैं, (Ending of ignorance and greedful desires can end sufferings which is called Nirvana)

    (4) मार्ग : निवारण के लिये अष्टांगिक मार्ग हैं। (To end sufferings follow eight noble paths)

अष्टांग मार्ग बुद्ध की प्रमुख शिक्षाओं में से एक है जो दुखों से मुक्ति पाने एवं आत्म-ज्ञान के साधन के रूप में बताया गया है। अष्टांग मार्ग के सभी ‘मार्ग’ , ‘सम्यक’ शब्द से आरम्भ होते हैं (सम्यक = अच्छी या सही)। बौद्ध प्रतीकों में प्रायः अष्टांग मार्गों को धर्मचक्र के आठ ताड़ियों (spokes) द्वारा निरूपित किया जाता है।

अष्टांग मार्ग, दुःख निरोध पाने का रास्ता है । गौतम बुद्ध कहते थे कि चार आर्य सत्य की सत्यता का निश्चय करने के लिए इस मार्ग का अनुसरण करना चाहिए:

१ . सम्यक दृष्टि ( अन्धविशवास तथा भ्रम से रहित )  ( Right View)
२ . सम्यक संकल्प (उच्च तथा बुद्दियुक्त ) (Right Intention/Thought)
३ . सम्यक वचन ( नम्र , उन्मुक्त , सत्यनिष्ठ )  (Right Speech)
४ . सम्यक कर्मान्त ( शानितपूर्ण , निष्ठापूर्ण ,पवित्र )  (Right Action/Conduct)
५ . सम्यक आजीव ( किसी भी प्राणी को आघात या हानि न पहुँचाना )  (Right Livelihood)
६ . सम्यक व्यायाम ( आत्म-प्रशिक्षण एवं आत्मनिग्रह हेतु )  (Right Effort)
७ . सम्यक स्मृति ( सक्रिय सचेत मन )  (Right Mindfulness)
८ . सम्यक समाधि ( जीवन की यथार्थता पर गहन ध्यान ) (Right Concentration/Meditation)

पंचशिल

दुनिया के सभी धर्म अच्छे आचरण के मौलिक सिद्धांतों पर आधारित हैं और अपने अनुयायियों को दुराचार और दुर्व्यवहार से रोकते हैं जो समाज को बड़े पैमाने पर नुकसान पहुंचा है। इसलिए, बुद्ध की यह पंचशील आचरण की बुनियादी शिक्षाओं में शामिल है जो निम्नानुसार हैं:

1 . हत्या मत करो (जीवन के लिए सम्मान)
2 . चोरी  मत करो  (दूसरों की संपत्ति के लिए सम्मान)
3 . यौन दुर्व्यवहार  मत करो  (हमारी शुद्ध प्रकृति का सम्मान करें)
4 . झूठ बोला मत करो   (ईमानदारी का सम्मान)
5 . नशा मत करो (स्पष्ट दिमाग का सम्मान करें)

1 . No killing  (Respect for life)
2 . No stealing  (Respect for others’ property)
3 . No sexual misconduct  (Respect for our pure nature)
4 . No lying  (Respect for honesty)
5 . No intoxicants  (Respect for a clear mind)

देखाजाये तो बौद्ध ज्ञान दर्शन एक धर्म नहीं है, जीने की तार्किक नैतिक कला है और इसमें अन्य धर्मों की तरह कोई प्रबल आदेश और प्रथाएं नहीं हैं, बल्कि बेहतर मानव जीवन के लिए मार्गदर्शन है । इसमें अन्य धर्मों की तरह कोई केंद्रीय ईश्वर नहीं है जो एक केंद्रीय सृजनवादी ईश्वर होता है या तो एकेश्वरवादी या बहुईश्वरवादी रूप में होता है । बुद्ध भगवान नहीं थे । उन्होंने कभी भगवान होने का दावा नहीं किया । उन्होंने कभी भगवान और मूर्ति पूजा में विश्वास नहीं किया । उन्होंने कभी भगवान के दूत होने का दावा नहीं किया । कोई भी बुद्ध हो सकता है यानी कोई भी खुद को प्रबुद्ध कर सकता है । बौद्ध धर्म आपको अपने दिमाग का मालिक बनने देता है; यह आपके दिमाग को भगवान या भगवान के अधिकारियों जैसी कुछ शक्तिशाली पहचान के साथ नहीं फंसता, जो आपके दिमाग को नियंत्रित करते हैं । केवल बौद्ध दर्शन के बारे में सीखना, आपको जिंदगी के कठिनाइयों से नहीं बचाएगा; आपको सच्ची खुशी प्राप्त करने के लिए दर्शन का पालन करना होगा । बुद्ध के बिना आज बौद्ध धर्म मौजूद है। सिद्धार्थ गौतम ने मानव जाति के साथ सार्वभौमिक सत्य के रूप में अपना ज्ञान साझा किया, विशेष रूप से “अनुयायियों” के लिए नहीं जो उनके अनुयायी बनेंगे वही उनकी ज्ञान को इस्तेमाल करेंगे दूसरे नहीं । बौद्ध ज्ञान दर्शन को नियंत्रित नहीं किया जाता है; शिक्षाओं का अभ्यास करते समय उन्हें अपनी तार्किक व्याख्याओं के साथ जो कुछ भी चाहिए, उस पर विश्वास करने की अनुमति है । किसी को भी कुछ करने के लिए मजबूर नहीं किया जाता है । बौद्ध धर्म बदलने के लिए स्वाधीन है । प्रत्येक बौद्ध केवल एक चीज को समर्पित है: सच्चाई का खोज करो । अगर यह पाया गया कि कुछ बौद्ध शिक्षाएं गलत थीं, तो शिक्षण और दर्शन को तार्किक आधार पर बदलने का स्वाधीनता है । यह किसी भी माध्यम से एक कठोर प्रणाली नहीं है। यदि विज्ञान सिद्ध करता है कि बौद्ध धर्म की कुछ मान्यता गलत है, तो बुद्ध के शिक्षा के अनुसार बौद्ध ज्ञान को भी बदलने का स्वाधीनता है ।

ब्राह्मणों का बुद्ध को नकार ने के पीछे राज क्या है?

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भारत की खोज

हमारा देश का नाम ना भारत था, ना हिन्दुस्तान था, ना इंडिया; ये भूखंड सदियों छोटे बड़े राज्यों का मिश्रित समूह रहा, ये भूखंड समय के साथ राजाओं के राज से जाना जाता था. ये भूखंड अनेक भाषीय सभ्यता का भूखंड है. आज भी यहाँ १२२ प्रमुख भाषा और १५९९ अन्य भाषाएं देखने मिलते हैं. पुराने युग में कोई वर्ण व्यवस्था नहीं थी. संस्कृत बोलनेवाले या इस भाषा को अपना पहचान मानने वाले धूर्त्तों ने वर्ण व्यवस्था पैदा किया जो की रिग वेद परुष सूक्त १०.९० में लिखित है. संस्कृत भाषा इस भूखंड का कभी भी लोकप्रिय भाषा नहीं रहा. संस्कृत सब भाषा की जननी है ये बात धूर्त्तो ने फैलाई और मूर्खोंने आपने अज्ञानता के वजह से इसका ऊपर अंधविश्वास किया. अगर ये इतनी पुरानी और लोकप्रिय होता इसका आज के बोलने वाले कभी १५ हजार से भी कम नहीं होते. इन धूर्त्तों ने गैर संस्कृत बोलनेवाले सभ्यता को अगड़ी और पिछड़ी में बांटा और ऐसे साजिश की पिछड़ा कभी अगड़ी ना बन पाए. इसलिये ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य की पहचान बनाई जो की समाज की प्रमुख profession थी इस प्रमुख वृत्तियां को उनलोगोंने आपने और अपना पीढ़ियों के लिए reserve कर दिया और उसकेलिये सरनेम का इस्तेमाल किया; इसलिये पुजारी वर्ग ज्ञान को रिज़र्व कर दिया ताकि उनके ज्ञान से दूसरे चलें; जब की क्षत्रीय को क्षेत्र; यानी पीढ़ीगत राज और प्रसिद्धि के साथ साथ यश का रिजर्वेशन मिला. जो ब्योपारी  वैदिक बनिया का पहचान अपनाया वह खुद को वैश्य कहने लगे, और इस वृत्ति को अपने पीढ़ियों के लिए रिज़र्व कर दिया यानी सब अच्छी profession को वह खुद और उनके बच्चों के लिए reserve कर दिया और ये तीन प्रमुख बृत्तियों को अपनानेवाले गोष्ठी फ्रीडम ऑफ़ प्रोफेशन को बंद कर दिया; इन तीन प्रमुख बृत्तियों को छोड़ के जितने भी बृत्तियाँ थे उनको शूद्र यानी उनके गुलाम बताया गया. ये गोष्ठियां कोई एक मूल से नहीं हैं क्यों के स्थानीय भूखंड के बदलते ही इनके सरनेम और उनकी मातृभाषा अलग अलग हैं जिसका मतलब ये है की ये कोई एक मूल स्रोत से पैदा श्रेणी नहीं है, अगर होते उनके सरनेम और उनकी मातृभाषा एक होता अनेक नहीं; बल्कि ये एक सोच की श्रेणी है जो की प्रोफेशन से बंटी हुई हैं जैसे आज देश तरह तरह की पोलिटिकल पार्टियों के सोच से बंटी हुई है. सदियों इस भूखंड का नाम उनके राजाओं के राज से पहचाना जाता था. इस भूखंड का सबसे बड़ा राज्य मौर्य साम्राज्य बना जो की एक बौद्ध सम्राज्य था. यानी हमारे ज्यादातर पूर्वज बौद्ध धर्मी थे. बौद्ध धर्म तार्किक धर्म था जो की ईस्वर, मूर्ति पूजन, बहु देवबाद, अंधविश्वास, असामंज्यता, ऊंच नीच, छोटे बड़े, छुआ छूत, वर्ण व्यवस्था, हिंसा इत्यादि असामाजिक चीजों का घोर विरोध करता था. बौद्ध धर्म मानव समाज को एक ही परिवार मानता था. जबकि वैदिक धर्म अपने अनुगामियों को ही जात पात, बड़ा वर्ण छोटा वर्ण से अलग करते हैं, जिनसे एक परिवार का सोच भी मूर्खता होगी; ये वैदिक धर्म के प्रचारक और प्रसारक कभी मानब समाज को एक परिवार स्वीकार नहीं करते हैं अगर करते कोई अपने भाई को छुआ छूत थोड़ी ना करता? लेकिन उनके भांड प्रचारक “वसुधैव कुटुम्बकम” का फेकू नारा देते हैं जब की असलियत कुछ और है. 263BC से 185BC तक ये भूखंड बौद्ध साम्राज्य के नाम से जाना जाता था. बौद्ध धर्म से पहले इस भूखंड का कोई प्रमुख धर्म नहीं था. 185BC में वैदिक ब्राह्मण सेनापति पुष्यामित्र शुंग ने राष्ट्रद्रोह करके धोखे से last Mauryan Empire की राजा बृहद्रथ का हत्या की और मौर्य साम्राज्य को हतिया लिया. ये सेनापति कोई युद्ध करके नहीं बल्कि अपने मालिक को धोखा देकर बेईमानी से हतिया लिया था. समय के साथ वैदिक प्रचारकों ने बौद्ध धर्म और इस भूखंड में जितने भी तार्किक धर्म थे उनको न केवल प्रदूषित किया उनको नष्ट भी किया और कुछ को अपने धर्म की छत्रछाया में ले आए. बौद्ध धर्म को समूल खत्म करने की कोशिश हुई. पुष्यमित्र शुंग ने बौद्ध सन्याशियोंका सामूहिक नर संहार किया. आतंक, दहशत, छल और बल, साम, दाम, दंड, भेद से मनुस्मृति को लागू करके वैदिक वर्ण व्यवस्था को जबरन हर गैर संस्कृत भाषी सभ्यता के ऊपर लागू किया गया. हर भाषीय सभ्यता के धूर्त, दबंग और बईमानों को अगड़ी यानी सबर्ण बनाया गया और पिछड़ों को उनके गुलाम यानी शूद्र. इस तरह अशोका की बुद्धिस्ट किंगडम अगड़ी और पिछड़ी दो समुदाय में बंट गया और समय के साथ ऐसे ही वैदिक धर्म फैलता चलागया. संगठित पुजारीवाद जो अपने आप को ब्राह्मणवाद का पहचान दी असलियत में हर भाषीय सभ्यता की शातिर और चालाक मूल निवासी थे जिन्होंने ब्राह्मणवाद को भक्तिवाद से जोड़ा और भगवान की नाम पे एक पोलिटिकल मूवमैंट चलाई जिससे हर गैरवैदिक धर्म यहाँ विलुप्त हो गया. इनलोगोंने झूठ, अंधबिस्वाश, अज्ञानता, मूर्त्तिवाद, छुआ छूत, ऊंच नीच इत्यादि सामाजिक बुराईयां धर्म के नाम पे फैलाई और यहाँ की हर पीढी उनके फैलाई हुई झूठ को ही अपना पहचान की उत्पत्ति मान ली. इनलोगोंने अपनी मन गढन कहानियों को इतिहास बताया और हर पीढ़ी को भ्रम में डाला. इसीलिए ब्रम्हा, विष्णु, महेश जिनका कोई जैविक उत्पत्ति नहीं फिर भी इंसान की जैसे दीखते हैं और ये हर स्क्रिप्चर में स्पष्ट से  लिखा है  की वह सब मन से पैदा हुए हैं यानी काल्पनिक है फिर भी इनलोगोंने उनके अनुगामियों को ये अहसास दिलादिया के वह सब सत्य है. इस भूखंड का ज्यादातर मूल निवासी उनके झांसा में आ गये और वैदिक धर्म 185BC के वाद इस भूखंड का सबसे बड़ा धर्म बन गया. वर्ण व्यवस्था के वजह से इस भूखंड का सबसे बड़ा श्रेणी गुलाम यानी शूद्र बन गया. क्यों के ज्यादातर अनुगामी बुद्धिस्ट थे उनको जान सुनकर उत्पीड़ित किया गया और सदियों हर चीजों से बंचित किया गया. जब 700AD के बाद बाद मुसलमान आक्रमणकारियों इस भूखंड में आये तो सिंध भाषीय सभ्यता के नाम से उनके राज के नाम रखे जैसे अल-हिन्द, इंदोस्तान, हिन्दुस्तान इत्यादि. मुसलमान आक्रमण कारियोंने यहाँ की कुछ मूल निवासियों को अपनी धर्म को जबरन इम्प्लीमेंट किया; लेकिन ज्यादातर शूद्र और अतिशूद्र यानी Out Caste यानी वर्ण व्यवस्था से बाहर, जो की सदियों उत्पीड़ित रहे वह  इस्लाम धर्म क़बूल ली.  क्यों के इस्लाम की राज में मुसलमानों को गैर मुसलमानों से अलग करना था तो इस्लाम शासकों ने गैर मुसलामानोंको हिन्दू पहचान दे दी; जो की तब का बुद्धिजीम से कनवर्टेड वैदिक अनुगामियों का पहचान बन गया. असलियत में देखो तो हिन्दू का मतलब इस्लाम राजाओं का गुलाम ही होगा. RSS और BJP के कुछ मुर्ख विद्वान और उनके मुर्ख विद्वान पॉलिटिशियन ये कहते हैं की हिन्दू लाखों करोड़ों साल की धर्म है जैसे करड़ों साल पहले की लाइव डौक्यूमैंटरी उनके पास है. हिन्दू पहचान जो की शिन्दु नदी और शिंद प्रोविंस यानी शिन्दु सिविलाइज़ेशन से आया है तब था की नहीं कौन जानता है? शिन्दु भाषीय सभ्यता से गैर सिंद्धु सभ्यता जैसे पंजाबी, पाली/ओड़िआ, खरीबोलि/नगरी/नागरी/हिंदी, तेलुगु, तामील इत्यादि इत्यादि भाषीय सभ्यता से क्या सम्बद्ध? अब partition के बाद सिंध भूखंड शिंद प्रोविंस के नाम से पाकिस्तान का हिस्सा है और शिन्दु नदी भी पाकिस्तान में बहता है. शिंद प्रोविंस का ज्यादातर मुलनिवाशी अब मुसलमान हैं जब की उनके नाम से एक बड़ा वर्ग जबरन हिन्दू के नाम से जाना जाता है जो की मुर्खोंकी फैलाई गयी पहचान है. इस भूखंड का सबसे बड़ा अखंड राज्य मौर्य साम्राज्य था. इस्लाम आया तो उनके राज में इस भूखंड का पॉपुलर पहचान हिन्दुस्तान बना. अंग्रेज 1600AD के बाद आये और इसका सेक्युलर पहचान इंडिया रख दिया. 1947 के वाद कांग्रेस सत्ता संभाली और कांग्रेस के अंदर RSS और हिन्दू महासभा की  एजेण्टोने सावरकर की ओरगार्नाईजेशन “अभिनव भारत” के नाम से प्रेरित “भारत” रख दिया जब की भारत पहचान एक काल्पनिक ब्राह्मणवादी पहचान  है.

अपने कभी वर्ण व्यवस्था जो की रिग वेद में पुरुष शुक्त १०.९० में वर्णित हुआ है कभी पढ़ा है? अगर आप सही माने में इंसान होंगे तो आपको हिन्दू होने में गर्व नहीं शर्म महसूस होगी क्योंकि पुरुष सूक्त ज्ञान की नहीं मूर्खता और अज्ञानता की परिभाषा है. इस वर्ण व्यवस्था को धर्म और ज्ञान के नाम से फैलाने वाले हर व्यक्ति असामाजिक और अपराधी है. पुरुष शुक्त ना केवल अंधविश्वास है बल्कि हर मानवीय अधिकार की उल्लंघन भी करता है.

जातिवाद यानी वर्ण व्यवस्था संस्कृत भाषी रचनाओं में मिलता है इसका मतलब ये हुआ जो गैर संस्कृत बोली वाले है उनके ऊपर ये सोच यानी वर्ण व्यवस्था थोपी गयी है रिग वेद की पुरुष सुक्त १०.९० जो वर्ण व्यवस्था का डेफिनेशन है उसको कैसे आज की नस्ल विश्वास करते हैं ये तर्क से बहार हैं? सायद आज की पीढ़ी भी मॉडर्न अंध विश्वासी हैं पुरुष सूक्त बोलता है: एक प्राचीन विशाल व्यक्ति था जो पुरुष ही था ना की नारी और जिसका एक हजार सिर और एक हजार पैर था, जिसे देवताओं (पुरूषमेध यानी पुरुष की बलि) के द्वारा बलिदान किया गया और वली के बाद उसकी बॉडी पार्ट्स से ही  विश्व और वर्ण (जाति) का निर्माण हुआ है और जिससे दुनिया बन गई पुरूष के वली से, वैदिक मंत्र निकले घोड़ों और गायों का जन्म हुआ, ब्राह्मण पुरूष के मुंह से पैदा हुए, क्षत्रियों उसकी बाहों से, वैश्य उसकी जांघों से, और शूद्र उसकी पैरों से पैदा हुए चंद्रमा उसकी आत्मा से पैदा हुआ था, उसकी आँखों से सूर्य, उसकी खोपड़ी से आकाश ।  इंद्र और अग्नि उसके मुंह से उभरे

ये उपद्रवी वैदिक प्रचारकों को क्या इतना साधारण ज्ञान नहीं है की कोई भी मनुष्य श्रेणी पुरुष की मुख, भुजाओं, जांघ और पैर से उत्पन्न नहीं हो सकती? क्या कोई कभी बिना जैविक पद्धति से पैदा हुआ है? मुख से क्या इंसान पैदा हो सकते है? ये कैसा मूर्खता है और इस मूर्खता को ज्ञान की चोला क्यों सदियों धर्म के नाम पर पहनाया गया और फैलाया गया? ये क्या मूर्ख सोच का गुंडा गर्दी नहीं है?

क्यों के चार वर्ण में और मनुस्मृति में ब्राह्मणों को सबसे ज्यादा इम्पोर्टेंस दिया गया है इसलिये ये इस बात का सूचक है की ब्राह्मणवादी धुरर्तोंसे ही ये सोच पैदा हुआ है. क्या ब्राम्हणो की बच्चे नहीं होते? अगर बच्चे होते उनके बच्चों का टट्टी क्या ५ साल तक मेहतर साफ़ करता है? अगर हर ब्राह्मण की पत्नी ५ साल तक अपने ही बच्चे का मल मूत्र साफ़ करती है उसकी कपडे साफ़ करती है और बड़े होने पर उनके स्कूल की बूट भी पलिश करती है तो क्या वह मेहतर, धोबिन और चमार नहीं बनती? इस काम को ब्राह्मण छोटे और अछूत क्यों नहीं कहते? हर ब्राह्मण क्या अपनी मल दूसरों से धुलवाता है? वह भी तो खुद की “मलद्वार” का मेहतर है? अपने हात जो मल साफ़ करता है उसको अछूत और अलग क्यों नहीं रखता? ये इस बात का सूचक है ब्राह्मणवाद किस तरह का बीमारी और मानसिक विकृति है. आप ये बताओ पंजाब का ब्राह्मण से आंध्र का ब्राह्मण से क्या रिश्ता? क्या वह एक दुशरेको अपने भाषीय कम्यूनिकेशन से एक दूसरे को समझ भी सकते हैं? तो इन को कौन सा सोच ओर्गानाइज करता है? बस पुरुष सूक्त का समाज में श्रेष्ठ होने का सोच और वैदिक पुजारी होने का सोच जो की उन्हीं लोगों से फैलाई हुई सोच है उन सबको ओर्गानाइज करता है. ये जो कहते हैं इनके पूर्वज आर्य रेस से आते हैं वह क्या सच है? आर्यन रेस आये कहाँ से? सदियों इस भूखंड को पडोसी भूखंड के लोग आते रहें हैं और यहाँ बसते रहे हैं, इसलिए ये विशाल भूखंड अनेक भाषीय सभ्यताओंका भूखंड है. अगर संस्कृत बोलनेवाले  सभ्यता खुद को आर्यन कहते हैं उनका सभ्यता पहले कहाँ था? कुछ मुर्ख विद्वान कहते हैं की वह ईरान से आये थे तो ईरान से आर्यन है. तो ईरानवाले  क्या संस्कृत मैं बात करते हैं? संस्कृत के साथ पर्शियन लैंग्वेज का कितना मेल है और क्या कनेक्शन है? इनके प्रचारक और प्रसारक मन में जो भी आता है कुछ भी बिना आधार पे बोल देते हैं. कभी कभी लगता है शायद ये सब नशे में सोचे गए होंगे या सोचने वाला और फैलाने वाले मानसिक विकृत ही होंगे. अब का करीब ६ करोड़ ब्रह्मणों का मातृभाषा जैसे ही इंडियन डेमोग्राफी चेंज होती है तरह तरह की हो जाती है? कोई गुजराती है तो कोई पंजाबी, कोई बंगाली है तो कोई मलियाली, कोई तेलुगु है तो कोई ओड़िआ? इत्यादि इत्यादि… इन के सरनेम ५०० से भी ज्यादा हैं तो ये कौनसा एक आर्यन रेस से हैं? अगर आर्यन बाहरी मुल्क से आये हैं तो इस भूखंड में आकर उनके मातृभाषा अनेक कैसे हो गये? क्यों के हर भाषीय सभ्यता में ब्राह्मण, वैश्य, क्षत्रिय  और शूद्र देखने को मिलते हैं! अगर ब्राह्मण ही आर्यन थे तो यहाँ के क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र क्या उसी आर्यन रेस से थे? जिनका मातृभाषा भी  ब्राहम्हणों  की मातृभाषा से मेल खाता है? अगर क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र संस्कृत सिख कर जबरदस्त संस्कृत बोल दें तो क्या वह आर्यन हो जायेंगे? इस भूखंड में आप को ऐसे भी लोग मिल जायेंगे वह जबरदस्त अंग्रेजी बोलते हैं तो वह सब क्या इंग्लिश नेटिव हो गये? ये आर्यन थिओरी सफ़ेद झूठ है और वर्ण व्यवस्था हमारे भूखंड का धूर्त्तों का सोच है. संस्कृत भी इन धूर्त्तों का बनाया हुआ भाषा है ताकि आम आदमी इनके मुर्ख रचनाओं को जैसे समझ नहीं सके उसका एक षडयंत्र है. कितने अनुगामी हैं जब ब्राह्मण पूजा के समय मंत्र बोलता है उसका अर्थ समझते हैं? जिसदिन अनुगामी इनके अर्थ समझने लगेगा वह खुद ही धर्म छोड़ देगा. और हर भगवान संस्कृत मंत्र ही क्यों समझता है, ये कभी उनके अनुगामी अपने आपसे आज तक नहीं पूछा. हर पुजारी ब्राह्मण नहीं होता लेकिन जो पुजारी संस्कृत भाषा में निर्जीव मूर्तियों को सम्बाद करे और आपने आप को वैदिक पुरुष सूक्त का वर्ण व्यवस्था के  अनुसार खुद को ब्राह्मण की पहचान दे बस वह पुजारी और उनके बंसज ही ब्राह्मण है. कोई भी वर्ण के लोग दूसरे भाषीय वर्ण के लोगों से बिना कॉमन  लैंग्वेज जैसे हिंदी (नागरी) या इंग्लिश या एक दूसरे की लैंग्वेज को जानते होंगे तो ही सोच का सम्बाद कर सकते हैं; बरना एक दूसरे से सम्बाद भी  मुश्किल है; तो ये सामाजिक श्रेणियां कैसे बन गए? बस एक धूर्त्त सोच ही उनको क्लास्सिफ़ाये करता है जो की झूठ और भांड की सोच पर आधारित है  जिस केलिए  इस भूखंड की लोग सदियों प्रताड़ित हैं. इस सोच को नहीं मिटाने का मतलब यही है की इस सोच को बढ़ावा देनेवाले वही धूर्त्त सोच के  लोग ही है जो नहीं चाहते ये सोच मिटें और लोग प्रताड़ित हो और उनको सदियों शोषण किया जाये. क्या ऐसे सोच के व्यक्तियों को आप सामाजिक  लोग कहेंगे या असामाजिक और अपराधी? ये लोग ना केवल क्रिमिनल्स हैं बल्कि इस सोच को आज की जेनेरशन तक लानेवाला उनके हर पूर्वज भी अपराधी हैं जो अब इस दुनियां में नहीं है.

पुष्यमित्र शुंग के वाद अनेक राजायें जो वैदिक पहचान अपनाया और खुद को क्षत्रिय का पहचान दिया वैदिक चार वर्ण फैलाने में मदद की और संगठित पुजारीवाद को बढ़ावा दिया जो की वैदिक धर्म अपना के खुद को ब्राह्मण की पहचान देकर जातिवाद को अच्छीतरह से फैलाई. सातवां शताब्दी में बाँग्ला भाषीय सभ्यता का एक पुजारी का वंशज जिसका नाम शशांक था जो की खुद को ब्राह्मण का पहचान दिए थे जब राज किया वैदिक वर्ण व्यवस्था को वह भी पुष्यामित्र शुंग का जैसा फैलाई और बुद्धिजीम को उनकी भाषीय सभ्यता से सम्पूर्ण विलुप्त कर दिया. बचीकुची तार्किक दर्शनों को शंकरचार्य, रामानुज और माधवाचार्य जैसे शैवजिम और वैश्नबजिम यानी वेदांत की प्रचारक और प्रसारक के साथ साथ इस्लाम प्रचारकों ने ध्वस्त करने में कोई कसर नहीं छोड़ी और फिर बचीकुची तार्किक दर्शनों को 1500AD – 1700AD का भक्ति मूवमैंट सम्पूर्ण रूप से ख़तम कर दिया. जब यहाँ अंग्रेज 1600AD में आये इस्लामों की ९०० साल की उपस्थिति से यहाँ की मूलनिवासियां दो प्रमुख धर्म से बंट चूके थे जो की वैदिक यानी हिन्दू धर्म जो की वैदिक धर्म का  पर्सियन/आरबीक/आफ़ग़ान ओरिजिन का नाम था और खुद मुसलमानों से लाया गया इस्लाम धर्म. वैदिक धर्म का पोलिटिकल मूवमेंट ब्राम्हणोने 1903AD से शुरु कर दिया था.

अभिनव भारत सोसाइटी: 1903AD में विनायक दामोदर सावरकर और उनके भाई गणेश दामोदर सावरकर द्वारा स्थापित किया गया था । दोनों ही मराठी चितपावन ब्राह्मण थे ।

अखिल भारतीय हिंदू महासाभा: 1915 में स्थापित हुआ था और संस्थापक मदन मोहन मालवीय थे । उनका ओरिजिनल सरनेम चतुर्वेद था जो की अल्ल्हवाद की ब्राह्मण थे।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ: नागपुर में  27 सितंबर 1925 में  स्थापित हुआ था, और संस्थापक के.बी. हेडगेवार  जो की मराठी देशस्थ ब्राह्मण थे।

भारतीय जनसंघ: 21 अक्टूबर 1951 में स्थापित हुआ और संस्थापक स्यामा प्रसाद मुखर्जी  थे जो की एक वेस्टबेंगल ब्राह्मण थे । भारतीय जनसंघ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आर.एस.एस) की राजनीतिक भुजा थी जो 1980AD से भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के नाम से जाना जाता है.

विश्व हिंदू परिषद: 1964 में स्थापित हुआ और संस्थापक एम.एस गोलवलकर (मूल उपनाम पाधई था । पाधियां महाराष्ट्र के कोकण में गोलवाली नामक एक जगह से संबंधित हैं और ये ब्राह्मण हैं), केशवराम काशीराम शास्त्री (ब्राह्मण), एस.एस आप्टे (महाराष्ट्र के ब्राह्मण) थे।

आप खुद ही सोचिये सब हिन्दू संगठन ज्यादातर वैदिक वर्ण व्यवस्था को ही क्यों प्राथमिकता देते हैं जो की  बेवकूफ जाति आधारित सामाजिक शासन प्रणाली यानी वर्ण व्यवस्था जो की एक अंध विश्वास है, (पुरुष शुक्त 10.90) उस को बढ़ावा देते हैं और हमेशा ब्राह्मणों के द्वारा ही बनायेगये हैं और जिसकी अगुवाई भी ब्राह्मण ही करते हैं ।

INDIAN STAMPS GIVES US CLEAR PROOFS WHEN WE GOT THE NAME BHARAT. CLICK HERE FOR A COLLECTION OF INDIAN STAMPS, WHERE YOU CAN FIND CLEARLY, FROM JANUARY 17 1963 BHARAT NAME INTRODUCED IN STAMPS. ADOPTION OF BHARAT NAME FOR OUR NATION IN CONGRESS ADMINISTRATION SHOWS LINK WITH RSS AND HINDU MAHASABHA DOMINANCE IN CONGRESS PARTY OF INDIA.

Savarkar in his book “Six Glorious Epochs of Indian History”, which he had wrote before his death in 1966, show his views about his sharp communal ideology and voice of extremism and radicalism. Written in Marathi, his book based on many dubious historical records justifies rape as a political tool. Quoting the mythological figure Ravan, Savarkar wrote:

“What? To abduct and rape the womenfolks of the enemy, do you call it irreligious? It is Parodharmah, the great duty!”

Savarkar wanted Pakistan should be formed its why he had never opposed to Jinnah though  Jinnah and Savarkar both were living in Bombay. Savarkar wanted Pakistan should be formed as nation of Indian Muslims so he kept silence; where Jinnah was just a puppet to his conspiracy of two Nation theory. We must know prominently that first Hindutva political organization “Abhinav Bharat” had made by Savarkar in 1903 for two Nation theory followed by Muslim political organization All-India Muslim League  in 30 December 1906 at Dacca/Dhaka, Bangladesh by Nawab Viqar ul Malik. Jinnah was the supporter of united India and was an active member of Congress party till he joined in All-India Muslim League in 1913. He left Congress party only due to Hindu dominance in Congress party ignoring political interests of few Muslim leaders. Jinnah was not an orthodox Muslim, then how he supported a Nation based on religion? Which shows his political greed not the devotion to Islam; if he even not wanted partition there would not even partition. If Savarkar  wanted no partition he could have kill to Jinnah instead of Gandhi. Gandhi was just used and killed after the Nation formed. Hindu and Muslim were not the issue. Political rule and religious hegemony was the real issue. How Muslims of India and Hindus were living for 900yrs together without any disturbances i.e. from 700AD to 1600AD till British came, partly or majorly ruled by Islamic emperors to Indian demography? After even partition Punjabi clan converted to Islam  majorly rules Pakistan. Pakistani linguistic groups majorly from  Punjabi (45%), Pashto (15%), Sindhi (12%), Saraiki (10%) Urdu (8%) and Balochi (3.6%) where you can’t find any major orthodox Muslim ethnicity; which shows Pakistan is just a fake Islam nation. Actually original Hindustan is Pakistan not India due to presence of Shind province (Shindu civilization) and Shindu river in Pakistan that gives the Indian demography a National identity name “Hindustan” and name to its people Hindu.

अंग्रेज World War II के बाद इंडिया को वेसे ही छोड़कर जाने वाले थे इसलिये सिविल सर्विस ऑफिसर अल्लन ऑक्टेवियन ह्यूम १८८३ में पोलिटिकल मूवमेंट पैदा की और कांग्रेस पार्टी बनाया ।  ब्रिटश वाले उनके ज्यादातर भूतपूर्व ब्रिटिश एम्पायर टेर्रीटोरीज़ों को ऑटोनोमी देकर उनको पोलिटिकल डोर से चलाने की दौर सुरु कर दिया था, और 1950AD तक इंडिया Commonwealth realms का हिस्सा रहा । जानुअरी 26, 1950AD में इंडिया को Republics in the Commonwealth of Nations में एक रिपब्लिकन फॉर्म ऑफ़ गवर्नमेंट के तौर शामिल करदियागया; जिसका हेड ऑफ़ कमनवेल्थ अब तक क्वीन Elizabeth II ही हैं । अंग्रेज कभी चाहते नहीं हुए होगें की देश की टुकड़ा हो क्यों के वह हर हाल में कॉमनवेल्थ का हिस्सा होना ही था वह एक हो या दो । देश का बंटवारा अपने ही लोगो ने अपने पोलटिकल स्वार्थ केलिए किया जिसका अंग्रेजों को कोई फर्क नहीं पड़ता था । १८८५ उमेश चंद्र बोनर्जी कांग्रेस के पहले सभाध्यक्ष थे; पहले सत्र में 72 प्रतिनिधियों ने भाग लिया था, इंडिया के प्रत्येक प्रांत का प्रतिनिधित्व करते हुए प्रतिनिधियों में 54 हिन्दू और दो मुस्लिम शामिल थे; बाकी पारसी और जैन पृष्ठभूमि की थी; जबकि १७५७ की  बैटल ऑफ़ प्लासी के साथ ही फ्रीडम मूवमेंट सुरु हो गया था । १९१५ में गांधीजी ने फ्रीडम मूवमेंट के १५८ साल वाद और कांग्रेस बनने की ३२ साल वाद गोखले के मदद से दक्षिण अफ्रीका से लौटे और कांग्रेस पार्टी में शामिल हुए । १९२४ में वह पार्टी प्रेजिडेंट बनगए । सुभाष चंद्र बोस कांग्रेस के साथ १९२० में जुड़े और गांधीजी की कांग्रेस में प्रभुत्व और धूर्त्त कब्जेवाजी से असंतुष्ट सुभाष चंद्र बोस को कांग्रेस पार्टी से २९ अप्रैल में निष्कासित होना पड़ा; उसके वाद १९३९ जून २२ को वह अपना फॉरवर्ड ब्लॉक बनायी और आजाद हिन्द की स्थापना की; जबकि कांग्रेस पार्टी उसके बाद उनकी साथ क्या किया खुद इन्वेस्टीगेट करना बेहतर होगा । १९१९ में, नेहरू ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में शामिल हुए जब की मुहम्मद अली जिन्ना कांग्रेस का साथ १९०६ से लेकर १९२० तक रहे । गाँधी और नेहरू जोड़ी ऐसे बनि आज तक नेहरू फॅमिली गाँधी का नाम लेके अपनी पोलिटिकल दुकान चला रहा है जब की और भी कितने कांग्रेस लीडर थे उनके नाम इनके जुबान पर कभी नहीं आया । मुहम्मद अली जिन्ना ने कांग्रेस पार्टी में ब्राह्मणवादी यानी हिंदुत्व की पकड़ से नाखुश होकर मुसलमानों की अलग देश के वारे में अगवाई की । जब की पाकिस्तान की सोच मुहम्मद इक़बाल ने की थी इसलिए मुहम्मद इक़बाल को पाकिस्तान का स्पिरिचुअल फादर कहा जाता है; मुहम्मद इक़बाल इंडियन नेशनल कांग्रेस की एक बड़ा क्रिटिक थे और हमेशा कांग्रेस को मनुबादी यानी हिन्दूवादी पोलिटिकल पार्टी मानते थे । वही मुहम्मद इक़बाल जिसने “सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोसिताँ हमारा, हम बुलबुलें हैं इसकी यह गुलसिताँ हमारा” गाना लिखाथा । मुहम्मद इक़बाल के पूर्वज कश्मीर पंडित थे जिन्होंने इस्लाम क़बूली थी । वह ज्यादातर उनके लेख में अपना पूर्वज कश्मीर पंडित थे उसका जिक्र भी किया । जिन्ना के पूर्वज यानी दादाजी गुजराती बनिया थे । उनके दादा प्रेमजीभाई मेघजी ठक्कर थे, वे गुजराती में काठियावाड़ के गोंडल राज्य के पोनली गांव से लोहाना थे । उन्होंने मछली व्यवसाय में अपना भाग्य बना लिया था, लेकिन लोहाना  जाती का मजबूत धार्मिक शाकाहारी विश्वास के कारण उन्हें अपने शाकाहारी लोहना जाति से बहिष्कृत कर दिया गया था । जब उन्होंने अपने मछली कारोबार को बंद कर दिया और अपनी जाति में वापस आने की कोशिश की, तो उन्हें हिंदू धर्म के स्वयंभू संरक्षकों के विशाल अहं के कारण ऐसा करने की अनुमति नहीं थी । परिणामस्वरूप, उनके पुत्र, पुंजालाल ठक्कर/जिन्नाभाई पुंजा (जिन्ना के पिता), इस अपमान से इतना गुस्सा थे कि उन्होंने अपने और उनके चार बेटों के धर्म को बदल दिया और इस्लाम में परिवर्तित हो गए । वैसे देखाजाये तो पाकिस्तान बनने के पीछे कांग्रेस और उसके अंदर बैठे हिन्दूमहासभा की एजेंट्स ही जिम्मेदार थे । तो अब आपको पता चलगया होगा गांधीजीके हत्या में कौन शामिल हो सकता है? क्योंकि हिंदूवादी अगर पाकिस्तान नहीं चाहते थे तो जिन्ना को मार सकते थे गाँधी को मारने के पीछे जो तर्क वह देते हैं वह दरअसल भ्रम हैं । अगर गांधीजी को मार सकते थे तो जो पाकिस्तान के वारे में जो सोचा उसको क्यों नहीं मारा? इसका मतलब हिंदूवादी संगठन और कांग्रेस चाहता था की पाकिस्तान बने; तो ये ड्रामा क्यों किया? ये ड्रामा बस सो कॉल्ड सेकुलर वर्णवादी हिन्दू राष्ट्र बनाना था जो नेहरूने सोचा ताकि हिन्दू और मुसलमानोंकी वोट बटोर सके; ये इसीलिए किया नेहरू विरोधी मुसलमानोंको रवाना की जाये और जो उनके साथ हैं उनके साथ राज किया जाये क्योंकि उनके पास गांधी जैसे कुटिल राजनीतिज्ञ थे । गांधी जी के कुटिल दिमाग के कारण नेहरू देश का प्रधान मंत्री बन गए । देश स्वाधीन १९४७ अगस्त १५ क़ो हुआ और नेहरु देश की कमान सँभालने का वाद ३० जानुअरी १९४८ क़ो गांधी जी की हत्या हो गयी । कांग्रेस में हिंदूवादी एजेंटोने जब देखा सम्पूर्ण हिन्दू राष्ट्र बनाना मुश्किल है तो अखिल भारतीय हिन्दू महासभा की प्रेजिडेंट श्यामा प्रसाद मुख़र्जी नेहरू के साथ सम्बन्ध बिगड़े और असंतुस्ट होने के बाद, मुखर्जी ने इंडियन नेशनल कांग्रेस छोड़ दी और 1951 में भारतीय जनसंघ की स्थापना की जो की अबकी भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के पूर्ववर्ती पोलिटिकल पार्टी है । जिसका एजेंडा वर्ण वादी हिन्दू राष्ट्र बनाना है । इसका मतलब ब्राह्मणवादी देश और न्याय व्यवस्था को चलाएंगे, क्षत्रियवादी देश की आर्मी यानी सुरक्षा को संभालेंगे, देश की इकोनॉमी को वैश्यवादी चलायेंगे और जितने अन्य यानी वैदकी प्रमाण पत्र के हिसाब से शूद्र और अतिशूद्र यानी आउट कास्ट हैं उनके लिए  काम करेंगे । भारत शब्द ही उनकी पूर्व प्रेजिडेंट सावरकर की संगठन की साथ सम्बंधित थी । आर.एस.एस और अखिल भारतीय हिन्दू महासभा ही भारत से जुडी श्लोगान इस्तेमाल करते हैं । उनकी पॉलिटकल पार्टी का नाम भी भारतीय जनता पार्टी है; जब की इस भूखंड में इस पहचान का कोई विस्तार रिस्ता नहीं है । इस भूखंड का नाम कभी भारत नहीं था । भारत नाम देश स्वाधीन होने का वाद ही दियागया है । ना भारत कोई राजा था ना उसकी कभी इतना बड़ा भूखंड का राज । बस कुछ मन गढन कहानी भारत नाम की प्रचार और प्रसार करते हैं । अगर हम ये मान ले भारत एक पुरुष है तो भारत को माता क्यों कहते है? भारत एक पुरुष की नाम है ना की स्त्री विशेष की । अगर भारत को हम एक राजा मान लें तो उनकी राज कितने तक फैला था उसकी वारे में कुछ कहा नहीं जा सकता । क्यों की उसकी कुछ मजबूत सबूत ही नहीं है । अगर मान लिया जाये भारत “महाभारत” से लिया गया है तो महाभारत का मतलब क्या है? “महा” मतलब बड़ा या महान और “भारत” मतलब एक व्यक्ति विशेष का नाम । इसका मतलब क्या हुआ? जैसे किसीका नाम अगर “पपु” है “महापपु” का मतलब क्या होसकता है? अगर मान लिया जाये “महाभारत” का मतलब “महा युद्ध” है तो “भारत” का मतलब युद्ध है । अगर भारत का मतलब युद्ध है तो इसको एक राष्ट्र का नाम के रुपसे इस्तेमाल करना कितना तार्किक है? अगर मानलिया जाये “भारत” पाण्डु और कौरव के पूर्वज थे जैसे हिन्दू ग्रंथों में लिखा गया है; महाभारत ही संदेह की घेरे मैं है जैसे महाभारत में लिखा गया है? क्या गांधारी के पेटमें जो बच्चा था उस को मारने का बाद उसकी टुकड़े १०१ मिटटी के घड़ा में रख कर बच्चे पैदा की जा सकती है? क्योंकि महाभारत की अनुसार गांधारी की बच्चे उनकी पेट से नहीं मिट्टी की घड़ों से पैदा हुए है जो १०० लड़के थे और एक लड़की जो बायोलॉजिकल असंभव है । अगर मान भी लिया जाये एक औरत नौ महीना में एक बच्चा पैदा करे या जुड़वां तो ज्यादा से ज्यादा उसकी मेंस्ट्रुएशन साइकिल में ज्यादा से ज्यादा ४० से ५० बच्चा पैदा कर सकता है उससे ज्यादा नहीं क्योंकि ज्यादातर लडकियोंकी मेंस्ट्रुएशन साइकिल १० या १२ की उम्र से शुरु हो जाती हैं और ज्यादा से ज्यादा मेनोपोज़ यानी ५२-५४ तक बच्चे पैदा करने की क्षमता होती है । फिर ऊपर से गांधारी की आंख में पट्टियां और उनकी पति अंधा; आप खुद आगे सोच सकते हो; यानी कौरव बायोलॉजिकली इम्पोसिबल हैं । अब आते हैं पांडव के वारे में; पांडव नाम उनकी पिता पांडु से है जो की खुद एक नपुंसक थे यानी उनकी बच्चे पैदा करने की योग्यता ही नहीं थी तो कुंती और मद्री ने कैसे बच्चे पैदा की होगी आप खुद समझ लो । कोई सूर्य पुत्र था तो कोई धर्म, वायु और इंद्र की तो कोई अश्विनी की; इसका मतलब दो रानी आपने पति से नहीं अवैध सम्पर्क से ही बच्चे पैदा किया; वायु यानी हवा और सूरज के साथ कैसे सेक्स हो सकता है वह तर्क से बहार है । अच्छा चलो मानलेते हैं किसी और से “नियोग” प्रक्रिया से ये बच्चे पैदा हुए थे, जब की कौरव का पैदा होना बिलकुल असंभव है तो इसलिये ये एक मन गढन कहानी है ना की सत्य । आगर मान भी लिया जाये ये सब सच था तो यह लोग कौन सी भाषा की इस्तेमाल करते थे? अगर कुरूक्षेत्र नर्थ इंडिया का एक छोटा सा हिस्सा है तो हम ये कैसे मान लें ये अब की पूरी इंडियन भूखंड थी । अगर उनकी माँ बोली अलग था तो जो इनकी माँ बोली से अलग हैं और इस कहानी की अनुगामी हैं उनकी कहानी से क्या रिसता? इस कहानी को क्यों जबरदस्ती उन पे थोपा जाता है? जब भारत पहचान ही संदेह के घेरे में है तो ये देश का पहचान कैसे बन गया?  जब की सत्य ये है; भारत शब्द का उपयोग सावरकर ने अपनी हिंदूवादी संगठन “अभिनव भारत” के लिए  1903 में किया था । जो की हिंदूमहासभा का प्रेसिडेंट था; जो आर.एस.एस से जुड़ा था । जिसके कहनेपर नाथूराम गोडसे ने गाँधी जी की हत्या की । और जो कांग्रेस पार्टी ज्यादातर हिंदूवादी यानी वर्णवादी इस हिन्दू महासभा से सम्पर्कित नेताओंसे भरीपड़ी थी जिसके कारण जिन्न्हा ने कांग्रेस छोड़ी और पाकिस्तान के वारे में सोचा । सुभाष चंद्र बोस ने कांग्रेस छोड़ी और फॉरवर्ड ब्लॉक् बनाई और आज़ाद हिन्द की कल्पना की । 1947 में देश की आज़ादी के बाद इस कांग्रेस वाले हिन्दूत्त्व नेताओंने देश का नाम “भारत” रखा । देश का नाम हिन्दू महासभा ओरिजिन से “भारत” रखना इस बात का सबूत है की कांग्रेस बस छद्म सेकुलर है । जबकि खुद नेहरू या गांधीजी या तब का समय की कोईभी नेता देश के लिए “भारत” शब्द का इस्तेमाल नहीं किया । प्रमाण के तौर YouTube में आप उन लोगोंकी ओरिजिनल भाषण देख लीजिये । ज्यादातर वह देश का नाम हिन्दुस्तान या इंडिया का इस्तेमाल किया ना की भारत । ये इस बात का सूचक है भारत शब्द इनके बाद ही इस्तेमाल में आया । अगर आया तो इसके पीछे की नीयत क्या है? देश एक, नाम तीन क्यों? अगर किसी का नाम “अमर” है तो कोई भी भाषा में उससे  लिखे वह “अमर” ही रहेगा; लेकिन हमारा देश का नाम अंग्रेजी में इंडिया है लेकिन जब हिंदी में लिखते हैं वह “भारत” बन जाता है जब की भारत एक अलग नाम है । एक अलग नाम के पीछे क्या उद्देश्य हो सकता है आप ढूंढ़ने की कोशिश करो । मेरे हिसाब से इसके पीछे एक ही मक़सद है देश को हिन्दू राष्ट्र यानी वर्ण व्यवस्था  वाली देश बनाना जब की खुद वर्ण व्यवस्था  एक अंधविश्वास है । अगर मानलिया जाये भारत पहचान रामायण की चरित्र राम की छोटे भाई भारत से ली गयी है तो ये कितना तार्किक है? अगर राम अयोध्या की राजा थे तो दूसारे राजाओंके सभ्यता से क्या संबध हैं? अयोध्या तो अब की इंडिया नहीं था? अयोध्या एक छोटा सा राज्य था जो की उनके अनुगामी के हिसाब से अब उत्तर प्रदेश में है । वह सारि उत्तर प्रदेश भी नहीं था । अगर राम इस भूखंड में पैदा हुए तो उनकी माँ बोली इस भूखंड में जो बोली बोला जाता है वही होंगी; तो दूसरी भाषी लोगोंके साथ इनका कनेक्सन क्या है? क्या बन्दर सेना उनकी भाषा में बात करना जानते थे? क्या राम, लक्ष्मण, सीता, हनुमान इत्यादि श्रीलंकान भाषा जानते थे? भारत अगर राम जी की भाई भरत के नामसे आया है तो पूरी अयोध्या तो आज की इंडिया नहीं थी तो राम राज्य बनाने का नारा कितना सही है? इससे पता चल गया होगा राम की नाम पे राजनिति और आस्था की दुकान चलाने वाले ना केवल अंधविश्वासी, मुर्ख, बिकृत दिमाग की है बल्कि असामाजिक भी है क्यों की राम की नाम पे ये दंगा किये और इंसानों की हत्या की और सार्वजनिक और निजी संपत्ति का नुक्सान भी किया । जब भारत शब्द की खोज चली कुछ धूर्त्त ज्ञानी भारत शब्द को सही साबित करने के लिए अपनी हिसाब से भारत का मतलब भी निकाल लिए. कुछ बोलते हैं भारत शब्द एक संस्कृत शब्द है जिसका अर्थ “भा” का मतलब है प्रकाश और ज्ञान, “रत” का अर्थ है “समर्पित”। भारत का मतलब है “अंधेरे के खिलाफ प्रकाश के लिए समर्पित”। “अंधेरे के खिलाफ प्रकाश के लिए समर्पित” तो बुद्ध के लिए सही बैठ ता है क्यों के उनको लाइट ऑफ़ एशिया भी कहा जाता है उनके नाम पे देश का नाम बुद्ध ही रख देते जो की ज्ञान और समर्पण का नाम है? अगर भारत एक संस्कृत शब्द है तो जो गैरसंस्कृत बोलनेवाले लोग हैं इस शब्द से क्या सबंध है? संस्कृत भाषा बोलनेवाले तो इस भूखंड का सत्यानाश किया है? ये नई अर्थ कितना भरोसा की योग्य है कौन जानता है और देश में १५ हजार से भी कम लोग जिसको अपनी मातृभाषा मानते हो इसको इतना प्राधान्य देने का उद्देश्य क्या है? कुछ का मानना है यह वैदिक देवता अग्नि के नामों में से एक है, और कुछ का मानना है की यह एक पौराणिक राजा है जो की, दुष्यंत और शकुंतला के पुत्र था। और कुछ लोगों का मानना है देश का नाम इसलिए भारत नामित किया गया है क्योंकि जैन धर्म का पहले तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव के सबसे बड़े पुत्र भारत चक्रवर्ती ने लंबे समय तक इस भूखंड पर  शासन किया था; लेकिन ये कितना सही ही कहना मुश्किल है, कब और भूखंड का कितना हिस्सा उनोहोने राज किया था वहाँ पर बस मन गढ़न बातें और खामोशी ही है.  कुछ जैन अनुगामियों के अनुसार, जैन धर्म एक प्राचीन धर्म है और यहां तक कि वैदिक/हिंदू धर्म से भी बड़ा है । अगर सूरज एक्जिस्ट करता है इसको चाहे लोग हजार नाम से जाने लेकिन एंटिटी नहीं बदलता. लेकिन भारत शब्द के केस में सब कुछ बदलता रहता है इसलिये इस पहचान को देश का पहचान बनाना कुछ ही लोगों की दिल्लगी है यानी उनको ये नाम पसंद है और उनकी मेजोरिटी गणतंत्र की पोलटिकल मूवमैंट में ज्यादा होनेका कारण बेमतलब और असंबधित नाम भी देश का नाम रख सकते हैं. क्यों की वैदिक प्रचारकों और उनके प्रसारकों ने ये नाम कोएन किया था ज्यादातर ये पहचान वर्णवादी और ब्राह्मणवादी ही है जिसको धर्म निरपेक्ष माना नहीं जा सकता. अब आप जान लिए होंगे हिंदूवादी संगठन और उनके पोलिटिकल पार्टी क्यों “भारत माता की जय” बोलते हैं? यह भारत माता की नहीं वर्णवाद और मनुवादी की जय है जो की एन्टीसेकुलर ही है. इसीलिए हमारा देश का नाम ऑफिसियली ना हिन्दुस्तान सही है ना भारत सही है लेकिन इउरोपियन ओरिजिन से इंडिया ही सेक्युलर है और यही एक ऑफिसियल नाम ही हमारे देश का नाम रखना सही है. हमारा देश का नाम इंडिया रहना इसलिए सही है क्यों की ये कोई एक धर्म विशेष या कोई एक भाषीय सभ्यता या जाती या दौड़ (Race) या एक तरह की रूढ़िवादी विचारधारा या सोच को रिप्रेजेंट नहीं करता. इंडिया पहचान पूरी तरह से निरपेक्ष है और ये पहचान कंट्रोवर्सी से बहार है. ये अंग्रेजों का दियागया नाम नहीं है बल्कि अंग्रेजोंने इस नाम को इस भूखंड की पहचान के लिए अपनाया था. 5th सेंचुरी BC से भी पहले इयुरोपियन्स हमारे भूखंड को इंडोस(indos), इंडस(Indus), इंडीज(indies) इत्यादि के नामसे जाना करते थे. जो की आज की पाकिस्तान में बहते हुए नदी यानी सिंधु नदी से प्रेरित है. इंडिया का नाम पुरानी अंग्रेजी भाषा में जाना जाता था और इसका इस्तेमाल पॉल अल्फ्रेड के पॉलस ओरोसियस में भी इस्तेमाल किया गया था. मध्य अंग्रेजी में, फ्रांसीसी नाम प्रभाव के तहत, येंडे या इंडे द्वारा प्रतिस्थापित किया गया था, जिसने प्रारंभिक आधुनिक अंग्रेजी में इंडी के रूप में प्रवेश किया था. सायद लैटिन, या स्पेनिश या पुर्तगाली के प्रभाव के कारण 17 वीं शताब्दी के बाद से इंडिया अंग्रेजी उपयोग में आया. अंग्रेज उनके दिये गए इस भूखंड पहचान की नाम इस्तेमाल किया और हमारा देश का नाम इंडिया हो गया. ऑफिशियली देश का नाम केवल इंडिया ही होना चाहिए अनऑफिसियली आप जितने भी नाम रखो वह आप की पसंद है.

ORIGINAL RASTRA PITA OF BHARAT IS SAVARKAR (FATHER OF BHARAT)

RAPE IS NOT A CRIME ITS A RELIGIOUS DUTY ( Parodharmah)

  _ V.D. SAVARKAR

NEXT TIME WHEN YOU SEE ANYWHERE SAYING HIS FOLLOWERS

BHARAT MATA KI JAY!

DON’T FORGET TO MEAN IT THAT, THEY ARE SON OF BHARAT MATA WHOSE PITA IS V.D. SAVARKAR, WHO HAD AN IDEOLOGY RAPING IS GREAT RELIGIOUS DUTY (Parodharmah). SINCE IDEOLOGY OF FOUNDER “BHARAT” IS BALATKAR PARODHARMAH I.E. RAPING IS GREAT RELIGIOUS DUTY SO WE CAN SAY “BHARATIYA JANTA PARTY(BJP)” SHOULD BE BETTER KNOWN AS “BALATKARI JANTA PARTY.”

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इंडिया का सबसे बड़ा अंधविश्वास और मानसिक विकृति

बिना सोचे समझे जिस पर बिलीव या भरोसा/विश्वास किया जाता है उसे हम ब्लाइंडबिलीव यानी अंध विश्वास कहते हैं. अगर हम ये जानते हैं जिस पर हम बिलीव या भरोसा/विश्वास कर रहे हैं वह एक ब्लाइंडबिलीव यानी अंध विश्वास है या झूठ और भ्रम है; और अभ्यास के कारण एक लम्बे समय तक करते आ रहे हैं, वह एक मानसिक विकार यानी मानसिक विकृति है. ऐसा ही इंडियन भूखंड में वैदिक सामाजिक वर्ण व्यवस्था है जो की एक अंध विश्वास यानी मानसिक विकृति है.

इंडियन भूखंड कभी की एक भाषीय या एक राजा की अखंड राज्य सदियों नहीं रहा. यहाँ का भूखंड हजारों भाषीय सभ्यता से भरा रहा और इस भाषीय सभ्यताओं को तरह तरह की राजा राज किये. राजाओं के धर्म के अनुसार उनके प्रजाओं की भी धर्म हुआ करता था. बहुत सारे राजाओं धर्म की छूट यानी आजादी भी दी थी और कुछ राजाओं ने खुद की अपनायी हुई धर्म ही अपने प्रजा पर प्रेम से प्रसार किया जैसे बौद्ध धर्म राजा अशोक के द्वारा; तो, कोई जबरदस्ती थोपा, जैसे वैदिक वर्ण धर्म राजा पुष्यामित्र सुंग के द्वारा और इस्लाम; मुसलमान राजाओं के द्वारा. इंडिया की भूखंड में २०११ सेंसस की गणना की अनुसार १२२ प्रमुख भाषा और अन्य १५९९ भाषाएं देखने मिलते हैं । जितना भाषा, ये हम मान सकते हैं उतनी तरह की सभ्यता । अगर एक सभ्यता एक भाषीय भूखंड होता तो दूसारे भाषा की प्रयोजन ही क्या है? ज्यादातर राजाओं अपना अपनाई गयी धर्म को उसकी राज्य में फैलाते थे, ताकि एक सोच वाली नागरिकों  से मत भेद कम हो और राज्य में शांति बनाया रहे । क्यों की इस भूखंड में तरह तरह की भाषीय सभ्यता थे उनके जीवन सैली भी अलग अलग थे । यहां कई बुद्धिजीवी और महापुरुष पैदा हुए और उनके बनाई गयी दर्शन भी अलग अलग थी । उनके दर्शन या धर्म भी एक दूसरे की विरोधी भी थे ।  कुछ राजा धर्म और दर्शन की आजादी भी दी और कुछ प्रचारक और प्रसारक विरोधी धर्म को विनाश और अपभ्रंश भी किया । इस भूखंड में दो तरह की दर्शन और उससे बनी धर्म बने; एक तर्कसंगत(Rational) और दूसरा तर्कहीन(Irrational); आजीवक, चारुवाक/लोकायत, योग, बौद्ध, जैन और आलेख इत्यादि बिना भगवान और बिना मूर्ति पूजा की तर्कयुक्त धर्म और दूसरा बहुदेबबाद, मूर्ति पूजन, अंधविश्वास, तर्कविहीन, हिंसा, छल कपट और भेदभाव फैलाने वाला वैदिक जैसे धर्म । वैदिक धर्म को सनातन और हिन्दू धर्म भी कहा जाता है, जो वैदिक वर्ण व्यवस्था के ऊपर आधारित है । क्यों के आज की “हिन्दू” पहचान वाले अनुगामी चार वर्ण से बंटे हुए हैं; ये दरअसल चार वर्ण के वारे में जो धर्म या दर्शन बोलता है उसके अनुगामी हैं. चार वर्ण केवल एक ही दर्शन में मिलता है वह है संस्कृत में रचना की गयी रिग वेद में. यानी ये इस बात का पुष्टि करता है वर्ण व्यवस्था वैदिक सोच में में पैदा हुआ और जिन लोगों की प्रिय या मातृभाषा संस्कृत था उन्होंने ही इस सोच को दुषरे गैर संस्कृत भाषाई सभ्यता पर थोपा. वर्ण व्यवस्था रिग वेद की “पुरुष सूक्त १०.९०” में विस्तार रूप से व्याख्या की गयी है.

पुरुष सूक्त के अनुसार: एक प्राचीन विशाल व्यक्ति था जो पुरुष ही था ना की नारी और जिसका एक हजार सिर और एक हजार पैर था, जिसे देवताओं (पुरूषमेध यानी पुरुष की बलि) के द्वारा बलिदान किया गया और वली के बाद उसकी सरीर की टुकड़ों से ही विश्व और वर्ण (जाति) का निर्माण हुआ, जिससे ये दुनिया बन गई । पुरूष के वली से, वैदिक मंत्र निकले । घोड़ों और गायों का जन्म हुआ, ब्राह्मण पुरूष के मुंह से पैदा हुए, क्षत्रियों उसकी बाहों से, वैश्य उसकी जांघों से, और शूद्र उसकी पैरों से । चंद्रमा उसकी आत्मा से पैदा हुआ और उसकी आँखों से सूर्य, उसकी खोपड़ी से आकाश बना ।  इंद्र और अग्नि उसके मुंह से उभरे ।

कोई भी मनुष्य श्रेणी पुरुष की मुख, भुजाओं, जांघ और पैर से उत्पन्न नहीं हो सकती ना कोई कभी बिना जैविक पद्धति से पैदा हुआ है? मुख, बाहें, जांघ और पैरों से कभी भी इंसान पैदा हो नहीं सकते है, जो की अवैज्ञानिक और एक अंध  विश्वास है. साधारण ज्ञान के अनुसार, कोई भी जीबित  पुरुष को अगर मार दिया जाता है वह मर जाता है, ना की उससे कई तरह की जीवित प्राणियां पैदा हो जाते हैं. पुरुष  की बली से और उसकी सरीर की टुकड़े से इंसान पैदा होने का सोच ना केवल एक अंध विश्वाश है, ये झूठ, भ्रम और मुर्ख सोच भी है. पुरुष बलि की टुकड़ों से वैदिक मंत्र निकलना, घोड़ों और गायों का जन्म होना; आकाश, चंद्रमा और  सूर्य, उसकी शरीर की टुकड़ों से बनना ये एक मुर्ख सोच ही नहीं बल्कि उससे भी घटिया सोच है जो हमारे सभ्यता को अज्ञानता और अंधविश्वास की खाई में धकेलता है. दुःख की बात है जो इस सोच को फैलाते हैं हम उनको पंडित कहते हैं. ये सोच एक तरह से मानसिक विकृति है. इस सोच को ज्ञान की चोला पेहेनाके इंसान को बांटना और उन में फूट दाल के उन पर राज करना ना केवल मूर्खता है बल्कि शातिराना भी है; वर्ण की उत्पत्ति को हम वैदिक ज्ञान की बेवकूफी बोल सकते हैं. आप खुद ही अपनी तर्क से सोचो ये कैसा अंध विश्वाश और मूर्खता है? जिस मूर्खता और अंध विश्वास को सदियों ज्ञान और धर्म का चोला पहनाया गया और फैलाया गया? ये क्या मूर्ख सोच और अंध विश्वास का गुंडा गर्दी नहीं तो क्या है?

इस जातिबाद वैदिक पुरुष सूक्त फैलाने का क्या मतलब? मतलब साफ़ है गंदी सोच रखने वाले गुंडई सोच कपटी लोमड़ी सोच बुद्धि जीवी लोग अपनी और अपनी जैसी कुछ लोगों की संगठित लाभ के लिए बनाई सामाजिक शासन व्यवस्था जिसको हम वैदिक सामाजिक शासन व्यवस्था बोलते हैं जो की इंडिया सभ्यता की सबसे बड़ा मुर्ख और घटिया दर्शन है जिसको छल और बल से इसको इंडियन लोगों के ऊपर अपने संगठित लाभ के लिए  थोपा गया है  । हर भाषीय सभ्यता को ब्राह्मणबाद अगड़ी और पिछड़ी श्रेणी में बांटा; धूर्त, बाहुबली और बईमानों को अगड़ी यानी शासक वर्ग बनाने की मदद की और श्रम श्रेणी को हमेशा श्रम श्रेणी बने रहना और अगड़ी बनने से रोकने के लिए वर्ण व्यवस्था को धूर्त, बाहुबली और बईमानोंने अपनाया । रिग वेद का पुरुष सूक्त जो वर्ण व्यवस्था का वर्णन करता है एक मूर्खता और अज्ञानता का परिभाषा है; और क्योंकि ये संस्कृत भाषा में रचना की गयी हैं और अन्य १७०० भी ज्यादा अलग भाषी बोलने वाले सभ्यता जिन को संस्कृत बोलना नहीं आता उनके ऊपर  ये सोच जबरदस्ती थोपा गया है । यानी जिनलोगों की माँ बोली संस्कृत नहीं उनकी भाषीय प्रजाती में वर्ण व्यवस्था ही नहीं थी; इसलिये ये सोच उनके ऊपर छल और बल से थोपा गया है । संस्कृत भाषा सब भाषा की जननी है ये एक सफ़ेद झूठ है; जिसको मुर्ख और धूर्त वैदिक प्रचारकोंने फैलाई है । अगर संस्कृत भाषा इतनी पुरानी है, तो आज तक उसकी बोलने वाले १५ हजार से भी कम लोग क्यों हैं? ईश भाषा को कोई भी ख़तम करने को कोशिश नहीं किया; ईश को स्वाधीन इंडिया में भी संरक्षण मिला; उसके बावजूद ये कभी भी जन प्रिय भाषा बन नहीं पाया; इसका मतलब ये है की ये भाषा कभी भी  इस भूखंड का लोकप्रिय भाषा ही नहीं रहा । लेकिन दिलचस्पी की बात ये है की, हर वैदिक भगवान बस संस्कृत में ही समझता है । अगर भगवान हमेशा संस्कृत में समझते हैं, तो जिन लोगों का मातृभाषा संस्कृत नहीं हैं तो उनकी भगवान कैसा बना? क्या हम अरबी समझने वाले अल्ला; या इंग्लिश या अरामिक समझने वाला जिसु को अपना भगवान मानते हैं? तो संस्कृत समझने वाला भगवान हमारा भगवान है ये कितना तार्किक और मानने योग्य है?

३००० साल पहले इस भूखंड में कोई प्रमुख धर्म नहीं था; तो हमारा सब पूर्वज धर्महीन/धर्मबिहीन/गैरधर्मी ही थे; और किसी भी प्रमुख धर्म को नहीं मानते थे, तब क्या वह सब पापी और जानवर थे? प्रकृति की जैविक पहचान बड़ा है या कुछ इंसानों की बनाई गयी धार्मिक सामाजिक पहचान बड़ा? क्या हम पापी और जानवर के संतान हैं कहलवाना पसंद करेंगे? ये हम क्यों मानने को तैयार नहीं के हमारे पूर्वज इंसान थे; हो सकता है उन में से कुछ अच्छा होंगे और कुछ बुरा, और हम उन इंसानोकी ही संतान है ना की हिन्दू, मुसलमान, क्रिस्टिआन, बौद्ध, जैन इत्यादि इत्यादिओं का संतान? ये ज़रुरी नहीं है की हर अच्छा इंसान की संतान अच्छा इंसान ही हो और एक बुरा इंसान की संतान हमेशा बुरा. लेकिन एक तरह की सोच जो अच्छा भी हो सकता है और बुरा भी जो की साइंनोने ही बनाया है, और उनकी पीढ़ीओं को वही सोच विरासत में देकर जाते हैं वह है धर्म. ज्ञान और धर्म दो अलग चीज है. कोई भी धर्म को अच्छे ज्ञान और बुरे ज्ञान के तौर पर लिया जा सकता है लेकिन कोई भी एक सोच या ज्ञान को अपना ज्ञान मानना, जो की बुरा भी हो उस को सही ठहरना क्यों की उस को उसकी पूर्वज और वह मानता है, वह कितना सही और तार्किक है? उसीको रिपिटेडली अपने पीढ़ियों को ट्रांसफर करना ज्ञान की आजादी को रोकना होता है.

जितने भी आज की प्रमुख धर्म है जैसे ईसाई, इस्लाम, हिन्दू ये सब धर्म इन ३००० साल की अंदर ही बने हैं. ३००० साल पहले हमारे पूर्वज इस मिट्टी से  जुड़े हुए थे जिस मिट्टी के साथ अब हम जुड़े हुए हैं और आने वाला पीढी भी इस  मिट्टी से जुड़ेंगे. आज हम जिस धर्म के अनुगामी हैं या जुड़े हैं हमारा पूर्वज तो जुड़े हुए नहीं थे न वह हिन्दू कहलाते थे, ना मुसलमान ना ईसाई तो क्या उनकी जिंदगी की कीमत कम हो गयी थी? जिन के वजह से हमारा वजूद है वह अगर कोई धर्म को मानते ही नहीं थे तो धर्म आज की जिंदगी में इनसानियत से ज्यादा बड़ा कैसे हो गया? आज धर्म के वजह से इंसान इंसान से घृणा करता है. कोई बोलता है अरब का भगवान अल्लाह मेरा भगवान है तो कोई बोलता है बन्दर  सर वाला मानव, हाथी सर वाला मानव, सांप, कछुआ, मछली, दस हात वाला विष्णु, चार मुंडी वाला ब्रह्मा, पुरुष जननांग (शिव लिंग) इत्यादि इत्यादि इन जैसे पहचान वाला ३३ करोड़ मेरे भगवान है; कोई बोलता है जेरुजेलम में पैदा हुआ भगवान पुत्र जो की आरामिक भाषीय पहचान यीशु ही मेरे भगवान है, तो कोई महावीर और बुद्ध को अपना भगवान मानता है. इस पीढ़ी और उनसे आगे 25 पीढ़ियां क्या कोई इन भगवान को देखा था? तो एक सोच को दूसरे पीढ़ी के दिमाग में इम्प्लांट करके उससे नफरत और हिंसा पैदा करके एक दूसरे से लड़ना क्या मानसिक विकृति नहीं है? जब की ये सब सोच या इनफार्मेशन इंसानी दिमाग का बस एक रासायनिक स्थितियां हैं जो की एक इंसानी दिमाग से दूसरे दिमाग को इंसानी कम्यूनिकेशन से जस्ट सोच की रासायनिक कॉपी एन्ड पेस्ट हुई हैं. मैमोरी के हिसाब से बायोलोजिकली  इंसानी दिमाग में रसायन अणुओँके की तहत एक पहचान की तौर पर एक पीढ़ी से दूसरे पीढ़ी को ट्रांसफ़र किया जाता है. इनका असली मौजूदगी नहीं होता लेकिन इंसान की दिमाग में साइकोलॉजिकल मौजूदगी होता है जो की भ्रम की बराबर ही है. भ्रम इसलिये जब आप कुछ आंखों से देख ते है, कानों से सुनते हैं उस को महसूस  करते हैं और  उसका साथ कुछ ऐक्शन करने की क्षमता रखते है तो वह रियलिटी है. इंसानो की दिमाग अपने मेमोरीमें से कुछ भी काल्पनिक सोच पैदा कर सकता है वह जरूरी नहीं की वह रियलिटी हो. अगर आप जिसको सोच में ही कम्यूनिकेट करते हो लेकिन कम्यूनिकेट का माध्यम रियलिटी में पत्थर, धातु या मिट्टी से बनी मूर्त्तियां या वैसे ही कुछ प्रतीकात्मक इत्यादि के साथ इंटरैक्ट कर रहे हो जो की कुछ माइने नहीं रखता क्यों के निर्जीव पदार्थों का ना कान होता है ना आँख जो की आप को सून सकते हैं ना देख सकते हैं ना आप की कम्यूनिकेशन को महसूस कर सकते हैं तो आप रियलिटी में कुछ कर है हो और सोच में कुछ इसलिये ये भ्रम है. अगर एक कल्पना जो की हकीकत नहीं है और रियलिटी को हार्म करे उसकी अभ्यासगत प्रैक्टिस करना वेकूफ़ी ही है. कुछ इंसानोने अपने चारो ओर एक्जिस्टेन्स देखी उनको किसने बनाया उसकी तार्किक चिंतन से जब हार गया तो उनको एक आलसी और सुबिधावादी सोच से एक काल्पनिक महा सक्तिमान एंटिटी की पेहेचान देकर भगवान बनादिया; जो की केवल एक इमेजिनरी साइकोलॉजिकल एंटिटी ही है.  अब जिस इंसान की सोच जैसा है उसकी एंटिटी/भगवान भी वैसे बन गया. भगवान के नाम से शातिर लोग सोसिअल कोन्फोर्मिटी का गलत इस्तेमाल करके उनके दिमाग और जीवन पर कंट्रोल करने लगे उस को हम धर्म कहते हैं. अंधविश्वास और अपराध को धर्म की छतरी के नीचे लीगालाइज़ किया और भगवान भ्रम फैलाके अनुगामिओं की शोषण की . क्राइम्स यानी अपराध और अंधविश्वास को कोई भी धर्म का चोला पहनाओ वह अपराध और अंधविश्वास ही होता है. धर्म के नाम पर अपराध और अंधविश्वास को सही का चोला पहनना या सही साबित करना भी एक व्यक्तित्व विकृति ही है. अब हर धर्म में क्रिमिनल इंटेलीजेंसिआ ज्यादा मिलेंगे और  इंटेलीजेंसिआ कम. तरह तरह की भगवान सोच से इंसान और इंसान की बिच सोच की जंग लगी और इस सोच के वजह से तरह तरह की सामाजिक बुराई पैदा हुए और यहाँ तक की इंसान इंसान को मारने लगा और इस भगवान की सोच की वजह से हमारा इंसानी दौड़ भगवान की आस्था की सम्राज्य में विभाजित हो गया जैसे की अब ह्यूमान रेस में ३१% से भी ज्यादा लोग ईसाई धर्म को मानते हैं, २४% से भी ज्यादा लोग इस्लाम को मानते हैं और १५% से ज्यादा लोग वैदिक(हिन्दू) धर्म को मानते हैं. ये लोग अपने धर्म की भगवान को ही अपना भगवान मानते जब की दूसरे धर्म की भगवान को नकारते हैं. असलियत में ये भगवान सोच से पैदा एक मानसिक विकृति है जिसको हम गॉड एडिक्शन डिसऑर्डर कहना ठीक होगा. गॉड एडिक्शन डिसऑर्डर में इंसान दूसरे इंसान को अपनी भगवान की सोच की वजह से हार्म करता है और उससे तरह तरह की असामाजिक बीमारी और दूसरे मानसिक बिकृतियाँ पैदा होते हैं. जैसे इंसान को अगर कोई रोग होता है जिससे इंसान को सामान्य जिंदगी से कठिनाइयां होती है और कभी कभी अपना जान भी गंवाना पड़ता वैसे ही अगर भगवान की सोच की वजह से इंसान को तकलीफ हो और उसी सोच के वजह से खुद की और दूसरे इंसान की जान भी जाये, खुद को अंध विश्वासी बना ले, तर्क से घृणा करे, उसके मन में लॉजिकल ब्लाइंडनेस पैदा हो जाये, निर्जीव मूर्त्तियोँ के आगे जिन्दा पशुओं की बलि दे और उसके आगे सर झुकाये, निर्जीव मूर्त्तियों को घंटी बजा के उठाये और उनको खाना भी परोसे, भगवान की नाम से कुछ भी बोलो बिना सोचे समझे उसकी विश्वास कर ले और उस को कार्य में भी पालन करे यहाँ तक की पशुओं के मल और मूत्र को बिना तर्क के चाट ले, किसी इंसान की बलि भी चढ़ा दे इत्यादि इत्यादि करे, भगवान को माइक में चिल्ला चिल्ला के ढूंढे और तू ही बड़ा एक ही भगवान बोले और ये भी स्वीकार करे ना उसका शेप, साइज और आकर है इत्यादि इत्यादि, और कभी भगवान से बच्चा भी पैदा करके उस को सन ऑफ़ गॉड बोले यानी भगवान सेक्स भी करता  जैसे मानसिकता को फैलाये ये मानसिक बिकृतियाँ नहीं तो क्या है? इस तरह की तरह तरह इल्लॉजिकल सोच और अंध विश्वास को इंसानी दिमाग में इम्प्लांट करना और उनके लाइफ और दिमाग के साथ खिलवाड़ करना क्या एक मानसिक बीमारी नहीं है? जो लोग ये जानते हुए भी ये सोच दूसरे की दिमाग में अपने फायदे के लिए इम्प्लांट कर रहे हैं वह क्या असामाजिक व्यक्तित्व विकार की शिकार नहीं है? जिस भगवान सोच की मानसिक स्थितियों के कारण इंसान इंसान को नफ़रत करता है या एक दूसरे की दुश्मन और जान ले लेता है हम उस विकृत मानसिक स्थिति को एक रोग क्यों नहीं कह सकते? क्यों के ये सब बिकृतियाँ भगवान प्रेम से पैदा हुआ है, ये एक मानसिक बीमारी “God Addiction Disorder” ही है.

गॉड एडिक्शन डिसऑर्डर को हम Theophlia भी कह सकते हैं. थियोफिलिया दो शब्द “थियो” और “फिलिया” का संयोजन है। आप थिओलॉजी(Theology) शब्द के बारे में जानते होंगे  जिसका मतलब है “ईश्वर का तर्क(लॉजिक ऑफ़ गड)” यानी “थियो” का अर्थ “ईश्वर” है, जहां “फिलिआ(philia)” का मतलब असामान्य प्यार है, या किसी विशिष्ट चीज़ के प्रति झुकाव है। बस थियो = ईश्वर, फिलिया = एक काल्पनिक शक्तिमान पहचान को बिना शर्त या सशर्त प्रेम करना और ये इस प्यार के लिए कोई कारण हो या ना हो ये माइने नहीं रखना और ये विश्वास करना  जो की सर्वोपरि या हर एक चीज का निर्माता, पालन कर्ता और संहार कर्ता है; जिसको अनुगामी तर्क से विश्वास करने का कोई कारण ज़रुरी नहीं है, को भी स्वीकारता है । अन्य अर्थ में अगर हम कहें थियोफिलिया का मतलब है भगवान की लत (God addiction) । थियोफिलिया एक मानसिक  विकार है और यह हमारे मानव जाति के लिए हानिकारक है । वर्तमान की हर धर्म की भगवान सोच को मानने वाला आस्तिक प्रचारक और उनकी प्रसारक उस सोच को बढ़ावा देते हैं जिन्होंने ना अपनी भगवान को देखा है ना  उनकी पूर्वजों ने देखा था ना उनके धर्म बनानेवाले धर्म  के संस्थापकों ने  देखा था । तो क्या आप इसको समान्य मानसिकता कहना पसंद करेंगे?

263BC के वाद इस भूखंड का प्रमुख धर्म बौद्ध धर्म बना क्योंकि राजा अशोक की बनाई गयी अखंड राज्य का राष्ट्र धर्म बुद्धिजीम था ना की वैदिक; तब की समय में बौद्ध धर्म एक तार्किक धर्म ही था. ईशाई धर्म 33AD के बाद पैदा हुआ और इस्लाम 610AD के बाद. 185BC में वैदिक ब्राह्मण पुष्यामित्र सुंग ने असोका राज की बौद्ध धर्म की विनाश किया और मनुस्मृति लागु करके वैदिक वर्ण धर्म को राजा अशोक की अखंड राज्य की ऊपर थोपा. क्यों के मनुस्मृति में ब्राह्मणो को तरह तरह की संरक्षण थी इससे संगठित पुजारीवाद ने इसको अपने भाषीय सभ्यता में ज्यादा फैलाया और समय के साथ कई राजाओं ने अपने आप को क्षत्रिय का वैदिक पहचान दिया और अपने तलवार की धार यानी दहशत, छल और बल, साम दाम दंड भेद के तहत 185BC से लेकर इस्लाम आक्रमण कारियों आने तक यानी 700AD तक ये धर्म को अच्छी तरह से फैलाया. इस्लाम राजाओं ने पाकिस्तान की सिंध प्रोविंस, जो की तब सिंधु सभ्यता कहा जाता था उनके नाम पर अपने राज की नाम रखा जैसे अल-हिन्द, इन्दूस्तान, हिंदुस्तान इत्यादि…और उनके राज्य में गैर मुसलमानों को हिन्दू की पहचान दी जो की तब ज्यादातर वैदिक यानि वर्ण को मानने वाले अनुगामी हो गये थे. क्यों के ज्यादातर शूद्र सबर्णों से प्रताड़ित थे, तो  ज्यादातर शूद्र इस्लाम को अपना धर्म मान लिया ताकि छुआ छूत जैसे असामाजिक तत्त्व से खुद को और अपने पीढ़ीओं को बचा सके. इस तरह से एक अंध विश्वास यानी वैदिक वर्ण व्यवस्था इस भूखंड का सबसे बड़ा प्रमुख धर्म बन गया.


India had totally controlled by Vedic caste promoter oligarch elites those are in practical psychologically disordered race or race of Indian origin crooks with severe anti social personality disorders and we can say them Indian racial sociopaths or elite social criminals. Both Congress and BJP dominated and controlled by these Vedic crooks or so called elites. Only for these stupids India got divided and we have now three nations from one origin.

Following Organizations are harmful to India those stagnates the Indian civilization till to date socially and whose ancestors were the root evils of the Indian civilizations.

Abhinav Bharat Society: Founded by Vinayak Damodar Savarkar and his brother Ganesh Damodar Savarkar in 1903.(Both were Marathi Chitpavan Brahmins).

Akhil Bhāratiya Hindū Mahāsabhā: Founded in 1915 & Founder was Madan Mohan Malaviya (Original surname was Chaturved an Allhabadi Brahmin).

Rashtriya Swayamsevak Sangh: Founded in 27 September 1925 in Nagpur & Founder was K. B. Hedgewar (Marathi Deshastha Brahmin).

Bharatiya Jana Sangh: Founded in 21 October 1951 & Founder was Syama Prasad Mukherjee (Westbengal Brahmin).

Vishva Hindu Parishad: Founded in 1964 & Founders were M. S. Golwalkar(Original surname was Padhye. The Padhyes belonged to a place called Golwali in Konkan in Maharashtra are Brahmins), Keshavram Kashiram Shastri (Brahmin), S. S. Apte (Maharashtrian Brahmins).

Why these type of organizations those promotes Stupid caste based social system (Purusha Sukta 10.90) are founded and lead by Brahmins?

Have you ever seen any Brahmin explaining where Castes and Brahmins born from? These stupids are not only race of crooks but also a race of blind believers those genetically making their descendants mentally ill and blind believers generation to generations. These stupids are thinking they are fooling to their followers but they are so stupids that they have been already made their descendants mentally disordered more than their followers.

जातिवाद यानी वर्ण व्यवस्था संस्कृत भाषी रचनाओं में मिलता है इसका मतलब ये हुआ जो गैर संस्कृत बोली वाले है उनके ऊपर ये सोच यानी वर्ण व्यवस्था थोपी गयी है । रिग वेद की पुरुष सुक्त १०.९० जो वर्ण व्यवस्था का डेफिनेशन है उसको कैसे आज की नस्ल विश्वास करते हैं ये तर्क से बहार हैं? सायद आज की पीढ़ी भी मॉडर्न अंध विश्वासी हैं । पुरुष सूक्त बोलता है: एक प्राचीन विशाल व्यक्ति था जो पुरुष ही था ना की नारी और जिसका एक हजार सिर और एक हजार पैर था, जिसे देवताओं (पुरूषमेध यानी पुरुष की बलि) के द्वारा बलिदान किया गया और वली के बाद उसकी बॉडी पार्ट्स से ही  विश्व और वर्ण (जाति) का निर्माण हुआ है और जिससे दुनिया बन गई । पुरूष के वली से, वैदिक मंत्र निकले । घोड़ों और गायों का जन्म हुआ, ब्राह्मण पुरूष के मुंह से पैदा हुए, क्षत्रियों उसकी बाहों से, वैश्य उसकी जांघों से, और शूद्र उसकी पैरों से पैदा हुए । चंद्रमा उसकी आत्मा से पैदा हुआ था, उसकी आँखों से सूर्य, उसकी खोपड़ी से आकाश ।  इंद्र और अग्नि उसके मुंह से उभरे ।

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भारत क्या है?

हिंदी क्या है? कभी इसकी खोज की है? हिंदी या हिन्दू शब्द का उत्पत्ति कहाँ से हुई है कभी आपने इसको जानने की कोशिश की है? चलिए इस लेख में इसकी खोज करते हैं और जानते है ये हिंदी या हिन्दू है क्या? दोस्तों, हमेशा याद रखना कोई भी तथ्य अगर विवादास्पद लगे उसके पीछे कुछ न कुछ साजिश होता है। इसको आप को तर्क से ढूंढना पड़ेगा ना की यूँही विश्वास कर लेना चाहिए क्यों की ये हम को हमारे पिछले पीढी ने बताया था । ये भी हो सकता वह चीज जो हमें बताया गया हो वे झूठ हो और एक साजिश हो और पिछले पीढी ने जो ये बात हम तक पहुँचाई वह भी साजिश का सीकर हो । दोस्तों, जब कोई हम तथ्य के संपर्क में आते हैं उसकी सोर्सेस यानी स्त्रोत तरह तरह की होते हैं, जैसे कोई लेख से, या कोई संचार माध्यम से, कोई लोक कथा से या हमारे चारों और मौजूद समाज से । कोई भी तथ्य की जानकारी आप को विभिन्न स्रोत से मिल जायेंगे । अगर इन स्रोतों से कहीं अंतर्विरोध दिखा तो समझ लेना ईश के साथ कुछ छेड़ छाड़ हुई है और छेड़ छाड़ की वजह कई हो सकते है । वैसे ही हम हिंदी के साथ देखते हैं । हमेशा याद रखना हमें जो तथ्य मिलेंगे उसकी हम तर्क से ही लेना पड़ेगा अगर तथ्य तर्क से नकरात्मक हैं उसके पीछे सत्य को ढूंढना पड़ेगा जब तक तथ्य तर्कसंगत हो ना जाए और अंतर्विरोध ख़तम हो ना जाये । हम जो भूखंड में रहते हैं उसका नाम अब इंडिया है; हाला की ये भूखंड की नाम सत्ता धारी ताकतों के राज की नाम के तहत रखा हुआ करता था । समय के साथ इस भूखंड को तरह तरह का राजा, राज किये और इस भूखंड हिशाओंका राजाओं के नाम से भूखंड का नाम हुआ करता था कहने का मतलब ये है; ये भूखंड सदियों कई भाषाई और उनकी राज की भूखंड रहा है । कई राजाओं ने इस भूखंड को राज किया और उनके साम्राज्य के नाम से इस भूखंड का नाम हुआ । अभी इस भूखंड में १२२ प्रमुख भाषा और अन्य १५९९ भाषाएं देखने मिलते हैं । जितना भाषा, ये हम मान सकते हैं उतनी तरह की सभ्यता । अगर एक सभ्यता एक भाषीय भूखंड होता तो दूसारे भाषा की प्रयोजन ही क्या है? जो भाषाएं काफी मिलता जुलता है, उनकी एक मूल भाषा हो सकती है; लेकिन जिनके शब्द और अर्थ ज्यादातर काफी अलग अलग होते हैं वह कभी एक मूल से नहीं हो सकते । हमारे भूखंड में न एक भाषा है ना कभी एक अखंड भूखंड सदियों रहा । समय के साथ ये बदलता रहा । इस भूखंड में राजाओं आपने राज्य की परिसीमा बढ़ाने के लिए एक दूसारे से लड़ते रहते थे । ये भूखंड कभी भी एक राजा की नहीं रहा समय के साथ  तरह तरह की राजा राज किया और उनकी विलुप्ति भी हुई । इन राजाओं के वारे में हमें इतिहास, लोककथा और पुराण और कुछ कुछ पौराणिक कथाएं  और शास्त्रों से मिलता है । इसका मतलब ये नहीं वह हमेशा सच ही हो । सत्ता धारी ताकतों ने अपनी ही प्रतिष्ठा को इतिहास की माध्यमसे ज्यादा बढ़ा चढ़ा के आगे बढ़ाया होगा और उसकी विरोधी की निश्चित रूप से ध्वंस या उसके साथ छेड़ छाड़ की होगी । इसी हिसाब से हम को इनसे मिली तथ्य के साथ तर्क संगत टिप्पणी करनी होगी ।

समय के साथ राजा बदले उनके साथ साथ रज्योंके परिसीमा भी बदली । ये भूखंड कभी हजारों राजाओं का भूखंड रहा तो कभी कुछ महाराजाओं का । राजाओं अपनी सक्ति से दूसारे छोटे छोटे राज्य मिला के अखंड राज्य बनाया करते थे या कभी कभी राज्यों के साथ संधि यानी मित्र राज्य बना के पडोसी राज्य किया करते थे । ज्यादातर एक दूसारे के साथ लड़ाई करके खुद को बड़ा साबित करना तब की राज युग की (Age of kingdoms) परम्परा थी । इसलिए कोई भी एक संयुक्त भूखंड ऐतिहासिक नाम जैसे भारत, हिंदुस्तान या इंडिया इतिहास की पृस्ट्भूमिसे लियागया नाम है कहना बेमानी है । इस भूखंड का नाम कभी भारत नहीं था । भारत नाम देश स्वाधीन होने का वाद ही दियागया है । ना भारत कोई राजा था ना उसकी कभी इतना बड़ा भूखंड का राज । बस कुछ मन गढन कहानी भारत नाम की प्रचार और प्रसार करते हैं । अगर हम ये मान ले भारत एक पुरुष है तो भारत को माता क्यों कहते है? भारत एक पुरुष की नाम है ना की स्त्री विशेष की । अगर भारत को हम एक राजा मान लें तो उनकी राज कितने तक फैला था उसकी वारे में कुछ कहा नहीं जा सकता । क्यों की उसकी कुछ मजबूत सबूत ही नहीं है । अगर मान लिया जाये भारत “महाभारत” से लिया गया है तो महाभारत का मतलब क्या है? “महा” मतलब बड़ा या महान और “भारत” मतलब एक व्यक्ति विशेष का नाम । इसका मतलब क्या हुआ? जैसे किसीका नाम अगर “पपु” है “महापपु” का मतलब क्या होसकता है? अगर मान लिया जाये “महाभारत” का मतलब “महा युद्ध” है तो “भारत” का मतलब युद्ध है । अगर भारत का मतलब युद्ध है तो इसको एक राष्ट्र का नाम के रुपसे इस्तेमाल करना कितना तार्किक है? अगर मानलिया जाये “भारत” पाण्डु और कौरव के पूर्वज थे जैसे हिन्दू ग्रंथों में लिखा गया है; महाभारत ही संदेह की घेरे मैं है जैसे महाभारत में लिखा गया है? क्या गांधारी के पेटमें जो बच्चा था उस को मारने का बाद उसकी टुकड़े १०१ मिटटी के घड़ा में रख कर बच्चे पैदा की जा सकती है? क्योंकि महाभारत की अनुसार गांधारी की बच्चे उनकी पेट से नहीं मिट्टी की घड़ों से पैदा हुए है जो १०० लड़के थे और एक लड़की जो बायोलॉजिकल असंभव है । अगर मान भी लिया जाये एक औरत नौ महीना में एक बच्चा पैदा करे या जुड़वां तो ज्यादा से ज्यादा उसकी मेंस्ट्रुएशन साइकिल में ज्यादा से ज्यादा ४० से ५० बच्चा पैदा कर सकता है उससे ज्यादा नहीं क्योंकि ज्यादातर लडकियोंकी मेंस्ट्रुएशन साइकिल १० या १२ की उम्र से शुरु हो जाती हैं और ज्यादा से ज्यादा मेनोपोज़ यानी ५२-५४ तक बच्चे पैदा करने की क्षमता होती है । फिर ऊपर से गांधारी की आंख में पट्टियां और उनकी पति अंधा; आप खुद आगे सोच सकते हो; यानी कौरव बायोलॉजिकली इम्पोसिबल हैं । अब आते हैं पांडव के वारे में; पांडव नाम उनकी पिता पांडु से है जो की खुद एक नपुंसक थे यानी उनकी बच्चे पैदा करने की योग्यता ही नहीं थी तो कुंती और मद्री ने कैसे बच्चे पैदा की होगी आप खुद समझ लो । कोई सूर्य पुत्र था तो कोई धर्म, वायु और इंद्र की तो कोई अश्विनी की; इसका मतलब दो रानी आपने पति से नहीं अवैध सम्पर्क से ही बच्चे पैदा किया; वायु यानी हवा और सूरज के साथ कैसे सेक्स हो सकता है वह तर्क से बहार है । अच्छा चलो मानलेते हैं किसी और से “नियोग” प्रक्रिया से ये बच्चे पैदा हुए थे, जब की कौरव का पैदा होना बिलकुल असंभव है तो इसलिये ये एक मन गढन कहानी है ना की सत्य । आगर मान भी लिया जाये ये सब सच था तो यह लोग कौन सी भाषा की इस्तेमाल करते थे? अगर कुरूक्षेत्र नर्थ इंडिया का एक छोटा सा हिस्सा है तो हम ये कैसे मान लें ये अब की पूरी इंडियन भूखंड थी । अगर उनकी माँ बोली अलग था तो जो इनकी माँ बोली से अलग हैं और इस कहानी की अनुगामी हैं उनकी कहानी से क्या रिसता? इस कहानी को क्यों जबरदस्ती उन पे थोपा जाता है? जब भारत पहचान ही संदेह के घेरे में है तो ये देश का पहचान कैसे बन गया?

INDIAN STAMPS GIVES US CLEAR PROOFS WHEN WE GOT THE NAME BHARAT. CLICK HERE FOR A COLLECTION OF INDIAN STAMPS, WHERE YOU CAN FIND CLEARLY, FROM JANUARY 17 1963 BHARAT NAME INTRODUCED IN STAMPS. ADOPTION OF BHARAT NAME FOR OUR NATION IN CONGRESS ADMINISTRATION SHOWS LINK WITH RSS AND HINDU MAHASABHA DOMINANCE IN CONGRESS PARTY OF INDIA.

Savarkar in his book “Six Glorious Epochs of Indian History”, which he had wrote before his death in 1966, show his views about his sharp communal ideology and voice of extremism and radicalism. Written in Marathi, his book based on many dubious historical records justifies rape as a political tool. Quoting the mythological figure Ravan, Savarkar wrote:

“What? To abduct and rape the womenfolks of the enemy, do you call it irreligious? It is Parodharmah, the great duty!”

Savarkar wanted Pakistan should be formed its why he had never opposed to Jinnah though  Jinnah and Savarkar both were living in Bombay. Savarkar wanted Pakistan should be formed as nation of Indian Muslims so he kept silence; where Jinnah was just a puppet to his conspiracy of two Nation theory. We must know prominently that first Hindutva political organization “Abhinav Bharat” had made by Savarkar in 1903 for two Nation theory followed by Muslim political organization All-India Muslim League  in 30 December 1906 at Dacca/Dhaka, Bangladesh by Nawab Viqar ul Malik. Jinnah was the supporter of united India and was an active member of Congress party till he joined in All-India Muslim League in 1913. He left Congress party only due to Hindu dominance in Congress party ignoring political interests of few Muslim leaders. Jinnah was not an orthodox Muslim, then how he supported a Nation based on religion? Which shows his political greed not the devotion to Islam; if he even not wanted partition there would not even partition. If Savarkar  wanted no partition he could have kill to Jinnah instead of Gandhi. Gandhi was just used and killed after the Nation formed. Hindu and Muslim were not the issue. Political rule and religious hegemony was the real issue. How Muslims of India and Hindus were living for 900yrs together without any disturbances i.e. from 700AD to 1600AD till British came, partly or majorly ruled by Islamic emperors to Indian demography? After even partition Punjabi clan converted to Islam  majorly rules Pakistan. Pakistani linguistic groups majorly from  Punjabi (45%), Pashto (15%), Sindhi (12%), Saraiki (10%) Urdu (8%) and Balochi (3.6%) where you can’t find any major orthodox Muslim ethnicity; which shows Pakistan is just a fake Islam nation. Actually original Hindustan is Pakistan not India due to presence of Shind province (Shindu civilization) and Shindu river in Pakistan that gives the Indian demography a National identity name “Hindustan” and name to its people Hindu.

जब की सत्य ये है; भारत शब्द का उपयोग सावरकर ने अपनी हिंदूवादी संगठन “अभिनव भारत” के लिए 1903 में किया था । जो की हिंदूमहासभा का प्रेसिडेंट था; जो आर.एस.एस से जुड़ा था । जिसके कहनेपर नाथूराम गोडसे ने गाँधी जी की हत्या की । और जो कांग्रेस पार्टी ज्यादातर हिंदूवादी यानी वर्णवादी इस हिन्दू महासभा से सम्पर्कित नेताओंसे भरीपड़ी थी जिसके कारण जिन्न्हा ने कांग्रेस छोड़ी और पाकिस्तान के वारे में सोचा । सुभाष चंद्र बोस ने कांग्रेस छोड़ी और फॉरवर्ड ब्लॉक् बनाई और आज़ाद हिन्द की कल्पना की । 1947 में देश की आज़ादी के बाद इस कांग्रेस वाले हिन्दूत्त्व नेताओंने देश का नाम “भारत” रखा । देश का नाम हिन्दू महासभा ओरिजिन से “भारत” रखना इस बात का सबूत है की कांग्रेस बस छद्म सेकुलर है । जबकि खुद नेहरू या गांधीजी या तब का समय की कोईभी नेता देश के लिए “भारत” शब्द का इस्तेमाल नहीं किया । प्रमाण के तौर YouTube में आप उन लोगोंकी ओरिजिनल भाषण देख लीजिये । ज्यादातर वह देश का नाम हिन्दुस्तान या इंडिया का इस्तेमाल किया ना की भारत । ये इस बात का सूचक है भारत शब्द इनके बाद ही इस्तेमाल में आया । अगर आया तो इसके पीछे की नीयत क्या है? देश एक, नाम तीन क्यों? अगर किसी का नाम “अमर” है तो कोई भी भाषा में उससे  लिखे वह “अमर” ही रहेगा; लेकिन हमारा देश का नाम अंग्रेजी में इंडिया है लेकिन जब हिंदी में लिखते हैं वह “भारत” बन जाता है जब की भारत एक अलग नाम है । एक अलग नाम के पीछे क्या उद्देश्य हो सकता है आप ढूंढ़ने की कोशिश करो । मेरे हिसाब से इसके पीछे एक ही मक़सद है देश को हिन्दू राष्ट्र यानी वर्ण व्यवस्था  वाली देश बनाना जब की खुद वर्ण व्यवस्था  एक अंधविश्वास है । अंग्रेज इंडिया को वेसेही छोड़कर जाने वाले थे इसलिये सिविल सर्विस ऑफिसर अल्लन ऑक्टेवियन ह्यूम १८८३ में पोलिटिकल मूवमेंट पैदा की और कांग्रेस पार्टी बनाया । यानी देश को पोलिटिकल डोर से चलाने की दौर सुरु हो गया था । १८८५ उमेश चंद्र बोनर्जी कांग्रेस के पहले सभाध्यक्ष थे; पहले सत्र में 72 प्रतिनिधियों ने भाग लिया था, इंडिया के प्रत्येक प्रांत का प्रतिनिधित्व करते हुए प्रतिनिधियों में 54 हिन्दू और दो मुस्लिम शामिल थे; बाकी पारसी और जैन पृष्ठभूमि की थी; जबकि १७५७ की  बैटल ऑफ़ प्लासी के साथ ही फ्रीडम मूवमेंट सुरु हो गया था । १९१५ में गांधीजी ने फ्रीडम मूवमेंट के १५८ साल वाद और कांग्रेस बनने की ३२ साल वाद गोखले के मदद से दक्षिण अफ्रीका से लौटे और कांग्रेस पार्टी में शामिल हुए । १९२४ में वह पार्टी प्रेजिडेंट बनगए । सुभाष चंद्र बोस कांग्रेस के साथ १९२० में जुड़े और गांधीजी की कांग्रेस में प्रभुत्व और धूर्त्त कब्जेवाजी से असंतुष्ट सुभाष चंद्र बोस को कांग्रेस पार्टी से २९ अप्रैल में निष्कासित होना पड़ा; उसके वाद १९३९ जून २२ को वह अपना फॉरवर्ड ब्लॉक बनायी और आजाद हिन्द की स्थापना की; जबकि कांग्रेस पार्टी उसके बाद उनकी साथ क्या किया खुद इन्वेस्टीगेट करना बेहतर होगा । १९१९ में, नेहरू ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में शामिल हुए जब की मुहम्मद अली जिन्ना कांग्रेस का साथ १९०६ से लेकर १९२० तक रहे । गाँधी और नेहरू जोड़ी ऐसे बनि आज तक नेहरू फॅमिली गाँधी का नाम लेके अपनी पोलिटिकल दुकान चला रहा है जब की और भी कितने कांग्रेस लीडर थे उनके नाम इनके जुबान पर कभी नहीं आया । मुहम्मद अली जिन्ना ने कांग्रेस पार्टी में ब्राह्मणवादी यानी हिंदुत्व की पकड़ से नाखुश होकर मुसलमानों की अलग देश के वारे में अगवाई की । जब की पाकिस्तान की सोच मुहम्मद इक़बाल ने की थी इसलिए मुहम्मद इक़बाल को पाकिस्तान का स्पिरिचुअल फादर कहा जाता है; मुहम्मद इक़बाल इंडियन नेशनल कांग्रेस की एक बड़ा क्रिटिक थे और हमेशा कांग्रेस को मनुबादी यानी हिन्दूवादी पोलिटिकल पार्टी मानते थे । वही मुहम्मद इक़बाल जिसने “सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोसिताँ हमारा, हम बुलबुलें हैं इसकी यह गुलसिताँ हमारा” गाना लिखाथा । मुहम्मद इक़बाल के पूर्वज कश्मीर पंडित थे जिन्होंने इस्लाम क़बूली थी । वह ज्यादातर उनके लेख में अपना पूर्वज कश्मीर पंडित थे उसका जिक्र भी किया । जिन्ना के पूर्वज यानी दादाजी गुजराती बनिया थे । उनके दादा प्रेमजीभाई मेघजी ठक्कर थे, वे गुजराती में काठियावाड़ के गोंडल राज्य के पोनली गांव से लोहाना थे । उन्होंने मछली व्यवसाय में अपना भाग्य बना लिया था, लेकिन लोहाना  जाती का मजबूत धार्मिक शाकाहारी विश्वास के कारण उन्हें अपने शाकाहारी लोहना जाति से बहिष्कृत कर दिया गया था । जब उन्होंने अपने मछली कारोबार को बंद कर दिया और अपनी जाति में वापस आने की कोशिश की, तो उन्हें हिंदू धर्म के स्वयंभू संरक्षकों के विशाल अहं के कारण ऐसा करने की अनुमति नहीं थी । परिणामस्वरूप, उनके पुत्र, पुंजालाल ठक्कर/जिन्नाभाई पुंजा (जिन्ना के पिता), इस अपमान से इतना गुस्सा थे कि उन्होंने अपने और उनके चार बेटों के धर्म को बदल दिया और इस्लाम में परिवर्तित हो गए । वैसे देखाजाये तो पाकिस्तान बनने के पीछे कांग्रेस और उसके अंदर बैठे हिन्दूमहासभा की एजेंट्स ही जिम्मेदार थे । तो अब आपको पता चलगया होगा गांधीजीके हत्या में कौन शामिल हो सकता है? क्योंकि हिंदूवादी अगर पाकिस्तान नहीं चाहते थे तो जिन्ना को मार सकते थे गाँधी को मारने के पीछे जो तर्क वह देते हैं वह दरअसल भ्रम हैं । अगर गांधीजी को मार सकते थे तो जो पाकिस्तान के वारे में जो सोचा उसको क्यों नहीं मारा? इसका मतलब हिंदूवादी संगठन और कांग्रेस चाहता था की पाकिस्तान बने; तो ये ड्रामा क्यों किया? ये ड्रामा बस सो कॉल्ड सेकुलर वर्णवादी हिन्दू राष्ट्र बनाना था जो नेहरूने सोचा ताकि हिन्दू और मुसलमानोंकी वोट बटोर सके; ये इसीलिए किया नेहरू विरोधी मुसलमानोंको रवाना की जाये और जो उनके साथ हैं उनके साथ राज किया जाये क्योंकि उनके पास गांधी जैसे कुटिल राजनीतिज्ञ थे । गांधी जी के कुटिल दिमाग के कारण नेहरू देश का प्रधान मंत्री बन गए । देश स्वाधीन १९४७ अगस्त १५ क़ो हुआ और नेहरु देश की कमान सँभालने का वाद ३० जानुअरी १९४८ क़ो गांधी जी की हत्या हो गयी । कांग्रेस में हिंदूवादी एजेंटोने जब देखा सम्पूर्ण हिन्दू राष्ट्र बनाना मुश्किल है तो अखिल भारतीय हिन्दू महासभा की प्रेजिडेंट श्यामा प्रसाद मुख़र्जी नेहरू के साथ सम्बन्ध बिगड़े और असंतुस्ट होने के बाद, मुखर्जी ने इंडियन नेशनल कांग्रेस छोड़ दी और 1951 में भारतीय जनसंघ की स्थापना की जो की अबकी भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के पूर्ववर्ती पोलिटिकल पार्टी है । जिसका एजेंडा वर्ण वादी हिन्दू राष्ट्र बनाना है । इसका मतलब ब्राह्मणवादी देश और न्याय व्यवस्था को चलाएंगे, क्षत्रियवादी देश की आर्मी यानी सुरक्षा को संभालेंगे, देश की इकोनॉमी को वैश्यवादी चलायेंगे और जितने अन्य यानी वैदकी प्रमाण पत्र के हिसाब से शूद्र और अतिशूद्र यानी आउट कास्ट हैं उनके लिए  काम करेंगे । भारत शब्द ही उनकी पूर्व प्रेजिडेंट सावरकर की संगठन की साथ सम्बंधित थी । आर.एस.एस और अखिल भारतीय हिन्दू महासभा ही भारत से जुडी श्लोगान इस्तेमाल करते हैं । उनकी पॉलिटकल पार्टी का नाम भी भारतीय जनता पार्टी है; जब की इस भूखंड में इस पहचान का कोई विस्तार रिस्ता नहीं है । हेडगेवार ने 1925 में नागपुर में आर.एस.एस की स्थापना की थी जो 1920 के दशक में सक्रिय रूप से इंडियन नेशनल कांग्रेस में भाग लिया था और नागपुर के हिंदू महासभा के एक बलिष्ठ राजनेता थे । अब आर.एस.एस की 56,859 से भी ज्यादा शाखाएं है और इनके मेंबर 60 लाख से भी ज्यादा हैं । इनके मेंबर्स अब इंडियान गवर्नमेंट की हर शाखा में मिल जायेंगे । इनका एग्जीक्यूटिव, लेजिस्लेटिव और जुडिशरी में हर जगा अपना मेंबर को बिठाये रखा है यानी  आर.एस.एस एक तरह की प्रॉक्सी प्राइवेट गवर्नमेंट चला रहा है । और एक केस में हम ये मान सकते है भारत पहचान “रामायण” से ली गयी होगी, क्यों की रामजी के भाई के नाम भरत था तो उनके नाम से भारत भी हो सकता है क्यों की ये लोग राम नाम अपनी पोलिटिकल पार्टी के प्रचार और प्रसार के लिए ऐसे इस्तेमाल करते आ रहे हैं जैसे राम की नाम की कॉपी राइट बस इनके पास ही है।

रामायण को लिखा किसने? एक डाकू ने, जिसका नाम रत्नाकर है । वैदिक प्रचारक वालों की बनाई गई कहानी ऐसी है की एक डाकू ने ऋषि नारद के संपर्क में आकर अच्छे बननेकी कोशिश की और तपस्या किया; और तपस्या करते करते उसके शरीर में बालुका से पहाड़ बनगया जिसको वल्मीक कहते है यानी वाइट अंट हिल बनगई इसलिए उनकी नाम डाकू रत्नाकर से ऋषि वाल्मीकि बनगयी । वाल्मीकि ने रामायण की रचना की जो की सदियों एक लोकप्रिय गाथा रहा । पहली बात है की रामायण रचना करने वाले वाल्मीकि को वैदिक वाले नीच जात यानी अछूत मानते हैं इसलिये वाल्मीक मंदिर में ये पूजा नहीं करते । लेकिन उनकी लिखीगयी रचना रामायण वैदिक वाले अपने धर्म की प्रचार और प्रसार के लिए ऐसे इस्तेमाल करते हैं जैसे उनकी पूर्वजने लिखी हो । वैदिक प्रचारक और प्रसारक मीठी झूठ और भ्रम पैदा करने में उनको महारत हासिल है । इनलोगोंनें रामायण की असली रचयिता का साथ भी यही की होगी । हो या ना हो रामायण रचना करनेवाला का नाम रत्नाकर ही होगा वह संस्कृत भाषी सभ्यता से संबंधित थे या उनकी कहानी को संस्कृत भाषा की चोला अपने ही सोच को प्रचार और प्रसार के लिए  इस्तेमाल किया वह खुद अनुमान लगालो; क्यों की राम के वारे में आपको कोई भी वेद में नहीं मिलेंगे ।

अब आते हैं रामायण की बिषय वस्तु के ऊपर । रामायण एक अच्छी रचना है लेकिन ये बस एक कहानी ही है क्योंकि इनमें जो किरदार हैं जैसे हनुमान यानी बन्दर सर वाला मानव जो की बायोलॉजिकल असंभव है । हनुमान दो शब्द के सयोंग से बना हुआ है एक हनु मतलब बन्दर और मान जो की “मानव” शब्द से ली गयी है ।  वैसे ही आपको जम्बूवान, जटायु,  अंगद, वाली, सुग्रीव, सम्पति इत्यादि बायोलॉजिकल असंभव किरदार मिलजाएँगे जो ये साबित करता है की इनके बिना रामायण असंभव है । अगर ये किरदार ही असंभव है तो रामायण भी असंभव है; यानी रामायण एक मन गढन कहानी ही है । रामजी की पास बानर सेना थी यानी बन्दरों की सेना जिसने रावण की राक्षस यानी जंगली इंसानी सेना के साथ लड़ाई की और जित गया । कभी बन्दर एक इंसान के आगे टिक पायेगा? ये मजाक नहीं तो क्या है? बंदोरोने 130KM यानी  (ten yojana) ब्रिज  केवल पांच दिन में बना डाला जिसको रामसेतु कहा जाता है; क्या असलियत में ये संभब है? जबकि असलियत में अभी भी सारि तकनीक इस्तेमाल करके भी इंसान १३० किलोमीटर की बाँध ५ दिन में बना नहीं सकता तो बंदरों ने कैसा बना दिया? क्या कोई मानव का दस सर हो सकते हैं? तो कैसा रावण का दस सर था? जब वह पैदा हुए होंगे तब क्या दस सर की बच्चा कोई माँ पैदा कर सकता है? दस सर वाला इंसान क्या बायोलॉजिकल संभब है? दशरथ अगर नपुंसक थे तो उनकी चार बेटे किसका है? अगर नियोग से पैदा हुए हैं तो दशरथ के बच्चे कैसे हुए? राम और लक्ष्मण सरयू नदी में जलसमाधि ली थी यानी सुसाइड किया था; क्या एक भगवान को ये शोभा देता है? राम जी सीता के याद में जेनन जाते थे जेनन यानी राजाओं की वेश्यालय जहाँ शराब और नाच गाने हुआ करते थे; क्या ये एक मर्यादा पुरुषोत्तम को शोभा देता है? अगर सीता चाहती रावण के साथ प्रेम का ढोंग करके छल से जेहेर देके मार देती और राम को इतना नौटंकी करना ही नहीं पड़ता । अगर राम धोके से बाली को मार सकते हैं तो ये जहर वाली बात हनुमान को बोल देते, और वह सीता को, और बिना यूद्ध के रामायण ख़तम । क्या बस मर्द औरत का सुरक्षा का ठेका ली हुई है; खुद की जिंदगी को बचाना औरत की जिम्मेदारी नहीं? ये कैसे मर्यादा पुरुषोत्तम है जिनकी कोई मर्यादा ही नहीं है? राम जी ने अपनी वाइफ के लिए अनेक निर्दोष सैनिकों की बीबीओंको विधवा बना डाला, ये कितना तर्क संगत है? अपने बीबी के चाह में दूसारे के बीबीओंको विधवा बनाना कौनसी भगवान वाला काम है? तब तो सती प्रथा रही होगी और विचारे बिना कारण के अपने मर्द की चिता पर जले होंगे । अगर हनुमान पहाड़ उठा सकता है बाँध बनाने की क्या जरूरत थी? उसी पहाड़ में सबको बैठा के श्रीलंका क्यों नहीं ले गए? अभी राम की भक्त की मेसेज एक मिनिट से भी कम समय में श्रीलंका पहुंच जाता है; हनुमान भगवान होते हुए भी रामजी की मेसेज देने में इतना दिन क्यों लगा? क्या राम, लक्ष्मण और सीता बिना बिजली के जंगल में घनी अंधेरा में रात काटी नहीं होंगी? क्या जंगल की खुले मैदान और झाडिओं के पीछे उनको शौच करना पड़ा नहीं होगा? अगर उनकी जंगल की जिंदगी उनकी अनुगामियों से भी बहुत बदतर थी तो राम की सामूहिक उन्माद(Mass Hysteria) पैदा करके उस को जो फैला रहे हैं क्या वह सामाजिक लोग है या असामाजिक, या अपराधी? अगर आप ऐसे तार्किक प्रश्न पूछते चलोगे तो आप क़ो ये पता चल जायेगा की रामायण बस एक कहानी ही है । कहानी के अनुसार समय के साथ उनकी भक्तोने कुछ जगह को उनके नाम पे करके उसके सही होने की दावा कर रहे हैं जो की एक मानसिक विकृति ही । ये सब झूठ और अंध विश्वास को धर्म, आस्था और भक्ति का चोला पहना के क्या अनुयायीओंका ब्रेन रेप किया नहीं जा रहा है? अगर राम अयोध्या की राजा थे तो दूसारे राजाओंके सभ्यता से क्या संबध हैं? अयोध्या तो अब की इंडिया नहीं था? अयोध्या एक छोटा सा राज्य था जो की उनके अनुगामी के हिसाब से अब उत्तर प्रदेश में है । वह सारि उत्तर प्रदेश भी नहीं था । अगर राम इस भूखंड में पैदा हुए तो उनकी माँ बोली इस भूखंड में जो बोली बोला जाता है वही होंगी; तो दूसरी भाषी लोगोंके साथ इनका कनेक्सन क्या है? क्या बन्दर सेना उनकी भाषा में बात करना जानते थे? क्या राम, लक्ष्मण, सीता, हनुमान इत्यादि श्रीलंकान भाषा जानते थे? भारत अगर राम जी की भाई भरत के नामसे आया है तो पूरी अयोध्या तो आज की इंडिया नहीं थी तो राम राज्य बनाने का नारा कितना सही है? इससे पता चल गया होगा राम की नाम पे राजनिति और आस्था की दुकान चलाने वाले ना केवल अंधविश्वासी, मुर्ख, बिकृत दिमाग की है बल्कि असामाजिक भी है क्यों की राम की नाम पे ये दंगा किये और इंसानों की हत्या की और सार्वजनिक और निजी संपत्ति का नुक्सान भी किया ।

अब आते हैं देश का नाम इंडिया कैसे हुआ? 5th सेंचुरी BC से भी पहले इयुरोपियन्स हमारे भूखंड को इंडोस(indos), इंडस(Indus), इंडीज(indies) इत्यादि के नामसे जाना करते थे । जो की आज की पाकिस्तान में बहते हुए नदी यानी सिंधु नदी से प्रेरित है । इंडिया का नाम पुरानी अंग्रेजी भाषा में जाना जाता था और इसका इस्तेमाल पॉल अल्फ्रेड के पॉलस ओरोसियस में भी इस्तेमाल किया गया था । मध्य अंग्रेजी में, फ्रांसीसी नाम प्रभाव के तहत, येंडे या इंडे द्वारा प्रतिस्थापित किया गया था, जिसने प्रारंभिक आधुनिक अंग्रेजी में इंडी के रूप में प्रवेश किया था । सायद लैटिन, या स्पेनिश या पुर्तगाली के प्रभाव के कारण 17 वीं शताब्दी के बाद से इंडिया अंग्रेजी उपयोग में आया । अंग्रेज उनके दिये गए इस भूखंड पहचान की नाम इस्तेमाल किया और हमारा देश का नाम इंडिया हो गया ।

अब आते हैं “हिंदी” शब्द को डिकोड करने के लिए । मौजूदा हालत में हिंदी का मतलब एक भाषा जो इंडिया भूखंड की बहु भाषी लोकप्रिय भाषा है । २००१ की सेंसस की हिसाब से इंडियन आबादी के 53.6% ने घोषित किया कि वे पहली या दूसरी भाषा के रूप में हिंदी बोलते हैं, जिनमें से 41% ने इसे अपनी मूल भाषा या मातृभाषा के रूप में घोषित किया है । जब इसको लिखा जाता है उसके नाम हिंदी नहीं देवनागरी स्क्रिप्ट हो जाता है । एक भाषा की फिर दूसरी नाम? यानी हिंदी को देवनागरी भी बोलते हैं!  हिंदी या हिन्दू शब्द 1300AD से पहले कोई भी धार्मिक रचना या लेख में नहीं मिलेगा । अभी भी आप कोई भी वेद, पुराण या बौद्धिक या जैन और कोई भी स्क्रिप्ट में हिन्दू शब्द नहीं मिलेगा; न यहाँ की मूल निवासी का नाम हिन्दू था ना उनके भगवान हिन्दू । तरह तरह की सोर्स ये बता तें है की हिंदी या हिन्दू शब्द सिंधु नदीसे आया है जो अब ज्यादातर देश विभाजन के बाद पाकिस्तान में ही बहता है । वैदिक वाले ताल ठोक के बोलते है क्यों के सिंधु नदी के वारे में वेद में लिखी हुई है उसका कॉपी राइट हमारा है । दरअसल सिंधु  एक नाम नहीं इसका मतलब ही नदी है जो की समय के साथ नदीके सर्बनाम के तहत इस्तेमाल हुआ । वेद में अग्नि, सूरज, चाँद, हवा के वारे में भी लिखा है तो क्या ये सब के ऊपर उनकी ही कॉपी राइट है? ये नदी क्या वेद रचना होने से पहले वहा नहीं बहती होगी? कोई शब्द का कोई रचना में इस्तेमाल ये साबित नहीं करता उसके ऊपर उनकी कॉपी राइट है । सिंधु नदीके किनारे बसने वाले लोग ही सिंधु सभ्यता कहलाता था और उनकी इस्तेमाल की गयी भाषा को सिंधी कहते है न की हिंदी । देश विभाजन के बाद अब ये पाकिस्तान में सिंध प्रोविंस के नाम से जाना जाता है जिसके मूल निवासी ज्यादातर इस्लाम को कनवर्ट हो गये हैं; जो कुछ इंडिया में रहते हैं वह वैदिक धर्म की अनुगामी हैं यानि ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र में बटें हुए हैं । आप खुद इन दोनों की भाषाओं के अंतर जान सकते है बस YouTube इस्तेमाल कीजिए और बस Search में उनकी Documentary या गाना मारके खुद निरीक्षण करलीजिये उन में कितना डिफ्रेंस है । आपको ये पता चल जायेगा सिंधी और हिंदी एक नहीं है; यानी ये साबित हो गया सिंधी, हिंदी नहीं है । अगर सिंधी हिंदी होता तो सिंधी भाषा को हिंदी कहा जाता ना कि सिंधी । सिंधीवाले भी संस्कृत में नहीं बोलते यानी उनकी मातृभाषा संस्कृत नहीं है इसका मतलब ये है की वे संस्कृत भाषी सभ्यता से अलग है । सभी वेद और हिन्दू के सब भगवान बस संस्कृत ही समझते हैं; इसका मतलब ये हुआ संस्कृत बोलनेवाले लोग सिंधी नहीं है, अगर होते सब भगवान सिंधी भाषा में समझते, यानि उनको सुनानेवाला सब मंत्र सब सिंधी में होता ना कि संस्कृत में । कहने का मतलब ये है संस्कृत भाषी यानी वैदिक सभ्यता सिंधु सभ्यता नहीं है । वैदिक सभ्यता की हर चीज संस्कृत में रचना की गयी है और अलग भाषी सभ्यता उसकी अपनी भाषा में अनुवाद ही पढ़ते हैं । सिंधु नदी सदियों उस भूखंड में बहता होगा इसका मतलब ये नहीं की कन्या कुमारी, आंध्र, बंगाल, मराठा, ओडिशा इत्यादि इत्यादि भूखंड तब नहीं था । अगर भूखंड था तो उसमें बसने वाले लोग भी होंगे; क्यों की इस भूखंड में बसने वाले लोग सिंधी या संस्कृत नहीं बोलते, इसीलिए इस दो सभ्यता के साथ इन गैर-संस्कृत और गैर-सिंधी भाषीय सभ्यता की कोई संपर्क नहीं है, सीबाये पडोसी भाषीय सभ्यता के । तो ये नाम हिंदी या हिन्दू कैसे इन लोगों के ऊपर थोपा गया? दरअसल इस भूखंड के राजाओं एक दूसारे के साथ लड़ के अपना राज्य की सीमा बढ़ा के खुद को महाराजा कहलवाना पसंद करते थे । सबसे बड़ा अखंड राज्य इस भूखंड में चन्द्रगुप्त मौर्य और उनकी बंसज अशोक ने बनाया जो आज की इंडिया से भी ज्यादा बड़ा था । ज्यादातर राजाओं अपना अपनाई गयी धर्म को उसकी राज्य में फैलाते थे, ताकि एक सोच वाली नागरिकों  से मत भेद कम हो और राज्य में शांति बनाया रहे । क्यों की इस भूखंड में तरह तरह की भाषीय सभ्यता थे उनके जीवन सैली भी अलग अलग थे । यहां कई बुद्धिजीवी और महापुरुष पैदा हुए और उनके बनाई गयी दर्शन भी अलग अलग थी । उनके दर्शन या धर्म भी एक दूसारे की विरोधी थे । जिस राजा ने जिस धर्म अपनाया उस धर्म को उनकी प्रजा पर थोपा । कुछ राजा धर्म और दर्शन की आजादी भी दी और कुछ प्रचारक और प्रसारक विरोधी धर्म को विनाश और अपभ्रंश भी किया । इस भूखंड में दो तरह की दर्शन और उससे बनी धर्म बने एक तर्कसंगत(Rational) और दूसरा तर्कहीन(Irrational); आजीवक, चारुवाक/लोकायत, योग, बौद्ध, जैन और आलेख इत्यादि बिना भगवान और बिना मूर्ति पूजा की तर्कयुक्त धर्म और दूसरा बहुदेबबाद, मूर्ति पूजन, अंधविश्वास, तर्कविहीन, हिंसा, छल कपट और भेदभाव फैलाने वाला वैदिक जैसे धर्म । वैदिक धर्म को सनातन और हिन्दू धर्म भी कहा जाता है, जो वैदिक वर्ण व्यवस्था के ऊपर आधारित है ।

जिस राजा को जो धर्म पसंद आया वह उस को अपनाया और उसकी प्रचार और प्रसार उसकी राज्य में की । सबसे बड़ा अखंड राज्य अशोक ने बनाया जिसको इतिहास मौर्य साम्राज्य के नाम से प्रतिपादित करता है । अशोक ने बौद्ध धर्म की संस्पर्श में आकर बौद्ध धर्म अपना लिया, और उनकी राज्य में बौद्ध धर्म की खूब प्रचार और प्रसार की, जब की उनकी पूर्वज आजीविका और लोकायत जैसे धर्म और दर्शन की अनुगामी थे । क्यों की उनहोंने पाया बौद्ध धर्म ही उनकी राज्य और प्रजा के लिए  सही दर्शन और धर्म है । उनहोंने पाया बुद्ध ना खुद को भगवान माना ना कोई भगवान की प्रचार और प्रसार की । उनकी दर्शन करुणा, सेवा, अहिंसा, सत्य और तर्क की दर्शन पर आधारित थी ।  बुद्ध ने बहुदेबबाद और मूर्ति पूजन को नाकारा लेकिन आस्था उनकी सत्य और तर्क के ऊपर ही था । सिद्धार्था गौतम ने अपने आप को कभी भगवान की दर्जा नहीं दी ना कभी भगवान की आस्था को माना । ना वह खुद को भगवान की दूत बोला ना उनकी संतान; अगर वह भगवान की आस्था को मानते तो भगवान की वारे में उनकी विचारों में छाप होता । ना उनकी दिखाई गयी मार्ग में भगवान की जिक्र है ना उनकी कोई दर्शन में । इसलिए सिद्धार्था गौतम आज के वैज्ञानिक सोच वाले इंसान थे जिनका सोच ये था तार्किक बनो, सत्य की खोज करो, उसकी निरीक्षण और विश्लेषण करो उसके बाद अपनी तार्किक आधार पर सत्य की पुष्टि करो । आंख बंद करके अपने पूर्वज की पीढ़ी दर पीढ़ी अपनाया गया अंध विश्वास की चपेट मत फंसो; ना अंध विश्वास को यूँही स्वीकार कर लो क्यों की आपसे बड़े, गुरु और बुजुर्ग इसको मानते हैं; अपने खुद की दिमाग की विकास करो और बुद्धि की हक़दार बनो जिसके आधार पर आप उनकी अंध विश्वास को दूर कर सको । उनकी आस्था सत्य और तर्कसंगतता के ऊपर थी, उनकी आस्था मानवता, करुणा, प्रेम, अहिंसा और सेवा के ऊपर थी । सिद्धार्था गौतम की मृत्यु के बाद उनके दर्शन से छेड़ छाड़ किया गया; क्योंकि सिद्धार्था गौतम बहुदेब बाद और मूर्ति पूजा की विरोधी थे ये संगठित पुजारीबाद का पेट में लात मारता था । इसलिये सिद्धार्था गौतम की मृत्यु की बाद उनकी सिद्धान्तों की अनुगामी पुजारीबाद की षडयंत्र की शिकार बना और बुद्धिजीम “हिन जन” यानी “नीच लोग” / “नीच बुद्धि” और “महा जन” यानी “ऊँचे लोग” / “उच्च बुद्धि” में तोड़ा गया; हाला की बाद में इसको अलंकृत भाषा में हीनयान और महायान शब्द का इस्तेमाल किया गया । सिद्धार्था गौतम जी के निर्वाण के मात्र 100 वर्ष बाद ही बौद्धों में मतभेद उभरकर सामने आने लगे थे । वैशाली में सम्पन्न द्वितीय बौद्ध संगीति में थेर भिक्षुओं ने मतभेद रखने वाले भिक्षुओं को संघ से बाहर निकाल दिया । अलग हुए इन भिक्षुओं ने उसी समय अपना अलग संघ बनाकर स्वयं को ‘महासांघिक’ और जिन्होंने निकाला था उन्हें ‘हीनसांघिक’ नाम दिया जिसने समय के साथ  में महायान और हीनयान का रूप धारण कर लीया । इस तरह  बौद्ध धर्म की दो शाखाएं बनगए, हीनयान निम्न वर्ग(गरीबी) और महायान उच्च वर्ग (अमीरी), हीनयान एक व्यक्त वादी धर्म था इसका शाब्दिक अर्थ है निम्न मार्ग । हीनयान संप्रदाय के लोग परिवर्तन अथवा सुधार के विरोधी थे । यह बौद्ध धर्म के प्राचीन आदर्शों का ज्यों त्यों बनाए रखना चाहते थे । हीनयान संप्रदाय के सभी ग्रंथ पाली भाषा मे लिखे गए हैं । हीनयान बुद्ध जी की पूजा भगवान के रूप मे न करके बुद्ध जी को केवल बुद्धिजीवी, महापुरुष मानते थे । हीनयान ही सिद्धार्था गौतम जी की असली शिक्षा थी । राजा अशोक ने हीनयान ही अपने राज्य में फैलाया था । मौर्य साम्राज्य बुद्धिजीम को ना केवल आपने राज्य में सिमित रखा उस को पडोसी राज्य में भी फैलाया । जहाँ जहाँ तब का समय में बौद्ध धर्म फैला, बुद्ध की प्रतिमा को बस आदर्श और प्रेरणा माना गया ना कि भगवान की मूर्ति  इसलिये आपको आज भी पहाडों में खोदित बड़े बड़े बुद्ध की मूर्त्तियां देश, बिदेस में मिलजाएँगे । ये मूर्त्तियां प्रेरणा के उत्स थे ना कि भगवान की पहचान । वैदिक वाले  उनको विष्णु का अवतार बना के अपने मुर्तिबाद के छतरी के नीचे लाया और उनको भगवान बना के उनकी ब्योपारीकरण भी कर दिया । बुद्धिजीम असलियत में संगठित पुजारीवाद यानी ब्राह्मणवाद के शिकार होकर अपभ्रंश होता चला गया । हीनयान वाले मुर्तिको “बुद्धि” यानी “तर्क संगत सत्य ज्ञान” की प्रेरणा मानते हुए मुर्ति के सामने मेडिटेसन यानी चित्त को स्थिर करने का अभ्यास करते हैं जब की ज्यादातर महायान वाले उनकी मूर्ति को भगवान मान के वैदिकों के जैसा पूजा करते हैं । महायान की ज्यादातर स्क्रिप्ट संस्कृत में लिखागया है यानी ये इस बात का सबूत है बुद्धिजीम की वैदिक करण की कोशिश की गयी । उसमे पुनः जन्म, अवतार जैसे कांसेप्ट मिलाये गए और असली बुद्धिजीम को अपभ्रंस किया गया । जो भगवान को ही नहीं मानता वह अवतार को क्यों मानेगा? अगर अवतार में विश्वास नहीं तो वह क्यों पुनर्जन्म में विश्वास करेगा? महायान सिद्धार्था गौतम जी की यानी बुद्ध की विचार विरोधी आस्था है जिसको अपभ्रंश किया गया; बाद में ये दो सखाओंसे अनेक बुद्धिजीम की साखायें बन गए और अब तरह तरह की बुद्धिजीम देखने को मिलते हैं जिसमें तंत्रयान एक है । तंत्रयान बाद में वज्रयान और सहजयान में विभाजित हुआ । जहां जहां बुद्धिजीम फैला था समय के साथ तरह तरह की सेक्ट बने जैसे तिबततियन बुद्धिजीम, जेन बुद्धिजीम इत्यादि इत्यादि । हीनयान संप्रदाय श्रीलंका, बर्मा, जावा आदि देशों मे फैला हुआ है । बाद में यह संप्रदाय दो भागों मे विभाजित हो गया- वैभाष्क एवं सौत्रान्तिक । बुद्ध ने अपने ज्ञान दिया था ना कि उनकी ज्ञान की बाजार । अगर आपको उनकी दर्शन अच्छे लगें आप उनकी सिद्धान्तों का अनुगामी बने ना की उनके नाम पे बना संगठित पहचान की और उनके उपासना पद्धत्तियोंकी । वैदिक वाले बुद्ध जन्म भूमि की भी जालसाज़ी की, क्योंकि आज तक ब्राह्मणवादी ताकतों ने देश की सत्ता संभाली और बुद्ध की जन्म भूमि की जालसाज़ी में वह कभी प्रतिरोध नहीं किया ना उसकी संशोधन; बुद्ध इंडिया के रहने वाले थे लेकिन एक जालसाज़ जर्मनी आर्किओलॉजिस्ट अलोइस आनटन फुहरेर बुद्ध की जन्म भूमि नेपाल में है बोल के झूठी प्रमाण देकर इसको आज तक सच के नाम-से फैला दिया ।  खुद आर्किओलॉजिस्ट अलोइस आनटन फुहरेर माना वह झूठा थे फिर भी आज तक बुद्ध की जन्म भूमि नेपाल ही बना रहा । बुद्ध ने अपनी ज्ञान पाली भाषा में दिया । पाली भाषा का सभ्यता कौन सा है उस को भी अपभ्रंश किया गया । अगर नेपाल में कोई पाली भाषा नहीं बोलता तो सिद्धार्था गौतम कैसे नेपाल में पैदा हो गये? नेपाल में ज्यादातर खासकुरा/गोर्खाली भाषा की सभ्यता रही तो पाली सभ्यता की सोच पूरा बेमानी है, और ये बात प्रत्यक्ष इसको झूठ साबित करता है । राजा अशोक ने कलिंग युद्ध के बाद ही बौद्ध धर्म अपनाया ये इस बात का सूचक है जरूर उस समय राजा अशोक ने उड़ीसा की बौद्ध धर्म से प्रभावित रहे होंगे । उड़ीसा जिसको तब के समय में ओड्र, कलिंग, उक्कल, उत्कल इत्यादि भूखंड के नाम से जाना जाता था उनके बोलने वाले पूर्वज ही पाली बोलने वाली सभ्यता थी । अब अगर आप ओड़िआ भाषा की पालि के साथ मैच करोगे ५०% भी ज्यादा शब्द बिना अपभ्रंश के सही अर्थ के साथ मिल जायेंगे । उड़ीसा का कपिलेश्वर ही कपिलवस्तु है जो की अपभ्रंश होकर कपिलेश्वर हो गया है जब की नेपाल में कपिलवस्तु बोल के कोई स्थान ही नहीं था । जिस को आर्किओलॉजिस्ट अलोइस आनटन फुहरेर ने लुम्बिनी का नाम  दिया, असल में उसका नाम कभी लुम्बिनी ही नहीं था उसका नाम रुम्मिनदेई(Rummindei) था जिसे जबरदस्ती आर्किओलॉजिस्ट अलोइस आनटन फुहरेर अपना खोज को सही प्रमाण करने के लिए उस जगह की नाम भी बदल डाला और झूठी असोका पिलर और प्लेट वाली साजिश की । ये सब साजिश के पीछे कौन होगा आप खुद ही समझ लो । राजा अशोक ने बौद्ध धर्म सोच समझ कर ही अपना विशाल भूखंड में फैलाया था; नहीं तो वह वैदिक धर्म का प्रचार और प्रसार किया होता; इसलिए उनके राज में आप को कोई भी उनके द्वारा बनाये गए वैदिक भगवान की  मंदिर नहीं मिलेंगे जबकि ब्राह्मणो के द्वारा बौद्ध धर्म की विनाश के वाद बौद्ध मंदिरों को सब वैदक मंदिर में कनवर्ट किया गया है । वैदिक वाले बोलते हैं मुसलमान राजाओंने बौद्ध सम्पदा को नस्ट किया; तो, पूरी, तिरुपति, कोणार्क, लिंगराज इत्यादि इत्यादि मंदिरों को क्या मुसलमान राजाओंने बौद्ध मंदिर से वैदकी बनाया? इंडियन भूखंड में मुसलमान राजाओंने जितना बौद्ध सम्पदा को नस्ट नहीं की उससे ज्यादा संगठित पुजारीवाद बनाम ब्राह्मणवाद ने किया ।

3000 साल पहले हमारे ज्यादातर/सब पूर्वज गैर-धार्मिक ही होंगे । राजा अशोक की राज में 263BC के बाद इस भूखंड का प्रमुख यानी राष्ट्र धर्म बौद्ध धर्म था; यानी हमारे ज्यादातर पूर्वज इस अवधी में बौद्ध धर्म की अनुगामी थे । जब बेईमान, विश्वासघाती, गद्दार, कुटिल मौर्य साम्राज्य के ब्राह्मण सेना प्रमुख पुष्यामित्र शुंग ने मौर्य साम्राज्य पर 185BC में छल और बल से कब्जा कर लिया, जो आखिरी शासक ब्रह्द्रथ को धोखे से हत्या किया था, उसने ना केवल बौद्ध धर्म को नष्ट कर दिया बल्कि कई बौद्ध भिक्षुओं की नर संहार कर दी थी । विश्व का पहला आतंकवादी पुष्यामित्र शुंग ही था क्योंकि उसने, लड़ाई नहीं, धोकेसे जब मौर्य की राजा अपना सेना की निरीक्षण कर रहे थे इस धोखेबाज सेनाध्यक्ष ने पीछे से राजा की हत्या की और सेना की दम पर साम्राज्य हतिया लिया; वह ना केवल बौद्ध धर्म की ख़ात्मा किया बल्कि तलवार की धार पर छल और बल, साम दाम दंड भेद के तहत वैदिक धर्म की स्थापना की ।  पुष्यामित्र शुंग ने ही  बौद्ध साम्राज्य में वेदीजिम यानी जाति आधारित सामाजिक प्रणाली को लागू किया था। 185BC के बाद संगठित पुजारीबाद ब्राह्मणवाद के रूप में उभरा और ये पुजारीबाद ने छल और बल, साम दाम दंड भेद के तहत वैदिक धर्म की प्रचार और प्रसार करके वैदिक धर्म को इस भूखंड का सबसे बड़ा बहुसंख्यबाद बनाया । ठीक पुष्यमित्र शुंग के जैसे बंगाल भाषीय सभ्यता के गौड़ राज्य की प्रतिष्ठाता राजा शशांक ने  (590 AD-625 AD) बाकि बचा बुद्धिजीम के साथ किया था । जैसे कोई पोलिटिकल पार्टी देश के किसी कोने में बनता है और उसके लीडर, प्रचारक और उसका वोटर हर प्रान्त में मिल जाते हैं ठीक वैसे ही ब्राह्मण बाद फैला, राजा क्षत्रिय बना, पुजारी ब्राह्मण बना, बनिया वैश्य बना और बाकी अन्य वृत्ति करने वाले लोग गुलाम यानी शूद्र बनादिये गए; अगर ऐसा नहीं होता तो हर ब्राह्मण, क्षत्रिय , वैश्य और शूद्र का सरनेम उनके एक पूर्वज की सरनेम की तरह एक ही होता अलग अलग नहीं जो प्रदेश बदलते ही उनकी मातृ भाषा के साथ साथ तरह तरह के सरनेम से बदल जाता है । यह बात न भूलें हर भाषीय सभ्यता में वैदिक पुरुष सूक्त यानी वर्ण व्यवस्था के कारण अपने ही लोग बंट गए और एक दूसारे की दुश्मन बनेहुए हैं । मानो एक परिवार के चार बेटे थे और उनके मानसिक और शारीरिक क्षमताओं अलग थी । एक चालक था, दूसरा बाहुबली था, तीसरी ब्योपारी दिमाग का था और चौथा बस परिश्रमी लेकिन थोड़ी बुद्धि में कमजोर । तीन भाइयोंने अपने स्वार्थ के लिए चौथे भाई को अपने गुलाम बनाया और मरते दम तक इसलिये उस को ये मौका नहीं दिया ताकि वह उनके जैसे बन गया तो उन के लिए काम कौन करेगा? भाईओंके बच्चे बने; कमजोर भाई का बच्चे भी उनलोगोंसे ज्यादा अकल्मन्द और क़ाबिल बने लेकिन तीन भाईओंने अपनी ही सुनी चालक भाई का बच्चे चाहे न चालक हो, बाहुबली का बच्चे चाहे बाहुबली न हो या ब्योपारी दिमागी भाई का बच्चे भले दिमागी ना हो, क्योंकि वह सब चालक, बाहुबली और ब्योपारी दिमागी भाई का बच्चे हैं उनको चालक, बाहुबली और ब्योपारी दिमागी मानना पड़ेगा ये वर्ण व्यवस्था उनके ऊपर थोप दिया । अगर जातीबाद संस्कृत भाषी सोच में पैदा हुआ तो दूसारे भाषी सभ्यता का साथ उसका सबंध क्या है? ब्राह्मणबाद फैलाने में अपने भाषी क़ाबिले के धूर्त पूर्वज ही जिम्मेदार हैं । ब्राह्मणबाद सोच इंडियामें वैदिक धूर्त्तों ने पैदा किए लेकिन फैलने वाले अपने ही स्वजाति भाषी धूर्त, दबंग और बेईमान पूर्वज ही थे । अपने ही भाषा बोलने वाले स्वजाती के पुजारिओं ने अपने और संगठित स्वार्थ के लिए वेद के गुलाम बने और बेद दर्शन की आधार पर अपने ही लोगों को बाँटा उनमे फुट डाली और गुलाम बनाया । आप लोग इन वैदिक धूर्तोंकी फैलाई हुई झूठ की चपेट में मत आना, कोई सुर असुर नहीं, कोई देव दानव नहीं, कोई आर्य जैसे दौड़(Race) नहीं ये सब इनकी फैलाई गई झूठ और भ्रम है, जो सदियों लोगों को भ्रम में डाले हुए हैं । ये अगर आर्य हैं तो जिन भाषीय सभ्यता मैं क्षत्रिय कहलाती हैं वह कहाँ से आये थे और कौन सी रेस से सम्बंधित हैं? हर भाषीय सभ्यता मैं वैश्य मिलते हैं वह कहां से आये हैं? और तो और जिन को ये शूद्र कहते हैं जिनका सर नेम और मातृ भाषा भूभाग बदलते ही बदल जातें वह कहां से आये हैं? आप ये बात याद रखना इन धूर्त्तों की झूठ, झाँसा और धोखा की कोई सीमा नहीं होती; भोलेभाले लोगों को कुछ भी बोल के उनकी ध्रुवीकरण करने मैं उनको महारत हासिल है; ये धूर्त अपने ही जात की लोगों को ही नहीं छोड़ते तो वैदिक सर्टिफाएड शूद्र को पूछता कौन है? इसलिए इनके अनुयायि भगवान के नाम पे कुछ भी बोलो, बिना सोचे समझे करने को तैयार हो जाते हैं; इसलिए ये लोग पशु की मल और मूत्र भी चाटलेते हैं । जो इनके विरोधी थे उनको ये नीच और हीन की पहचान दिया और जो उनकी समर्थक उनको अच्छा और यहां तक कुछ को भगवान का दर्जा भी दे दिया; जिस विरोधी को हरा नहीं पाया उस को उसकी मौत के बाद उसकी इतिहास ही बदल के अपने ही छतरी के नीचे दाल दिया । कभी भी ब्राह्मण लिखित लेख और उनसे प्रेरित लेख को आंख बंद कर बिना सोच समझ कर विश्वास मत करना ये लोग शहद में जेहेर देने वाले लोग हैं; कभी कभी सीधी शहद में जहर देते हैं तो कभी दीर्घसूत्री धीमा जेहेर ताकि आदमी मरे और उसको पता भी नहीं चले; अनुयायी शहद (झूठी मीठी भ्रम बोली) का जल्द दीवाना और नसेडी तो हो जाता है लेकिन उसकी मौत उसी शहद से हुई है उसको पता भी नहीं चलता । कभी भी बिना तार्किक विश्लेषण किये हुए उनके लेख और कही गयी बातों को विश्वास मत करना । अगर कोई अच्छी वचन भी बोले उसके पीछे उनकी मोटिव यानी नियत की भी जांच करना; हाला की उनकी सब अवरोही उनके जैसे ही है ये कहना गलत होगा । वैदिक धर्म ने धूर्त, दबंग, बईमानों को शासक वर्ग के रूपमें अगड़ी वर्ग बनादिया और कमजोर वर्ग को उनके गुलाम । वैदिक वाले धूर्त, दबंग, बईमानों की अगड़ी वर्ग ने कभी भी सदियों पिछड़े यानी समाज के कमजोर वर्ग को वर्ण व्यवस्था इस्तेमाल करके अगड़ी बनने नहीं दिया । इसका मतलब यह नहीं उनके हर पढ़ी के हर संतान उनके पूर्वजों की जैसे ही थे; लेकिन ज्यादातर उनके जैसे ही थे । पुरातन समय से वैदिक धर्म कभी भी इस भूखंड का पसंदीदा धर्म नहीं रहा । अभी जितना हिन्दू हिन्दू बोल के उच्छल रहे हैं उनमे से ज्यादातर मूल निवासी शूद्र हैं जोकि अपने अज्ञानता के लिए वह नहीं जानते की वह शूद्र क्यों हैं और शूद्र बनानेवाला वही ब्रम्हाण हैं जिन्होंने तरह तरह की हिन्दू भगवान बना के उनको अपने भ्रम में डाली हुए हैं । ये उनसे बचेंगे क्या उनसे ही अपनी अधिकार की मांग कर रहे हैं, यानी उन को अपनी मालिक बनाने की मांग कर रहे हैं । कभी भी वेदीजिम इस भूखंड में पसंदीदा धर्म नहीं रहा क्यों की  ७०% से ज्यादा मूल निवासी शूद्र हैं यानी गुलाम हैं जो की वेदीजिम की वजह से ही शूद्र बने; जब उनको ये बात पता चलेगी की शूद्र बनाने वाला लोग ब्राह्मण ही हैं तब वह उनकी विरोध नहीं शायद ब्राह्मणवाद की ही बिनाश करेंगे । अगर देश की २० करोड़ आबादी मुस्लिम , ९१  करोड़ इंडिया की नीच जात, १८  करोड़ पाकिस्तानी मुसलमान और बांग्लादेश की  १५  करोड़ मुसलमानों को मिला दिया जाए ये करीब १४४  करोड़ मूल निवासी कभी भी वेदीजिम को समर्थन नहीं किए; अगर धर्मान्तरण से बने मुसलमानों को  ब्राह्मणबाद पसंद होता तो वह आज भी हिन्दू होते या मुसलमान बन ने का वाद फिर से हिन्दू हो जाते । जो शूद्र जात से बचने के लिए मुसलमान बने हो फिर से शूद्र क्यों बने? मानाजाता है केवल ३% से भी कम इनमें से बाहरी नस्ल की मुसलमान की पीढ़ियों से हैं जो की संकरण से अपनी खुद की पहचान इस भूखंड में खो चुके हैं । देश हमेशा बौद्ध धर्म की इतिहास के वारे मे छुपाया और स्कूली तालीम से भी दूर रखा ताकि उसका प्रसार न हो सके; और बस ये ६ करोड़ ब्राह्मण, १ करोड़ से भी कम क्षत्रिय और करीब ७ -१० करोड़  वैश्य के पूर्वज ही इसको समर्थन किए और छल और बल से इसको  लागू किया । ये  उपद्रवी  वैदिक प्रचारक और प्रसारक ही हमरा देश की असली  दुश्मन हैं जिन्होंने देश और सभ्यता की विनाश की और  आज तक देश को गुलाम बनाये रखा । पुजारीबाद बनाम ब्राह्मणबाद ने अजिविका, चारुवाक / लोकायत, बौद्ध धर्म, जैन धर्म आदि जैसे सभी तर्कसंगत दर्शनों को अपने स्वार्थ के लिए नष्ट कर दिया और अपने अनुयायियों के जीवन पर नियंत्रण करने लगे । पुजारीबाद अनेक वेद विरोधी दर्शन को ध्वंस और अपभ्रंश किया और ज्यादातर दर्शन को  अपने छतरी के नीचे लाये उनमेसे योग, वैशेषिक, मीमांसा, नाय इत्यादि दर्शन थे । वैदिक धर्म झूठ, अंधविश्वास, तर्क हीनता, भ्रम, हिंसा और अज्ञानता को बढ़ावा इसलिये दिया ताकि लोगों के मन में तर्क पैदा हो ना सके; कहीं उनकी बनाया गया झूठी भगवान की दुनिया के वारे में जिज्ञासा ना पैदा हो जाये; इसलिये स्वर्ग, नर्क, पाप, पुण्य जैसे भ्रम पैदा किए; तरह तरह तेवहार पैदा किया ताकि वह उन में खोये रहें और उनको ये सब सोचने का मौका ना मिले । उनके भगवान की खोज और उनकी उत्पत्ति की तर्क को पाप और नास्तिक का चोला पहनादिया ताकि अनुयायी खुद को अच्छा साबित करने के लिए इस सब की खोज ना करे । यानी मूर्खता, अंध विश्वास और तर्क हीनता ही उनके लिए  अच्छे की प्रमाणपत्र था । जब तक उनकी झूठी भगवान की भ्रम में भ्रमित रहो, निर्जीव मूर्त्तियों के आगे सर झुकाते रहो तब तक आप लोग उनके नियंत्रण में हो, जब इसका विरोध हो तो आप पापी हो और नास्तिक हो । उनकी झूठी मूर्तिवाद बिना प्रश्न किए आंख मूंद कर विश्वास करने को उन लोगों ने आस्तिक का पहचान दिया । जब आप उनकी दुनिया को खोज करके उनकी झूठी दुनिया का राज खोल दो तो आप को ये लोग नास्तिक की पहचान देंगे । दिमागी कमजोर और मुर्ख कभी इन सबका खोज नहीं करता इसलिए आंख बंद किये सब मानलेता है और खुद  को आस्तिक का प्रमाण पत्र देता है; जब की उनकी द्वारा घोषित नास्तिक बनना ही बहुत मुश्किल है । उनकी भ्रम की दुनिया को बेनकाब  करने के लिए उनकी हर चीज की अध्ययन करना पड़ता है, जो की भोलाभाला अनपढ़ लोगों के लिए ज्यादातर नामुमकिन है; जब कोई इंसान उनकी झूठ की पोल खोलता है तो ये लोग उस को नास्तिक का पहचान देके उनको बदनाम करते हैं । भोलेभाले लोग तो अपनी जिंदगी में व्यस्त होता है उसको इतना समय भी कहाँ उनकी षडयंत्र को बेनकाब करे? ये लोग आस्था की गलत अर्थ फैलाते हैं । आस्था का मतलब कोई भी विषय में विश्वास करना होता है । आप अगर अंध विश्वासी हो तो भी आप आस्तिक हो क्यों की आप अंध विश्वास के ऊपर विश्वास करते हो यानी आप की अंध विश्वास की प्रति आस्था यानी विश्वास है; वैसे ही जिन को तर्क और सत्य के ऊपर आस्था है वे भी आस्तिक हैं, लेकिन आस्था तर्क और सत्य के ऊपर ना कि असत्य और मन गढन भ्रम की दुनिया पर । जो विज्ञान के ऊपर विश्वास करते है वह भी आस्तिक हैं लेकिन उनकी आस्था विज्ञान के ऊपर है । अगर ये लोग कुछ में भी विश्वास नहीं करते तो वे नास्तिक कहलाते; यानी किसी भी विषय में नकरात्मक रहना यानी विश्वास नहीं करना ही नास्तिकता है । संगठित पुजारीवाद ने झूठी अफवाएं फैलाई जो भगवान को विश्वास करता है वह आस्तिक है और जो नहीं वह नास्तिक । यानी खोजी और तार्किक दिमाग ही उनके हिसाब से नास्तिक हैं शायद इसलिए ये लोग वैज्ञानिओंको नास्तिक कहते हैं । वैदिक धूर्त्तों ने उनके अनुयाईयों के सोच में ये सोच प्रत्यारोपण किया की जो उनके विचारों और भगवान को नहीं मानता वह गन्दा, पापी और नीच है; जबकि असलियत में वे खुद ही नीच और गंदगी से भी नीचे हैं, भला कोई वैदिक वर्ण व्यवस्था जैसे अमानवीय असामाजिक व्यवस्था बनाके  इंसान को इंसान की बिच लड़ता है? ये कैसे धर्म है जो मानवीय मूल अधिकार का उलंघन करता हो और लोगों को अंध विश्वासी और मुर्ख बनता हो? । क्योंकि गंगा नहाना वाला खुद को पापी मानता है, इसलिए तो पाप धोने गंगा में डुबकी मारता है? खुद पापी भी खुद को नीच कहलवाना पसंद नहीं करेगा और उनकी ये चाल उनके अनुयाईयोंके ऊपर अच्छी चली । साधारण भोलाभाला लोग नास्तिक को एक हीन, पापी और नीच प्राणी मानता है इसलिए वह इस पुजारीवाद का आस्तिक वाला अच्छी इंसान की झूठी प्रमाणपत्र के चाह मैं कभी उनकी नास्तिक प्रमाण पत्र को पसंद नहीं किया और खुद को अंधविश्वासी और मुर्ख बनाये रखने को अपना धर्म और गर्व माना । इंडिया की विभिन्न भाषाई के मूल निवासी 185BC के बाद ही उनकी सबसे मूर्खतापूर्ण और बेवकूफ सामाजिक जाति आधारित पहचान प्राप्त किये जो आज तक इंडियन समाज में प्राथमिक सामाजिक पहचान बना हुआ है । हमारे शिक्षा व्यवस्था में हम सबको इस सबके वारे में भ्रमित और झूठी शिक्षा सदियों दिया गया । जब की ज्यादार सत्ता में कांग्रेस ही रही । कांग्रेस ऐसे क्यों किया अब आप खुद ही सोचो।

जातिवाद यानी वर्ण व्यवस्था संस्कृत भाषी रचनाओं में मिलता है इसका मतलब ये हुआ जो गैर संस्कृत बोली वाले है उनके ऊपर ये सोच यानी वर्ण व्यवस्था थोपी गयी है । रिग वेद की पुरुष सुक्त १०.९० जो वर्ण व्यवस्था का डेफिनेशन है उसको कैसे आज की नस्ल विश्वास करते हैं ये तर्क से बहार हैं? सायद आज की पीढ़ी भी मॉडर्न अंध विश्वासी हैं । पुरुष सूक्त बोलता है: एक प्राचीन विशाल व्यक्ति था जो पुरुष ही था ना की नारी और जिसका एक हजार सिर और एक हजार पैर था, जिसे देवताओं (पुरूषमेध यानी पुरुष की बलि) के द्वारा बलिदान किया गया और वली के बाद उसकी बॉडी पार्ट्स से ही  विश्व और वर्ण (जाति) का निर्माण हुआ है और जिससे दुनिया बन गई । पुरूष के वली से, वैदिक मंत्र निकले । घोड़ों और गायों का जन्म हुआ, ब्राह्मण पुरूष के मुंह से पैदा हुए, क्षत्रियों उसकी बाहों से, वैश्य उसकी जांघों से, और शूद्र उसकी पैरों से पैदा हुए । चंद्रमा उसकी आत्मा से पैदा हुआ था, उसकी आँखों से सूर्य, उसकी खोपड़ी से आकाश ।  इंद्र और अग्नि उसके मुंह से उभरे ।

ये उपद्रवी वैदिक प्रचारकों को क्या इतना साधारण ज्ञान नहीं है की कोई भी मनुष्य श्रेणी पुरुष की मुख, भुजाओं, जांघ और पैर से उत्पन्न नहीं हो सकती? क्या कोई कभी बिना जैविक पद्धति से पैदा हुआ है? मुख से क्या इंसान पैदा हो सकते है? ये कैसा मूर्खता है और इस मूर्खता को ज्ञान की चोला क्यों सदियों धर्म के नाम पर पहनाया गया और फैलाया गया? ये क्या मूर्ख सोच का गुंडा गर्दी नहीं है? अगर मान भी लिया जाये ये मुर्ख सोच सही है तो जो ब्राह्मण बन गए उनके पूर्वज क्या ब्रह्मा, विष्णु, महेश्वर की ज्ञान ले के पैदा हुए थे ? जो पैदा होते ही उनको अपनी भगवान की जानकारी मिल गयी? उनको अपनी भगवान की जानकारी मिलने से पहले उनके पूर्वज क्या इस दुनियामें नहीं जी रहे थे? तो तब वह कौन सी काम कर रहे थे? जब चमड़ी से बनी चीजों का ज्ञान अविष्कार नहीं हुआ था तो चमार क्या चमार था? जब इंसान कपडे बनाना नहीं जनता था तो धोबी क्या धोबी थे? तेल बनाने का ज्ञान जब इंसान नहीं ढुंढा था तो क्या तेली के पूर्वज तेली थे? या राजाओं का हर पूर्वज राजा था? इस जातिबाद वैदिक पुरुष सूक्त फैलाने का क्या मतलब? मतलब साफ़ है गंदी सोच रखने वाले गुंडई सोच कपटी लोमड़ी सोच बुद्धि जीवी लोग अपनी और अपनी जैसी कुछ लोगों की संगठित लाभ के लिए बनाई सामाजिक शासन व्यवस्था जिसको हम वैदिक सामाजिक शासन व्यवस्था बोलते हैं जो की इंडिया सभ्यता की सबसे बड़ा मुर्ख और घटिया दर्शन है जिसको छल और बल से इसको इंडियन लोगों के ऊपर अपने संगठित लाभ के लिए  थोपा गया है  । हर भाषीय सभ्यता को ब्राह्मणबाद अगड़ी और पिछड़ी श्रेणी में बांटा; धूर्त, बाहुबली और बईमानों को अगड़ी यानी शासक वर्ग बनाने की मदद की और श्रम श्रेणी को हमेशा श्रम श्रेणी बने रहना और अगड़ी बनने से रोकने के लिए वर्ण व्यवस्था को धूर्त, बाहुबली और बईमानों अपनाया । रिग वेद का पुरुष सूक्त जो वर्ण व्यवस्था का वर्णन करता है एक मूर्खता और अज्ञानता का परिभाषा है; और क्योंकि ये संस्कृत भाषा में रचना की गयी हैं और अन्य १७०० भी ज्यादा अलग भाषी बोलने वाले सभ्यता जिन को संस्कृत बोलना नहीं आता उनके ऊपर  ये सोच जबरदस्ती थोपा गया है । यानी जिनलोगों की माँ बोली संस्कृत नहीं उनकी भाषीय प्रजाती में वर्ण व्यवस्था ही नहीं थी; इसलिये ये सोच उनके ऊपर छल और बल से थोपा गया है । संस्कृत भाषा सब भाषा की जननी है ये एक सफ़ेद झूठ है; जिसको मुर्ख और धूर्त वैदिक प्रचारकोंने फैलाई है । अगर संस्कृत भाषा इतनी पुरानी है, तो आज तक उसकी बोलने वाले १५ हजार से भी कम लोग क्यों हैं? ईश भाषा को कोई भी ख़तम करने को कोशिश नहीं किया; ईश को स्वाधीन इंडिया में भी संरक्षण मिला; उसके बावजूद ये कभी भी जन प्रिय भाषा बन नहीं पाया; इसका मतलब ये है की ये भाषा कभी भी इस भूखंड का लोकप्रिय भाषा ही नहीं रहा । लेकिन दिलचस्पी की बात ये है की, हर वैदिक भगवान बस संस्कृत में ही समझता है । अगर भगवान हमेशा संस्कृत में समझते हैं, तो जिन लोगों का मातृभाषा संस्कृत नहीं हैं तो उनकी भगवान कैसा बना? क्या हम अरबी समझने वाले अल्ला; या इंग्लिश या अरामिक समझने वाला जिसु को अपना भगवान मानते हैं? तो संस्कृत समझने वाला भगवान हमारा भगवान है ये कितना तार्किक और मानने योग्य है?

मोर्य साम्राज्य की ब्राह्मण सेनापति पुष्यामित्र शुंग ने ईशा पूर्ब १८५ में विश्वासघात और तलवार धार की आतंक से बौद्धिक साम्राज्य को वैदिक साम्राज्य में परिवर्तित किया और श्रमिक श्रेणी को अपनी आतंक,  छल, कपट से शूद्र बनाया, और उनकी अनुगामी राजाओं ने ठीक उनकी तरह ही हर भाषीय सभ्यता में वही चीज़ दोहराई । कोई भला अपने आप को शूद्र या अपने आपको दूसरों की दास क्यों बनाना चाहेगा ? क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र क्यों नहीं चाहेगा की वह ब्राह्मण बने? ब्राह्मण अगर शरीर से पवित्र और महान है तो शूद्र की सर नेम अपनाने से भी वह पवित्र और महान रहेगा! तो शूद्र की सर नेम से क्यों चीड़ है? क्योंकि अशोक की साम्राज्यमें ज्यादातर मूल निवासी बुद्ध धर्म को मानते थे इसलिए ज्यादातर बुद्ध धर्म मानने वाले लोग ही जाती वाद को बाध्य करने के कारण अपने वृत्ति के अनुसार चार जात में बटने में मजबूर हो गए; इसका मतलब यह नहीं तब का समय में दूसारे दर्शन जैसे कि आजीविका, चारुवाक/लोकायत, वैशेषिक, योग, सांख्य, न्याय, जैन, आलेख इत्यादि धर्म को मान ने वाले लोग वैदिक पहचान से बच गए । क्योंकि वैदिक धर्म तलवार की धार पर मौत की भय दिखा के मूल निवासीओंपे थोपा गया, जबकि बुद्ध धर्म हिंसा को समर्थन नहीं करता इसलिये वैदिक धर्म दबंगई यानी छल और बल से आसानी से फैल गया । जो पुजारी वैदिक धर्म को अपना के अपने आप को ब्राह्मण की पहचान दी वह बहुत कम थे, उन्हों ने बस वैदिक धर्म को छल से आगे बढ़ने में साथ दिया और मनु स्मृतिमें ब्राह्मण के लिए दिए गए सुबिधाओंकी लाभ उठाई । राजाओं को क्षत्रिय का मान्यता मिली जो की तब का समय में कुछ हजारों में हीं होंगे, उस समयमें ब्योपार करने वाले वर्ग जो वैदिक पहचान अपनाया अपने आपको वैश्य घोषित किया जो ब्राह्मण से ज्यादा थे; लेकिन सबसे ज्यादा आबादी श्रम श्रेणी की थी जिन को शूद्र की पहचान मिली; और जातिबाद यानी वैदिक धर्म न मानेवाले लोग और राज्य जाती व्यवस्था से बहार यानी अतिशूद्र की मान्यता मिली । समय की अनुसार राजाओं के शासन में प्रत्यक्ष रूप से भाग लेने वाले वर्ग यानी राजाओं और ब्राह्मणों की क़रीबी वर्ग अपने आप को शूद्र से क्षत्रिय की मान्यता का पहचान दिलाने में कामयाब रहे यानी अगड़ी शूद्र अपने आप को समय के साथ क्षत्रिय बनालिया और जाती बाद फैलाने में वैदिक घोषित राजा और पुजारिओं को जाती बाद फैलाने में मदद की । ईसाई ५७० में नबी मुहम्मद अरब देश में पैदा हुए और जब उनको ४० शाल चल रहा था यानी करीब ईसाई ६१० में उनहोंने इस्लाम धर्म की रचना की जो की एकेईस्वरवाद और मूर्ति पूजा की विरुद्ध वाली धर्म थी । मुहम्मद अपने कबीला में अपनी धर्म को फैलाने की कोशिश की, लेकिन बहु मूर्तिबाद मानने वाले अरबी कबीला इसको अपना ने से इंकार किया और नबी मुहम्मद को विरोध भी किया । समय के साथ नबी मुहम्मद ने अपनी कुछ अनुगामी बनाया और अपना ताकत बढ़ाई, और तलवार की जोर पर अपने कबीला की लोगों को मौत की डर दिखा के मुस्लिम बनाया और “काबा” की ३६० मूर्तिओं को ध्वस्त कर दिया । तलवार की जोर पर वह और उनके साथी इस्लाम को फैलाता चले गए; जब इस्लाम धर्म को परिवर्तित राजाओं इंडिया भूखंड को करीब करीब ईसाई ७०० में आक्रमण किया उनके साथ साथ इस्लाम हमारे भूखंड में आया; वह ठीक वैदिक धर्म की जैसी अपने तलवार के धार पर ज्यादातर अपनी धर्म फैलाई और कई राज्योंको जित के अपने साम्राज्य बनाया और करीब करीब ९०० साल यानी अंग्रेज आने तक, यानी ईसाई १६०० तक बहुत सारे राज्यों में राज किया । क्योंकि वैदिक परिचय अपनानेवाले पुजारी (ब्राह्मण) , राजाओं यानी क्षत्रिय, ब्योपारी यानी वैश्य, शूद्रों और अति शूद्रों की तुलनामें कम थे उन में से कम ही तलवार की डर से इस्लाम कबूला होगा, क्योंकि बहुत सारे इस्लाम राजाओंने धर्म की छूट दी थी इसलिये अभी भी देश में ज्यादा वैदिक धर्म मानने वाले लोग देखने में मिलते हैं, अगर ऐसा नहीं होता ९०० साल की राज में वह हर किसी को इस्लाम धर्म में परिवर्तित कर दिए होते । वैदिक धर्म के कारण ज्यादातर श्रमिक श्रेणी वैदिक अगड़ी जात यानी ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य से तरह तरह की शोषण और यातना सहती रहते थे । इस्लाम आने का बाद इस श्रम श्रेणी यानी शूद्र जात से कुछ अपने आपको इस्लाम धर्म से परिवर्तित कर लिए ताकि कम से कम छुआ छूत, जात पात इत्यादि वैदिक असामाजिक शोषण से बच सके; इसलिये आज की इंडिया, पाकिस्तान और बांग्लादेश की मुशलमानों को अगर मिला दिए जाये करीब ५३ करोड़ से भी ज्यादा होंगे जिसका कारण ज्यादा तर ब्राह्मणबाद यानी वैदिक जाती प्रथा ही है । जिनके पूर्वज जिस भूखंड यानी प्रदेश तथा भाषीय सभ्यता के साथ जुड़े हुए हैं, वहाँ का मुसलमान उसी भाषीय सभ्यता से इस्लाम धर्म को परिवर्तित हुआ है । यानी पाकिस्तान की पंजाब और इंडिया की पंजाब की भूखंड में जो मुस्लिम बसते हैं वह सब पंजाबी भाषीय सभ्यता से परिवर्तित हुए हैं; वैसे ही आंध्र का मुसलमान की पूर्वज तेलुगु भाषीय सभ्यता से ही थे और बांग्लादेशी मुसलमान बंगाल के भाषी सभ्यता से; उसी प्रकार अन्य प्रदेश में दिखने वाले मुसलमान उसी भाषीय सभ्यता की ही हिस्सा हैं । ज्यादातर मुसलमान राजाओंने आपने अधिकृत भूखंड के नाम सिंधु नदीके किनारे बसनेवाले सभ्यता यानी सिंध प्रदेश के आधार पर अल-हिन्द, इन्दुस्तान, हिंदुस्तान जैसे नाम दिए । ये नाम हमारे कोईभी धर्म ग्रन्थ में नहीं मिलेंगे जो ये बात की पुष्टि करती है इस नाम से यहाँ की लोगो का साथ कोई रिश्ता नहीं सीबाये एक नामकरण की । उनके धर्म को परिवर्तित मुसलमान को छोड़ के यानी गैर-मुसलमानों को उन्हों ने हिन्दू की पहचान दी और इस तरह से दूसारे भाषी सभ्यता जिनका सिंधु सभ्यता के साथ दूर दूर तक कोई सबंध नहीं  उनके ऊपर ये पहचान थोपा गया; वैदिक वाले संगठित पुजारीबाद बुद्ध और अन्य तार्किक दर्शन को खत्म कर चुके थे और वैदिक धर्म ही बहुसंख्यवाद धर्म बनचुका था; इसलिये इस बहुसंख्यवाद को हिन्दू का चोला थोपा गया । जो मेडीवाल इंडिया का जन प्रिय भाषा था वह था नगरी जिसका पाली के साथ ज्यादा मेल है वह शायद उन सदी का नगर की भाषा कहलाता था और नगरी/नागरी के नाम से जाना जाता था वैदिक वाले उसके सामने देव लगा के देवनागरी बना डाला । अगर हर भगवान यानी देवतायें संस्कृत समझते हैं तो नगरी कैसे उनकी बोली हो गयी? इसके आगे देव् लगाना इस भाषा की नाम के साथ छेड़ छाड़ यानी अपभ्रंश किया गया है । ये कोई देवनागरी नहीं केवल नागरी ही है । जब यहाँ की मुसलमान शासकों ने यहाँ की लोकप्रिय भाषा “नगरी/नागरी (जिसका मतलब नगर की भाषा)” उनके राज में ये ज्यादा बोलने वाली भाषा थी उनके राज की नाम से इसका नाम हिंदी रख दी । समय के साथ मुसलमान शासकों ने इस नगरी/नागरी भाषा में कुछ अरबी और पार्सी शब्द मिला के उसका नाम उर्दू रख दिया और इंडिया की मुसलमानों के लिए एक अपनी पहचान वाली भाषा बनाया जो की आज की इंडियन ओरिजिन वाले मुसलमानों का मातृभाषा बन गयी है । जबकि उनकी सेकेण्ड लेंगुएज ही ज्यादातर उनकी पूर्वजोंकी मातृभाषा रही । क्योंकि बहुत सारे जगह में पाया गया बुद्ध की प्रतिमा इस्लाम धर्म से भी ज्यादा पुराने है, और कोई वैदिक धर्म की मंदिर या उनकी मूर्त्तियां उनसे भी पुरानी नहीं है ये, ये बात की सूचक है की ये प्रतिमाएं और भग्न बौद्ध स्थल पाने वाले जगह में बौद्ध धर्म था और ईश भूखंड और इसके आस पास ज्यादातर भूखंड में रहने वाले पूर्वज बौद्ध धर्मी थे; यानी हमारे पूर्वज ज्यादातर बौद्ध धर्मी थे ना की वैदिक धर्म के अनुगामी । क्योंकि ३००० साल पहले कोई प्रमुख धर्म या धर्म ही नहीं था सब पूर्वज धर्महीन/ गैरधर्मी ही थे; और किसी भी धर्म को नहीं मानते थे, तब क्या वह सब पापी और जानवर थे?

ब्राह्मणवाद / वेदीजिम यानी वैदिक धर्म को इस्लाम राजाओं ने आक्रमण के बाद हिंदू धर्म के रूप में नामकरण किया और वैदिक प्रचारक इसको अपना पहचान मानलिया; जब धर्म के आधार पर देश विभाजित हुआ इंडियन भूखंड में ज्यादातर वैदिक धर्म मान ने वाले अनुयाई थे; नेहरू ने इंडियन क़ानूनोंमें इस भूखंड में पैदा सब वैदिक और गैर वैदिक धर्मोंको एक छतरी के निचे हिंदू का नाम दे दिया जब की ज्यादातर गैरवैदक धर्म वैदिक धर्म की विरोधी थे । इस तरह सत्ताधारी ताकतों वह कांग्रेस हो या BJP दोनोंने ही वैदिक धर्म की प्रसार किया जब की गैर वैदिक धर्म और दर्शन भी इस भूखंड का ही उपज और ज्ञान सम्पदा है कोई दूसारे देश की नहीं ।


India had totally controlled by Vedic caste promoter oligarch elites those are in practical psychologically disordered race or race of Indian origin crooks with severe anti social personality disorders and we can say them Indian racial sociopaths or elite social criminals. Both Congress and BJP dominated and controlled by these Vedic crooks or so called elites. Only for these stupids India got divided and we have now three nations from one origin.

Following Organizations are harmful to India those stagnates the Indian civilization till to date socially and whose ancestors were the root evils of the Indian civilizations.

Abhinav Bharat Society: Founded by Vinayak Damodar Savarkar and his brother Ganesh Damodar Savarkar in 1903.(Both were Marathi Chitpavan Brahmins).

Akhil Bhāratiya Hindū Mahāsabhā: Founded in 1915 & Founder was Madan Mohan Malaviya (Original surname was Chaturved an Allhabadi Brahmin).

Rashtriya Swayamsevak Sangh: Founded in 27 September 1925 in Nagpur & Founder was K. B. Hedgewar (Marathi Deshastha Brahmin).

Bharatiya Jana Sangh: Founded in 21 October 1951 & Founder was Syama Prasad Mukherjee (Westbengal Brahmin).

Vishva Hindu Parishad: Founded in 1964 & Founders were M. S. Golwalkar(Original surname was Padhye. The Padhyes belonged to a place called Golwali in Konkan in Maharashtra are Brahmins), Keshavram Kashiram Shastri (Brahmin), S. S. Apte (Maharashtrian Brahmins).

Why these type of organizations those promotes Stupid caste based social system (Purusha Sukta 10.90) are founded and lead by Brahmins?

Have you ever seen any Brahmin explaining where Castes and Brahmins born from? These stupids are not only race of crooks but also a race of blind believers those genetically making their descendants mentally ill and blind believers generation to generations. These stupids are thinking they are fooling to their followers but they are so stupids that they have been already made their descendants mentally disordered more than their followers.

जातिवाद यानी वर्ण व्यवस्था संस्कृत भाषी रचनाओं में मिलता है इसका मतलब ये हुआ जो गैर संस्कृत बोली वाले है उनके ऊपर ये सोच यानी वर्ण व्यवस्था थोपी गयी है । रिग वेद की पुरुष सुक्त १०.९० जो वर्ण व्यवस्था का डेफिनेशन है उसको कैसे आज की नस्ल विश्वास करते हैं ये तर्क से बहार हैं? सायद आज की पीढ़ी भी मॉडर्न अंध विश्वासी हैं । पुरुष सूक्त बोलता है: एक प्राचीन विशाल व्यक्ति था जो पुरुष ही था ना की नारी और जिसका एक हजार सिर और एक हजार पैर था, जिसे देवताओं (पुरूषमेध यानी पुरुष की बलि) के द्वारा बलिदान किया गया और वली के बाद उसकी बॉडी पार्ट्स से ही  विश्व और वर्ण (जाति) का निर्माण हुआ है और जिससे दुनिया बन गई । पुरूष के वली से, वैदिक मंत्र निकले । घोड़ों और गायों का जन्म हुआ, ब्राह्मण पुरूष के मुंह से पैदा हुए, क्षत्रियों उसकी बाहों से, वैश्य उसकी जांघों से, और शूद्र उसकी पैरों से पैदा हुए । चंद्रमा उसकी आत्मा से पैदा हुआ था, उसकी आँखों से सूर्य, उसकी खोपड़ी से आकाश ।  इंद्र और अग्नि उसके मुंह से उभरे ।

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Why should we recognized as Hindus by Brahmins?

Brahmins are maintaining a curse to all linguistic races naming a social identity Hindu. Though Hindu word can’t be found in any religious scriptures composed in this demography. Hindu word adopted by root natives of India by only impositions and enforcement of this social identity by only Islamic emperors to depart Muslim followers in Islamic empire from non-Islamic followers of this demography. Stupid historians, writers and specially Brahmins promoted this word “Hindu” instead of Vedism or Brahmanism to promote their faith system vedism or Brahmanism using this identity Hindu. Now a day’s Hindu extremist organization Sangh Parivar hate Muslims but love their given identity “Hindu” for which they demand a Hindu Nation. In our any Indian laws it is not defined what is Hindu, though it recognizes who is Hindu in some Acts. Acts are majorly made and influenced by psychotic Vedic promoters of Indian demography; so this Identity forcefully imposed to major root native Indians those are from different linguistic races. What if voters of Congress party called as “Congreshia,” as a social identity, voters of Bhajapa(BJP) as Bhajpaiya? etc. Is not it a stupidity? In any religious scriptures, it is neither mentioned deities were Hindus, nor deities recognized themselves as they were Hindus. Why we need a social identity as Hindu in first place? Which streams from Shindi linguistic race (Shind Province) and now is a part of Pakistan! Why should we more than 1500 linguistic races of India would recognized according to Shind province of Pakistan? (Shindu Civilization).  Shindi language is not spoken by all Indians! then what is the connection with this linguistic race though its just one from our many linguistic culture; where found 122 major languages and 1599 other languages? Each individual distinct linguistic race is one kind of civilization without any doubts. Why importance to Shindi linguistic race from which many has been converted to Islam and lives in Pakistan Shind province and few from them resides in India as Hindus. Those wants Hindu nation should stay in India or should migrate to their origin where they belongs to i.e. Shind province of Pakistan? Shindi people don’t speak in Sanskrit i.e. their mother tongue is not Sanskrit so without any doubt  this civilization has no connection with Sanskrit spoken Vedic civilization. Vedic promoters don’t chant in Shindi language to worship Hindu deities which proves there is no connection with these two civilization. So connection with Shindu civilization with Vedic civilization is nullified; so Vedic civilization is Shindu civilization as taught to us in our academic books is absolutely wrong where in truth Shindu civilization is not Vedic civilization and they don’t have any connection without neighboring demography origin. If Shindu civilization is not Vedic civilization then why to coin Hinduism and Hindu identity in the name of Bramhanism? Vedic civilization is even one from our many linguistic culture where less than 15 thousands only use Sanskrit as their mother tongue in India which proves it was not a major spoken language in Indian history. Stupid scholars just passed stupid knowledge to delude us without even having general knowledge & interpretations and same followed as sheep generation to generation. Hinduism seems like an abusive word or slang or a curse; because it promotes blind believes, discrimination, hate, irrationality; promotes drinking wastage of Cow, like cow urine and cow dung and believe it as holiest. Why should we worship nonliving idols that has no senses and consider it as god? is not it a mental disorder? Respecting an idol as a memory and worship it as god are two different things. We respect eminent personalities idols in their birth day as a memorable identity and source of inspiration but consider it as they are dead in this world, but respect to their human activities once he had done for human race or a social group; but in the case of God Idol it seems totally stupidity. Innocent animals are sacrificed in front of these nonliving idols; what kind of insanity it is? Where even penis of God (Shiva Linga) promoted to be worshiped by our all linguistic root natives saying it’s a part of Hindu practices? Should our family follow this kind of stupidities? Should we pass this kind of lies, irrationality, stupidity and mental disorders in the name of god, tradition, custom, culture and heritage? We should not support delusional and illusion liar world of Brahmins faith named as Hinduism and shouldn’t even let them victimized our co-citizens in their evil traps. Some Brahmins themselves even in delusion; if they don’t know the vedic conspiracy theory. If they had been aware about Vedic conspiracy theory; then they would not have making wake up to their nonliving identities by ringing bells, chanting in Sanskrit to these nonliving idols and worshiping the penis of the god till to date.  In fact, when somebody identify as Hindu it logically represents, he/she is irrational, blind believer, ignorant, discriminator, hater, abuser, stupid; follower of lies, violence and delusions etc. etc. it is more than an abusive word, curse and slang. When you will see your family and friends bowing these imaginative and nonliving identities think about how they bow and surrenders to lies, irrationality, blind beliefs, ignorance, discrimination, hate, stupidity, violence and delusions which are nothing but mental deviations or mental disorders. Nobody has right to enforce any social identity based on stupid faith systems on us because its not only violations of human rights but also it is violations of fundamental rights and our self-respect. Good mental health is a natural fundamental right of humans. We should better feel to have a social identity as a “Human” as a gender, as a citizen of the Nation; obviously we can manipulate ourselves as a good human or a bad human.

Many generations are gone. May be most of our ancestors had lived for more than 65+ or may be more… In their Generations Lord Shiva was only 30+ and even still in our generations he is that 30+ charming faced youth. Charming faces, boastful bluffs, honey coated polite words etc. are used to promote their identities but with these they only promote poisonous lies, irrationality and blind beliefs with these honey coated polite words and charming faces. Shiva identity is still promoted as 30+ charming face to  cheat our brain as a conspiracy to make us stupid. Vedic promoters use charming and beautiful present young generation to promote their Vedic identities to delude in their world of imagination so that our mind will be cheated for ever generation to generation. Vedic promoters use their godly identities in Movies, TV serials etc. to promote their world of delusions with new generations skills, technologies and with their charming body.

Giant statues, architects etc.  are made for unite followers of same belief and to polarize them for their faith or set of beliefs made by them; but which kind of faith they are united for that does matters. If its for exploitation and mental abuse to have self and organized benefits from them then its called promoting of stupidity; which should be exposed. This statue will polarize the Hindus to be utilized by Vedic promoters in their own ways and as they like. It won’t develop the rationalism in their mental health but develop blind beliefs and stupidity. Yoga has no relation to vedism and Shaivism but relating it to Shaivism this Sadhguru helping to promote Vedism in the name of Yoga and distorting to history of Yoga. He will die one day but his made statue will be used to promote stupidity generation to generation. In this case this Sadhguru is really meant a bad Guru which helped to cripple our descendants mental health in the name of Yoga, religion, custom, culture and heritage. Yoga will still work if you don’t know what they called. Yoga is set of exercises with different postures of the human body. Postures and set of physical activities carried out for the sake of health and fitness will even still work if you even don’t know what those positions & exercises are called.  One thing more according to Shiva Purana and many Shiva related scriptures Shiva was an identity belongs to Kiratian race which is found in Himalyan regions now this tribe considered as Scheduled tribe by Government of India. We often seen Shiva artistic impressions and sculptures always relating to Himalaya mountains which proves Shiva identity was belongs to only this region not from other parts of our planet. Shiva identity even not known to Canadians, Americans, Russians, Chinese, Australians, Greenland, Antarctica, Europeans and Africans etc…If he was belongs to Kiratian race then his mother tongue had Kirati not Sanskrit. Now you just go with your simple logic how  he could understand Sanskrit if he was belongs to Kiriati linguistic race? Brahmins still worship him with Sanskrit chants…. Would it really work for him? What is the possibilities men can do well exercises/Yoga in ice surroundings.

 Don’t Call Us Hindu.

Hindus worship idols and artistic impressions means; whom they worship all are no more in this world. We all knows once an identity got dead we worship their photos or idols; why this is not understood by followers? Is not it a logical blindness? Is our dead family members can help us? Then how these dead identities can help the followers if they were really existed? All Hindu God died in their youth, so we don’t get any old age artistic impressions or sculptures of their old age identity till to date though only Bramha seems to be an older among them.

1.      Shiva’s snake still lives in the neck of Shiva and you can’t find any old age picture or sculpture of itself Shiva and his snake though followers claims, thousand and thousand year ago he had existed. Time passes but he still seems younger to younger. It proves how logically blinds are followers. Its directly proves followers mentally disorders.

2.      Head of the Ganesh is still mystery. In any scriptures name of that elephant whose head had used for the torso of dead Ganesh is absent. Again; an animal head will act like an animal not like a human. Though concept/mind born story of Ganesh is a superb lie and a stupid imagination by cons but till to date followers worshiping an elephant instead of a Ganesh as their God of knowledge. How his massive body carried by a mouse? Is it really possible hundreds of kilogram weighing human carried by a little mouse? That mouse is not even getting older and perhaps never died so in every year it comes with youngest to youngest forms.

3.      Rama, Krishna and Radha etc. etc. day by day looking charming & wonderful rather than being older. Nobody thinks how was their life without electricity, mobiles, internet, airplanes, trains, buses, cars, ACs, Tv and cable connections etc. etc. They still armed with old weapons likes, Chakra, Gada, Swords, bow and arrow etc. etc. where we are much more powerful than our god having guns, nuclear weapons, chemical weapons, biological weapons etc. etc.

If your logical blindness is self-diagnosed and rectified, then you can explore more than me…. My motive is to activate your slept logical consciousness and to vaccinate your mind.

Vedic followers worshiping Snakes:

Cambodian girl cooking a Snake recipe for her family:

Vedic followers worshiping Dog:

Vedic followers worship genitals:

Vedic followers drinking Cow pee:

 Remember on thing prominently:

When you say I am proud of being a Hindu; It directly says:

Your are proud of being an irrational, blind believer, ignorant, discriminator, hater, abuser, stupid; follower of lies, violence or antisocial activities in the name of God and delusions. You feel proud for being a majority of Stupids. Your are proud of being a part of mass hysteria. Your are proud of being a partial mental disorders. Your are proud of being slave to stupid Vedic philosophies and being slave to Brahmins. You are proud of hating other religions and maintaining disharmony in the society.

ONLY BRMHANISM MADE OUR COUNTRY A STUPID NATION. BRAHMANISM IS FOLLOWED BY MORE THAN 100 CRORES ROOT NATIVES OF THIS DEMOGRAPHY.

Disclaimer: Those stupid promoters & followers will be hurt reading these facts; they will be responsible, agreed & liable for promoting lies, irrationality, blind beliefs, delusions, discrimination, disharmony, violence and different kind of antisocial activities due to this faith system. Not only liable for present generation but also liable for past generations those had been cheated by this faith system. Stupid promoters can be prosecuted under even offense of promoting blind beliefs and superstitions; cheating etc…

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If Padmini had existed, she would have a Buddhist princess not a Vedic/Hindu follower.

Fictional Padmavati was Buddhist Princess

Padmini, also known as Padmavati, was a legendary 13th–14th century Indian queen (Rani). The earliest source to mention her is Padmavat, an epic fictionalized poem written by Malik Muhammad Jayasi in 1540 CE. The text, which features elements of fantasy, describes her story as follows: Padmavati was an exceptionally beautiful princess of the Singhal kingdom (Sri Lanka). Ratan Sen, the Rajput ruler of Chittor Fort, heard about her beauty from a talking parrot named Hiraman. After an adventurous quest, he won her hand in marriage and brought her to Chittor. Alauddin Khalji, the Sultan of Delhi, also heard about her beauty, and laid siege to Chittor to obtain her. Many events occurred during the period of the siege, till the fort was finally taken. Meanwhile, Ratan Sen was killed in a duel with Devpal, the king of Kumbhalner, who was also enamoured with Padmavati’s beauty. Before Alauddin Khalji could capture Chittor, Padmavati and her companions committed Jauhar (self-immolation) to protect their honour. After her sacrifice, the Rajput men died fighting on the battlefield.

According to Malik Muhammad Jayasi’s Padmavat (1540 CE)

Padmavati was the daughter of Gandharv Sen, the king of the Singhal kingdom. She became close friends with a talking parrot named Hiraman. Her father resented the parrot’s closeness to his daughter, and ordered the bird to be killed. The parrot flew away to save its life, but was trapped by a bird catcher, and sold to a Brahmin. The Brahmin bought it to Chittor, where the local king Ratan Sen purchased it, impressed by its ability to talk.

The parrot greatly praised Padmavati’s beauty in front of Ratan Sen, who became determined to marry Padmavati. Guided by the parrot and accompanied by his 16,000 followers, Ratan Sen reached Singhal after crossing the seven seas. There, he commenced austerities in a temple to seek Padmavati. Meanwhile, Padmavati came to the temple, informed by the parrot, but quickly returned to her palace without meeting Ratan Sen. Once she reached the palace, she started longing for Ratan Sen.

Meanwhile, Ratan Sen realized that he had missed a chance to meet Padmavati. In desolation, he decided to immolate himself, but was interrupted by the deities Shiva and Parvati. On Shiva’s advice, Ratan Sen and his followers attacked the royal fortress of Singhal kingdom. They were defeated and imprisoned, while still dressed as ascetics. Just as Ratan Sen was about to be executed, his royal bard revealed to the captors that he was the king of Chittor. Gandharv Sen then married Padmavati to Ratan Sen, and also arranged 16,000 padmini  women of Singhal for the 16,000 men accompanying Ratan Sen. Sometime later, Ratan Sen learned from a messenger bird that his first wife — Nagmati — is longing for him back in Chittor. Ratan Sen decided to return to Chittor, with his new wife Padmavati, his 16,000 followers and their 16,000 companions. During the journey, the Ocean god punished Ratan Sen for having excessive pride in winning over the world’s most beautiful woman: everyone except Ratan Sen and Padmavati was killed in a storm. Padmavati was marooned on the island of Lacchmi, the daughter of the Ocean God. Ratan Sen was rescued by the Ocean God. Lacchmi decided to test Ratan Sen’s love for Padmavati. She disguised herself as Padmavati, and appeared before Ratan Sen, but the king was not fooled. The Ocean god and Lacchmi then reunited Ratan Sen with Padmavati, and rewarded them with gifts. With these gifts, Ratan Sen arranged a new retinue at Puri, and returned to Chittor with Padmavati.

At Chittor, a rivalry developed between Ratan Sen’s two wives, Nagmati and Padmavati. Sometime later, Ratan Sen banished a Brahmin courtier named Raghav Chetan for fraud. Raghav Chetan went to the court of Alauddin Khalji, the Sultan of Delhi, and told him about the exceptionally beautiful Padmavati. Alauddin decided to obtain Padmavati, and besieged Chittor. Ratan Sen agreed to offer him tribute but refused to give away Padmavati. After failing to conquer to the Chittor fort, Alauddin feigned a peace treaty with Ratan Sen. He deceitfully captured Ratan Sen and took him to Delhi. Padmavati sought help from Ratan Sen’s loyal feudatories Gora and Badal, who reached Delhi with their followers, disguised as Padmavati and her female companions. They rescued Ratan Sen; Gora was killed fighting the Delhi forces, while Ratan Sen and Badal reached Chittor safely.

Meanwhile, Devpal, the Rajput king of Chittor’s neighbour Kumbhalner, had also become infatuated with Padmavati. While Ratan Sen was imprisoned in Delhi, he proposed marriage to Padmavati through an emissary. When Ratan Sen returned to Chittor, he decided to punish Devpal for this insult. In the ensuing single combat, Devpal and Ratan Sen killed each other. Meanwhile, Alauddin invaded Chittor once again, to obtain Padmavati. Facing a certain defeat against Alauddin, Nagmati and Padmavati committed self-immolation (sati) on Ratan Sen’s funeral pyre; other women of Chittor also died in mass self-immolation (jauhar). The men of Chittor fought to death against Alauddin, who acquired nothing but an empty fortress after his victory.

Investigation and logical verification according to even their given facts: It is highly impossible arranging a marriage only by a talking parrot named Hiraman. Could you believe this parrot flew from Sri Lanka to Rajasthan crossing about 3,628 km to exact location of Rajasthan where a Brahmin got it and given to King? Again if Parrot was trained to talk then it might be talking in Sihanli language not in Marwari/Rajasthani or Hindi! It might have highly possibility Brahmins would have been the cause of falling Medapata (Mewar) kingdom; because they have well track record destroying kingdoms by dishonesty using their knave or crooked mind but possibility of Padmavati is seems to be fiction. What is the possibility of fair understanding of parrot language if it really happened? Do you think parrot could have well communicated about the princess Padmini to Ratan Sen? Ratan Sen had reined his kingdom in 1302 –1303 CE. Malik Muhammad Jayasi wrote the epic fictionalized poem in 1540 CE. It means he had not in the time frame of Ratan Sen and it is composed after 237 years after the Ratan Sen’s death. According to some writers the composer Malik Muhammad Jayasi had lost his father at a very young age, and his mother some years later. He became blind in one eye, and his face was disfigured by smallpox. He married and had seven sons. He lived a simple life until he mocked the opium addiction of a pir (Sufi leader) in a work called Posti-nama. As a punishment, the roof of his house collapsed, killing all seven of his sons. Subsequently, Jayasi lived a religious life at Jayas. He is also said to have been raised by Sufi ascetics (fakir). It is totally absent there was any relationship of any kind with the characters like Ratan sen, Padmavati, Gandharv Sen or Khilji families or to their relatives or to their descendant or to their historians those had helped him to compose the Padmavat. So it has no possibility of its authenticity; there may be few characters that had existed those are used for composing Padmavat as fiction. If we will start to think it was even true then in that time frame Gandharv Sen should have existed in Sinhalese monarchs. In the time frame of 1302 –1303 CE when Ratan Sen was the King of Medapata (Mewar) kingdom; at that time in Singhal/Sinhala/Sri Lanka there was House of Siri Sanga Bo (1220–1345) dynasty. There was no king named Gandharv Sen had ever existed in Singhal history.

Kingdom of Dambadeniya (1220–1345)

Name King From King Until Relationship with Predecessor(s)
Vijayabahu III 1220 1224 *A patriotic Prince of Sinhala Royal blood
Parakkamabahu II 1234 1269 *Eldest son of Vijaya Bahu III
Vijayabahu IV 1267/8 October 1270 *Eldest son of Panditha Parakrama Bahu II
Bhuvanaikabahu I
(from Yapahuwa)
1271 1283 *Brother of Vijaya Bahu IV
Interregnum 1283 1302
Parakkamabahu III
(from Polonnaruwa)
1302 1310 *Nephew of Buvaneka Bahu I
*Son of Vijaya Bahu IV
Bhuvanaikabahu II
(from Kurunagala)
1310 1325/6 *Son of Buvaneka Bahu I
*Cousin of Parakrama Bahu III
Parakkamabahu IV
(from Kurunagala)
1325/6 1325/6 *Son of Buvanekka Bahu II
Bhuvanaikabahu III
(from Kurunagala)
1325/6 1325/6 *Known as Vanni Buvaneka Bahu
Vijayabahu V
(from Kurunagala)
1325/6 1344/5 *Second son of Chandra Banu of Jaffnapatnam

Here is the list of Sinhalese monarchs:

 

 

 

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